ग्रामीण भारत में लड़कियां आज भी अपनी शिक्षा पूरी करने में चुनौतियों का सामना कर रही हैं। यह बात यूनेस्को की ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग जेंडर रिपोर्ट में सामने आई है। रिपोर्ट का कहना है कि गांवों में उच्च माध्यमिक स्तर की पढ़ाई पूरी करने वाले हर 100 लड़कों के मुकाबले केवल 59 लड़कियां ही अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर पाती हैं।
गांवों और शहरों की शिक्षा में गहरा अंतर
रिपोर्ट बताती है कि भारत के शहरी और ग्रामीण इलाकों की शिक्षा में एक बड़ा अंतर है। जहां शहरी क्षेत्रों में लड़के और लड़कियां अब बराबरी से उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी कर रहे हैं, वहीं ग्रामीण इलाकों में यह खाई अभी भी बहुत गहरी है।
लड़कियों का दाखिला बढ़ने का मतलब समान अवसर नहीं
आंकड़ों के अनुसार, स्कूलों में लड़कियों का दाखिला तो बढ़ा है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि उन्हें स्कूली शिक्षा पूरी करने के समान अवसर भी मिल रहे हैं। घर की आर्थिक स्थिति, रहने की जगह और सामाजिक रुकावटें लड़कियों की पढ़ाई को लगातार प्रभावित कर रही हैं, जिससे वे बीच में ही स्कूल छोड़ देती हैं।
बाल विवाह और कम उम्र में गर्भवती होना बड़ी रुकावट
लड़कियों की शिक्षा बीच में छूटने का एक बड़ा कारण कम उम्र में शादी होना भी है। दुनिया भर में 18 साल से कम उम्र में शादी करने वाली लड़कियों का प्रतिशत साल 2000 के 25 प्रतिशत से घटकर 2025 में 18 प्रतिशत रह गया है। हालांकि, मध्य और दक्षिणी एशिया में यह अभी भी 25 प्रतिशत और उप-सहारा अफ्रीका में 31 प्रतिशत के उच्च स्तर पर है, जो उनकी पढ़ाई को रोक देता है।
इसके अलावा, कम उम्र में गर्भवती होना भी पढ़ाई में एक बड़ी बाधा है। रिपोर्ट के अनुसार, 2024 में उप-सहारा अफ्रीका में 10 से 19 साल की लगभग 60 लाख गर्भवती लड़कियां और युवा माताएं स्कूल नहीं जा सकीं, जिनमें से 5 प्रतिशत से भी कम लड़कियां वापस अपनी शिक्षा से जुड़ पाईं।
केवल कानून ही नहीं, जमीनी स्तर पर सुविधाएं देना जरूरी
यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, 58 प्रतिशत देश बिना किसी भेदभाव के शिक्षा का अधिकार देते हैं, लेकिन केवल 35 प्रतिशत देश ही स्पष्ट रूप से गर्भवती और मां बन चुकी लड़कियों के शिक्षा के अधिकारों की रक्षा करते हैं। रिपोर्ट यह भी साफ करती है कि लड़कियों की शिक्षा जारी रखने के लिए केवल कानूनी नियम बना देना काफी नहीं है। पैसे की कमी, समाज का डर, सुरक्षित सफर का ना होना, बच्चों की देखभाल की सुविधा न होना और साफ शौचालयों की कमी जैसी परेशानियां लड़कियों को वापस स्कूल लौटने से रोकती हैं।
सामाजिक और आर्थिक पर ठोस कदम उठाने होंगे
यूनेस्को के महानिदेशक खालिद अल-अनानी के अनुसार, दुनिया भर में प्री-प्राइमरी से लेकर सेकेंडरी स्तर तक स्कूल में दाखिले के मामले में लड़के-लड़कियों के बीच समानता तो हासिल कर ली गई है, लेकिन लड़कियों को अभी भी शिक्षा तक पहुंचने और उसे पूरा करने में भारी रुकावटों का सामना करना पड़ता है। उन्होंने कहा कि लड़कियों को पढ़ाई पूरी करने से रोकने वाले सामाजिक और आर्थिक कारणों पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
इन समस्याओं से निपटने के लिए स्कूलों के स्तर पर काम करने की जरूरत है। उदाहरण के लिए, बुर्किना फासो नामक देश में लड़कियों के अनुकूल स्कूल बनाने से वहां दाखिले में 19 प्रतिशत की बड़ी वृद्धि देखी गई, जिसमें लड़कियों की संख्या सबसे ज्यादा थी।