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अल नीनो से दुनिया की खेती पर संकट : चावल, मक्का, गन्ना और कॉफी पर सूखे की मार... खाद्य महंगाई का खतरा

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Wed, 28 Oct 2026 12:53 PM IST
सार

अल नीनो के मजबूत होने से दुनिया के कई हिस्सों में सूखे का खतरा बढ़ सकता है। चावल, मक्का, गन्ना, कॉफी और पाम ऑयल की फसल प्रभावित होने की आशंका है। भारत का रिकॉर्ड चावल भंडार वैश्विक आपूर्ति को राहत दे सकता है।

अल नीनो का खतरा
अल नीनो का खतरा - फोटो : AI Image
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विस्तार
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दुनिया के कई हिस्सों में अल नीनो का बढ़ता असर खेती और खाद्य सुरक्षा के लिए चिंता बढ़ा रहा है। मौसम से जुड़े विभिन्न संगठनों के अनुमानों के मुताबिक, मौजूदा अल नीनो हाल के वर्षों की सबसे गंभीर घटनाओं में से एक हो सकता है। इससे दक्षिणी अफ्रीका, मध्य अमेरिका, दक्षिण अमेरिका के उत्तरी हिस्सों और दक्षिण-पूर्व एशिया में सूखे का खतरा बढ़ सकता है। इसका असर मक्का, चावल, गन्ना, पाम ऑयल और कॉफी जैसी प्रमुख फसलों के उत्पादन पर पड़ने की आशंका है।

फिच सॉल्यूशंस की शोध इकाई बीएमआई के मुताबिक, पिछली अल नीनो घटनाओं के दौरान इन क्षेत्रों में औसतन 11 से 12 प्रतिशत अंक अधिक कृषि भूमि गंभीर सूखे की चपेट में आई थी। जाम्बिया, जिम्बाब्वे, मध्य अमेरिका का ड्राई कॉरिडोर, फिलीपींस, थाईलैंड, गुयाना और सूरीनाम उन क्षेत्रों में शामिल हैं, जहां सूखे का असर ज्यादा देखा गया।

खाद्य सुरक्षा पर बढ़ सकता है खतरा
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) के मुताबिक, अल नीनो दुनिया के मौसम के पैटर्न को प्रभावित करता है। इससे खेती, खाद्य सुरक्षा और ग्रामीण लोगों की आजीविका पर खतरा बढ़ जाता है।एफएओ ने जून में कहा था कि वर्ष 2026-27 का अल नीनो उन क्षेत्रों के लाखों किसानों और खाद्य उत्पादकों को प्रभावित कर सकता है, जो पहले से ही मौसम की मार और आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। ईंधन और खाद की बढ़ती कीमतें भी किसानों की मुश्किलें बढ़ा रही हैं।

अमेरिकी कृषि विभाग (यूएसडीए) के अनुसार, 2026 के मध्य में विकसित हुआ अल नीनो 2027 की शुरुआत तक काफी मजबूत हो सकता है। इसका असर भारत, केन्या, ब्राजील, अमेरिका, थाईलैंड, इंडोनेशिया और ऑस्ट्रेलिया सहित कई देशों की कृषि पर पड़ सकता है।

दक्षिण-पूर्व एशिया में चावल और पाम ऑयल पर संकट
बीएमआई के मुताबिक, दक्षिणी अफ्रीका में सफेद मक्का वहां के लोगों के भोजन का प्रमुख हिस्सा है। सूखे से इसकी फसल प्रभावित होने पर खाद्य उपलब्धता और ग्रामीण परिवारों की आमदनी पर असर पड़ सकता है। मध्य अमेरिका में मक्का, बीन्स और कॉफी की फसलें खतरे में हैं।

दक्षिण-पूर्व एशिया में सूखे से चावल, थाईलैंड की चीनी, इंडोनेशिया और मलेशिया के पाम ऑयल तथा वियतनाम की रोबस्टा कॉफी का उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। बीएमआई के अनुसार, पिछली अल नीनो घटनाओं के दौरान इस क्षेत्र में औसतन करीब 9 करोड़ अतिरिक्त लोग सूखे के संपर्क में आए थे।

हालांकि, दक्षिणी अफ्रीका में मक्का का पर्याप्त भंडार इस सीजन में खाद्य महंगाई का दबाव कम कर सकता है। इसके उलट, दक्षिण-पूर्व एशिया में चावल, पाम ऑयल और कॉफी का भंडार अपेक्षाकृत कम होने से आपूर्ति पर अधिक दबाव पड़ सकता है।

भारत का चावल भंडार दुनिया को दे सकता है राहत
चावल की वैश्विक आपूर्ति के मामले में भारत की स्थिति अहम मानी जा रही है। बीएमआई के मुताबिक, दुनिया के कुल चावल निर्यात में भारत की हिस्सेदारी करीब 39 प्रतिशत है। भारत के पास चावल का रिकॉर्ड भंडार है, जो घरेलू खपत के लगभग 47 प्रतिशत के बराबर है। वर्ष 2023-24 से पहले यह अनुपात करीब 30 प्रतिशत था।

भारत में पर्याप्त भंडार होने से चावल के निर्यात पर दोबारा प्रतिबंध लगाने की आशंका कम हो सकती है। इससे वैश्विक बाजार में चावल की आपूर्ति बनाए रखने और कीमतों में अचानक तेजी को रोकने में मदद मिल सकती है।

हालांकि, थाईलैंड, वियतनाम और फिलीपींस में चावल का भंडार 2023 के स्तर से नीचे आ गया है। फिलीपींस के लिए स्थिति अधिक संवेदनशील है, क्योंकि वह अपनी जरूरत का करीब एक-तिहाई चावल आयात करता है। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ने पर वहां ज्यादा असर पड़ सकता है।

भारत में भी कई क्षेत्रों में बारिश की कमी
अमेरिकी कृषि विभाग के मुताबिक, भारत में मानसून का असर सभी क्षेत्रों में एक जैसा नहीं रहा है। पूर्वी, पूर्वोत्तर, दक्षिणी और उत्तर-पश्चिमी भारत के कुछ हिस्सों में बारिश की कमी दर्ज की गई है। इससे गेहूं, चावल और गन्ने की फसलों पर असर पड़ने की आशंका है।

दूसरी ओर, इंडोनेशिया और मलेशिया में सूखे से पाम ऑयल का उत्पादन प्रभावित हो सकता है। इंडोनेशिया के सुमात्रा और कालीमंतन जैसे प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में सूखे का खतरा बढ़ रहा है। थाईलैंड में भी बारिश की कमी के कारण गन्ने की पैदावार और उससे चीनी निकालने की क्षमता घट सकती है।

सूखे से बढ़ सकती है खाद्य महंगाई
बीएमआई के अनुसार, इस सीजन में सूखे के कारण खाद्य पदार्थों की कीमतों में बढ़ोतरी एक बड़ा आर्थिक जोखिम है। इससे परिवारों की आमदनी पर दबाव पड़ेगा। खासकर कम आय वाले देशों में इसका असर ज्यादा हो सकता है, क्योंकि वहां लोगों की कमाई का बड़ा हिस्सा भोजन पर खर्च होता है।

रिपोर्ट में दक्षिण अफ्रीका का उदाहरण दिया गया है। वर्ष 2015-16 में अल नीनो के दौरान मक्का की फसल पर सूखे का गंभीर असर पड़ा था। उस समय खाद्य महंगाई दर 4 प्रतिशत से बढ़कर 12 प्रतिशत से ऊपर पहुंच गई थी। बीएमआई के मुताबिक, दक्षिण-पूर्व एशिया और दक्षिणी अफ्रीका में गर्मी और लू का खतरा भी बढ़ सकता है। पूर्वी और पश्चिमी अफ्रीका तथा दक्षिण अमेरिका के उत्तरी हिस्सों में भी तापमान बढ़ने का जोखिम है।

फसल बचाने के लिए पहले से तैयारी जरूरी
एफएओ ने सरकारों और संबंधित संस्थाओं से समय रहते कदम उठाने की अपील की है। संगठन का कहना है कि किसानों की फसल, आजीविका और खाद्य आपूर्ति बचाने के लिए पहले से तैयारी करना जरूरी है। समय पर उठाए गए कदमों से बाद में राहत और सहायता पर होने वाला खर्च भी कम किया जा सकता है।

अल नीनो का असर कितना गंभीर होगा, यह आने वाले महीनों में मौसम की स्थिति पर निर्भर करेगा। लेकिन शुरुआती अनुमानों से साफ है कि कई देशों में खेती, खाद्य आपूर्ति और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। ऐसे में फसल की निगरानी, पानी के बेहतर प्रबंधन और किसानों को समय पर सहायता देने की भूमिका अहम होगी।
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