विज्ञापन
Home› Khabar Junction› Earth Natural Shield Weakening 10 Reduction In Dust Sky In 20 Years Sun Heat May Increase

धरती की ‘प्राकृतिक ढाल’ हो रही कमजोर : 20 साल में 10% घटी आसमान की धूल, बढ़ सकती है सूरज की गर्मी

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Sat, 26 Sep 2026 01:11 PM IST
सार

यूसीएलए के वैज्ञानिकों की रिसर्च के मुताबिक, 2003 से 2023 के बीच वायुमंडल में मौजूद धूल की मात्रा करीब 10 फीसदी घटी है। धूल के महीन कण सूरज की कुछ किरणों को अंतरिक्ष में वापस भेजकर धरती को प्राकृतिक रूप से ठंडा रखने में मदद करते हैं। ऐसे में धूल कम होने से धरती तक पहुंचने वाली सौर गर्मी में मामूली बढ़ोतरी हो सकती है।

20 साल में 10% घटी आसमान की धूल
20 साल में 10% घटी आसमान की धूल - फोटो : AI Image
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

आसमान में धूल कम होना पहली नजर में अच्छी खबर लग सकती है, लेकिन इसका धरती की गर्मी पर उल्टा असर पड़ सकता है। नई रिसर्च के मुताबिक, 2003 से 2023 के बीच वायुमंडल में मौजूद धूल की मात्रा करीब 10 फीसदी घट गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि धूल के महीन कण सूरज की कुछ किरणों को अंतरिक्ष में वापस भेजकर धरती को प्राकृतिक रूप से थोड़ा ठंडा रखने में मदद करते हैं। ऐसे में धूल कम होने से धरती तक पहुंचने वाली सौर गर्मी में मामूली बढ़ोतरी हो सकती है।

20 साल में करीब 10 फीसदी कम हुई धूल
हवा में मौजूद धूल के महीन कणों की मात्रा पिछले 20 साल में करीब 10 फीसदी कम हुई है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया, लॉस एंजिल्स (यूसीएलए) के वैज्ञानिकों की नई रिसर्च में वर्ष 2003 से 2023 के बीच वायुमंडल में धूल की मात्रा में यह गिरावट दर्ज की गई है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, वायुमंडल में धूल कम होने से धरती तक पहुंचने वाली सूरज की गर्मी में मामूली बढ़ोतरी हो सकती है। हालांकि, शोधकर्ताओं ने साफ किया है कि ग्लोबल वार्मिंग यानी धरती के बढ़ते तापमान की मुख्य वजह अब भी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन है। वायुमंडलीय धूल में आई कमी इसके मुकाबले एक छोटा कारक है।

धूल धरती को ठंडा रखने में भी करती है मदद
हवा में मौजूद धूल को आमतौर पर गंदगी या प्रदूषण से जोड़कर देखा जाता है, लेकिन इसका जलवायु पर एक प्राकृतिक असर भी होता है। धूल के बेहद छोटे कण सूरज की कुछ किरणों को वापस अंतरिक्ष की ओर भेज देते हैं। इससे धरती की सतह तक पहुंचने वाली सौर गर्मी कुछ कम हो सकती है। ऐसे में अगर वायुमंडल में धूल की मात्रा घटती है तो इस प्राकृतिक ठंडक का प्रभाव भी कम हो सकता है। इससे धरती तक पहुंचने वाली सूरज की ऊर्जा में मामूली बदलाव संभव है।

20 साल के आंकड़ों से सामने आई गिरावट
इस रिसर्च के लिए वैज्ञानिकों ने 2003 से 2023 तक के सैटेलाइट डेटा, जमीन पर किए गए माप और वायुमंडलीय मॉडल का इस्तेमाल किया। आंकड़ों के विश्लेषण में दो दशकों के दौरान वायुमंडल में मौजूद धूल की मात्रा में करीब 10 फीसदी कमी दर्ज की गई। हालांकि, वैज्ञानिक अभी पूरी तरह यह नहीं समझ पाए हैं कि धूल में कमी के पीछे मुख्य कारण क्या हैं। इसके लिए अलग-अलग प्राकृतिक और मानवीय कारकों का अध्ययन किया जा रहा है।

रेगिस्तान हैं धूल के बड़े स्रोत
वायुमंडल में पहुंचने वाली धूल का बड़ा हिस्सा रेगिस्तानी इलाकों से आता है। उत्तरी अफ्रीका का सहारा और एशिया का गोबी रेगिस्तान इसके प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं। तेज हवाएं इन इलाकों की मिट्टी के बेहद महीन कणों को उठाकर वातावरण में पहुंचाती हैं। इसके बाद हवा के साथ ये कण हजारों किलोमीटर दूर तक जा सकते हैं और दूसरे महाद्वीपों तथा समुद्रों तक भी पहुंचते हैं।

हर साल अरबों टन धूल वातावरण में पहुंचती है
वैज्ञानिकों के अनुसार, हर साल करीब 200 करोड़ टन धूल और रेत वायुमंडल में पहुंचती है। इसका बड़ा हिस्सा उत्तर अफ्रीका और मध्य पूर्व के रेगिस्तानी क्षेत्रों से आता है। यह धूल वातावरण में पहुंचकर सूरज की रोशनी और गर्मी को प्रभावित करने के साथ-साथ जलवायु और बादल बनने की प्रक्रिया पर भी असर डाल सकती है। इसलिए वैज्ञानिक वायुमंडलीय धूल में हो रहे बदलाव को जलवायु परिवर्तन के अध्ययन के लिए महत्वपूर्ण मानते हैं।

ग्लोबल वार्मिंग की मुख्य वजह ग्रीनहाउस गैसें
वैज्ञानिकों ने इस बात पर जोर दिया है कि वायुमंडलीय धूल में कमी को धरती के बढ़ते तापमान का मुख्य कारण नहीं माना जा सकता। कार्बन डाइऑक्साइड और अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन ही ग्लोबल वार्मिंग का प्रमुख कारण है। धूल में कमी से धरती तक पहुंचने वाली सौर गर्मी पर कुछ असर पड़ सकता है, लेकिन इसका वास्तविक प्रभाव कितना होगा, इसे समझने के लिए वैज्ञानिकों को अभी और अध्ययन करने की जरूरत है।
विज्ञापन
विज्ञापन