किसान रबी सीजन की तैयारी में जुटे हैं, लेकिन इस बार मिट्टी में कम नमी, जलाशयों में घटता पानी और मजबूत होता अल नीनो खेती के लिए चिंता बढ़ा रहा है। इन हालात में बारिश पर निर्भर किसानों के लिए रबी की बुवाई में देरी, रकबा घटने और उत्पादन प्रभावित होने का जोखिम बढ़ गया है। पानी की उपलब्धता पर दबाव बढ़ने से आने वाले महीनों में खाद्य आपूर्ति पर भी असर पड़ सकता है।
दक्षिण-पश्चिम मानसून इस साल सामान्य से 12.6 फीसदी कम बारिश के साथ खत्म हुआ। 2001 के बाद यह चौथा सबसे कम बारिश वाला मानसून रहा। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में बारिश में 25 फीसदी कमी, जबकि दक्षिणी प्रायद्वीपीय भारत में 24 फीसदी कमी दर्ज की गई। इससे रबी की बुवाई वाले कई इलाकों में खेतों में पर्याप्त नमी नहीं बची है।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, एचएनवाईबी टेक-इन्क्यूबेशंस प्राइवेट लिमिटेड के संस्थापक दीपक पारीक का कहना है कि 2026 का कमजोर मानसून देश के बड़े हिस्से में मिट्टी की नमी कम छोड़ गया है। अगर अक्टूबर में भी मौसम सूखा रहा और अल नीनो मजबूत हुआ तो रबी की बुवाई और फसलों की संभावनाओं पर दबाव बढ़ सकता है।
कई राज्यों में मिट्टी की नमी सामान्य से कम
रबी फसलों की बुवाई मानसून खत्म होने के बाद होती है। इसलिए बारिश के दौरान जमीन में जमा हुई नमी शुरुआती बुवाई के लिए काफी अहम होती है। क्रिसिल इकोनॉमिक्स के आकलन के अनुसार, 20 अगस्त तक कर्नाटक, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, तमिलनाडु, राजस्थान, मध्य प्रदेश, बिहार, पंजाब, पश्चिमी गुजरात और पूर्वोत्तर के कुछ हिस्सों में मिट्टी की नमी पिछले 10 साल के औसत से कम थी।सितंबर में भी हालात बेहतर नहीं रहे। आईएमडी के जिला स्तर के आंकड़ों के मुताबिक, 32 फीसदी जिले कम बारिश वाली श्रेणी में रहे, जबकि 16 फीसदी जिलों में बारिश की कमी बहुत ज्यादा रही।
सितंबर में रिकॉर्ड गर्मी ने बढ़ाई परेशानी
कम बारिश के साथ ज्यादा तापमान ने भी मिट्टी की नमी पर दबाव बढ़ाया है। सितंबर में देश का औसत अधिकतम तापमान 32.05 डिग्री सेल्सियस रहा, जो 1901 के बाद सितंबर का सबसे अधिक तापमान था। औसत तापमान 27.72 डिग्री सेल्सियस रहा, जो सितंबर में पांचवां सबसे अधिक था। मौसम विभाग के अनुसार, अक्टूबर में भी देश के ज्यादातर हिस्सों में अधिकतम और न्यूनतम तापमान सामान्य से ज्यादा रहने की संभावना है। इससे खेतों में बची नमी तेजी से कम हो सकती है।
गेहूं को सिंचाई का सहारा, चना-ज्वार पर ज्यादा खतरा
रबी सीजन देश के करीब आधे खाद्यान्न उत्पादन में योगदान देता है। क्रिसिल के आकलन के अनुसार, रबी उत्पादन में गेहूं की हिस्सेदारी करीब 70 फीसदी है। चावल, मोटे अनाज और दलहन की हिस्सेदारी लगभग 10-10 फीसदी है। देश के कुल दलहन उत्पादन का 60 फीसदी से ज्यादा हिस्सा रबी सीजन से आता है। इनमें चना प्रमुख है। वहीं देश में ज्वार का करीब 70 फीसदी उत्पादन रबी सीजन में होता है।
गेहूं की 95 फीसदी से ज्यादा खेती सिंचाई पर निर्भर है। इसके मुकाबले चने का करीब 52 फीसदी और ज्वार का सिर्फ 25 फीसदी रकबा सिंचित है। इसलिए राजस्थान में चना और कर्नाटक व महाराष्ट्र में ज्वार को कम मिट्टी की नमी से ज्यादा खतरा हो सकता है। क्रिसिल के मुताबिक, सिंचाई सुविधा वाले किसान भूजल और नहरों की मदद से बुवाई जारी रख सकते हैं। लेकिन बारिश पर निर्भर किसानों को बुवाई टालनी, रकबा घटाना या उपलब्ध पानी के हिसाब से दूसरी फसल चुननी पड़ सकती है।
जलाशयों में भी पिछले साल से कम पानी
रबी की बुवाई के लिए जलाशय सिंचाई का बड़ा सहारा हैं, लेकिन इस बार उनमें भी पानी का भंडार दबाव में है। 1 अक्टूबर तक देश के 178 प्रमुख जलाशयों में पानी का भंडारण पिछले औसत से करीब 1 फीसदी कम था। पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में भंडारण 20 फीसदी से ज्यादा कम रहा। पूर्व कृषि सचिव देवेश चौधरी के मुताबिक, पिछले साल हुई ज्यादा बारिश के कारण कुछ हद तक जलाशयों में पानी बचा हुआ है, लेकिन कई राज्यों, खासकर दक्षिण भारत में स्थिति चिंता वाली है। उनके अनुसार, पानी की कमी से दक्षिणी राज्यों की रबी फसलों पर असर पड़ सकता है।
दक्षिणी क्षेत्र के जलाशयों में 27.46 अरब घन मीटर पानी, यानी उनकी कुल उपयोगी क्षमता का 49.2 फीसदी भंडार था। पिछले साल इसी समय यह 87.8 फीसदी था। उत्तर भारत में जलाशय 60.5 फीसदी भरे थे, जबकि पिछले साल यह 91 फीसदी था। पश्चिमी क्षेत्र में यह 84 फीसदी और मध्य क्षेत्र में 88 फीसदी था।
महाराष्ट्र, राजस्थान और कर्नाटक पर ज्यादा दबाव
कम जल भंडार वाले प्रमुख रबी उत्पादक राज्यों में तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक शामिल हैं। महाराष्ट्र देश में चना और ज्वार का प्रमुख उत्पादक है। राजस्थान भी चना और सरसों के बड़े उत्पादक राज्यों में शामिल है। कर्नाटक ज्वार का दूसरा बड़ा उत्पादक है, जबकि आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में रबी सीजन में मक्का और दलहन की खेती होती है। देवेश चौधरी के मुताबिक, पानी की कमी होने पर इन राज्यों में किसान रबी की बुवाई देर से कर सकते हैं या रकबा घटा सकते हैं। जिन खेतों में फसल बोई जाएगी, वहां सिंचाई का खर्च बढ़ने और उत्पादकता प्रभावित होने का खतरा रहेगा।
देश के 47 फीसदी हिस्से में सूखे जैसी स्थिति
ताजा सूखा आकलन भी देश के कई हिस्सों में नमी की कमी की ओर इशारा कर रहा है। देश के 47.4 फीसदी क्षेत्र में सामान्य से कम नमी से लेकर गंभीर सूखे जैसी स्थिति दर्ज की गई है। राज्यों में गोवा के 100 फीसदी क्षेत्र में ऐसी स्थिति बताई गई। अरुणाचल प्रदेश में यह 87.8 फीसदी, असम में 84.9 फीसदी, मिजोरम में 83.8 फीसदी, महाराष्ट्र में 82.4 फीसदी और सिक्किम में 81.8 फीसदी क्षेत्र तक पहुंची। क्षेत्रवार देखें तो पश्चिम भारत में करीब 78 फीसदी, पूर्वोत्तर में 74 फीसदी और दक्षिण भारत में 52 फीसदी क्षेत्र सूखे की किसी न किसी श्रेणी में था।
अल नीनो से बढ़ी चिंता
रबी सीजन की शुरुआत ऐसे समय हो रही है जब अल नीनो मजबूत होने के संकेत मिल रहे हैं। अल नीनो प्रशांत महासागर के मध्य और पूर्वी हिस्से के समुद्री पानी के सामान्य से ज्यादा गर्म होने की स्थिति है। इससे दुनिया के कई हिस्सों के मौसम पर असर पड़ सकता है। आईएमडी के अनुसार, अक्टूबर में देश में बारिश सामान्य से 15 फीसदी तक कम रह सकती है। अक्टूबर से दिसंबर के दौरान भी देश के ज्यादातर हिस्सों में सामान्य से कम बारिश का अनुमान है।
अगर लंबे समय तक बारिश नहीं हुई तो बारिश पर निर्भर किसानों के लिए फसल की शुरुआती बढ़वार मुश्किल हो सकती है। ज्यादा तापमान के साथ मिट्टी की नमी और कम होगी। सर्दियों में पर्याप्त बारिश नहीं हुई तो फसल की बढ़वार और उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
सरकार ने राज्यों को पानी देखकर फसल चुनने को कहा
केंद्र सरकार ने भी आने वाले रबी सीजन को लेकर राज्यों को तैयारी करने की सलाह दी है। इस सप्ताह दिल्ली में हुई दो दिवसीय रबी बैठक में कृषि सचिव अतिश चंद्रा ने कहा कि अल नीनो के कारण बारिश पर निर्भर इलाकों के लिए रबी सीजन चुनौतीपूर्ण हो सकता है और इससे खाद्यान्न उत्पादन प्रभावित होने की आशंका है। कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने महाराष्ट्र, कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में पानी की उपलब्धता और मिट्टी की नमी के आधार पर फसल योजना बनाने की बात कही। उन्होंने सिंचित और बारिश पर निर्भर क्षेत्रों के लिए अलग रणनीति बनाने पर जोर दिया।
सरकार ने राज्यों और जिलों से पहले पानी और मिट्टी की नमी का आकलन करने और उसके बाद फसल का चुनाव करने को कहा है। जहां पानी की कमी है, वहां गेहूं की जगह कम पानी वाली दलहन और तिलहन फसलों को बढ़ावा देने की सलाह दी गई है। सरकार महाराष्ट्र और कर्नाटक के लिए सूखा सहन करने वाली फसलों की रणनीति समेत राज्यवार रबी योजनाएं तैयार कर रही है। वहीं मध्य प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड और पश्चिम बंगाल जैसे बेहतर जल उपलब्धता वाले राज्यों में उत्पादन बढ़ाने की संभावनाओं पर काम किया जा सकता है।
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