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सूखे ने बिगाड़ा खेल : तेल से दाल, चीनी और पशु आहार तक... विदेशी कृषि उत्पादों पर बढ़ सकती है भारत की निर्भरता

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Saraswat Updated Thu, 29 Oct 2026 11:23 AM IST
सार

  • सूखे के असर से 2026-27 में कृषि उत्पादों का आयात बढ़ने का अनुमान
  • खाद्य तेल का आयात 1.75 करोड़ टन तक पहुंचने की आशंका
  • खरीफ मूंगफली उत्पादन में 20% से अधिक गिरावट का अनुमान
  • पोल्ट्री उद्योग ने 30 लाख टन सोयाबीन मील आयात की अनुमति मांगी
  • चीनी, कपास और स्टार्च उद्योग भी आयात नियमों में ढील की मांग कर रहे हैं

प्रमुख उत्पादक राज्यों में सूखे की मार और बढ़ती लागत भारत को 2026-27 में विदेशी खाद्य उत्पादों के करीब ला सकती है।
प्रमुख उत्पादक राज्यों में सूखे की मार और बढ़ती लागत भारत को 2026-27 में विदेशी खाद्य उत्पादों के करीब ला सकती है। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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घरेलू स्तर पर फसलों को सूखे से हुए नुकसान और बढ़ती लागत को देखते हुए, भारत को साल 2026-27 में खाद्य पदार्थों, पशु चारे और कृषि से जुड़े कच्चे माल का आयात बढ़ाना पड़ सकता है। मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उद्योगों ने अपनी लागत को काबू में रखने के लिए सरकार से आयात के नियमों को आसान बनाने की मांग शुरू कर दी है।

खाद्य तेलों के आयात में बढ़ोतरी का अनुमान
रिपोर्ट के मुताबिक, घरेलू स्तर पर तिलहन के उत्पादन पर सूखे की मार पड़ी है। इस वजह से देश का खाद्य तेल आयात साल 2025-26 के 1.65 करोड़ टन से बढ़कर साल 2026-27 में 1.75 करोड़ टन तक पहुंच सकता है। हालांकि, खाद्य तेल के आयात का अंतिम आंकड़ा काफी हद तक इस बात पर निर्भर करेगा कि सर्दियों में सरसों की पैदावार कैसी रहती है।

सोयाबीन और मूंगफली की फसल पर सूखे का असर
देश में खरीफ सीजन की सोयाबीन और मूंगफली की पैदावार काफी दबाव में है। रिपोर्ट में दिए गए ताजा अनुमान के अनुसार, इस साल खरीफ मूंगफली के उत्पादन में 20 प्रतिशत से अधिक की भारी गिरावट आ सकती है। वहीं, पिछले साल अत्यधिक बारिश और इस बार सूखे के कारण मराठवाड़ा, विदर्भ, तेलंगाना और मध्य प्रदेश के कई हिस्सों में सोयाबीन की फसल को भारी नुकसान पहुंचा है। पिछले साल फसल खराब होने के बाद अफ्रीका के कम विकसित देशों से सोयाबीन का रिकॉर्ड आयात हुआ था, और इस वित्त वर्ष में भी सोयाबीन की किल्लत जारी रहने की आशंका है।

मुर्गी दाने के लिए 30 लाख टन सोयाबीन मील की मांग
कंपाउंड लाइवस्टॉक फीड मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष दिव्य कुमार गुलाटी कहते हैं कि उद्योग ने सरकार से 30 लाख टन सोयाबीन मील के आयात की अनुमति देने की मांग की है। मुर्गी के दाने (पोल्ट्री फीड) में 80 प्रतिशत हिस्सा सोयाबीन मील और मक्के का ही होता है। इन दोनों के महंगे होने से किसानों और कारोबारियों पर लागत का भारी दबाव पड़ रहा है। गुलाटी ने चेतावनी दी है कि यदि आयात पर रोक जारी रही, तो पोल्ट्री उत्पादों के दाम बढ़ सकते हैं और किसानों को भी बड़ा नुकसान हो सकता है।

चीनी, कपास और स्टार्च उद्योग में भी हलचल
रिपोर्ट के अनुसार, चीनी उद्योग ने कच्ची चीनी के आयात की समयसीमा में विस्तार हासिल कर लिया है। दूसरी ओर, कपड़ा निर्माताओं ने कपास (कॉटन) पर लगने वाले आयात शुल्क को हटाने की मांग रखी है। इसके अलावा, स्टार्च उद्योग इस बात को लेकर चिंतित है कि एथेनॉल बनाने में मक्के का उपयोग बढ़ने से घरेलू स्तर पर स्टार्च की कमी हो सकती है, जिससे चीन से स्टार्च मंगाने की मजबूरी बढ़ सकती है।

अल-नीनो का खतरा और घरेलू आपूर्ति पर दबाव
घरेलू आपूर्ति पर यह संकट मौसम में अल-नीनो के असर की वजह से पैदा हुआ है। जानकारों के अनुसार, अल-नीनो से मुख्य रूप से दालों, चीनी, तिलहन और धान की खेती प्रभावित हो रही है। देश में उत्पादन घटने और उत्पादन लागत बढ़ने के कारण आने वाले दिनों में देश के भोजन और पशु आहार की जरूरतों में आयातित कृषि उत्पादों की हिस्सेदारी और बढ़ सकती है।


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