राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन के तहत ताड़ की खेती का रकबा लगातार बढ़ रहा है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि इस साल के लिए तय हुए ताड़ की खेती के रकबे का 47 प्रतिशत लक्ष्य हासिल कर लिया गया है। वहीं, बिहार के इस मिशन में शामिल होने के बाद सरकार को उम्मीद है कि 2026-27 का 1.19 लाख हेक्टेयर का लक्ष्य आसानी से पूरा हो जाएगा।
पूर्वोत्तर राज्य के पास बड़ा हिस्सा, बिहार ने 200 हेक्टेयर का लक्ष्य रखा
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में पाम ऑयल के तहत कुल 55,614 हेक्टेयर क्षेत्र में बुवाई हुई है। इसमें पूर्वोत्तर क्षेत्र के छह राज्यों (अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर, मिजोरम, नागालैंड और त्रिपुरा) का हिस्सा 23,347 हेक्टेयर है, जो उनके लक्ष्य का 64 प्रतिशत है। वहीं, बाकी नौ राज्यों ने 32,267 हेक्टेयर (लक्ष्य का 39 प्रतिशत) को कवर किया है। इन राज्यों में तेलंगाना (14,919 हेक्टेयर), आंध्र प्रदेश (12,652 हेक्टेयर), ओडिशा (2,119 हेक्टेयर) और छत्तीसगढ़ (1,465 हेक्टेयर) प्रमुख हैं। बिहार ने भी इस वित्त वर्ष से इस योजना को लागू करते हुए 200 हेक्टेयर का लक्ष्य रखा है।
जानकारों का मानना है कि सोयाबीन, मूंगफली और सरसों जैसी फसलों की तुलना में पाम की फसल पर खराब मौसम का असर बहुत कम होता है। इसलिए इसे तिलहन कार्यक्रम में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है।
ताड़ की खेती के नए केंद्र उभर रहे, किसानों को अच्छा दाम
जानकारो के अनुसार, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना इस खेती में सबसे आगे हैं, लेकिन अब नए इलाके भी तेजी से उभर रहे हैं। जानकारों के अनुसार, किसानों को अब ताजे फलों के गुच्छे (FFB) के बहुत अच्छे दाम मिल रहे हैं। साल 2023 में इसकी कीमत लगभग 12,500 रुपये प्रति टन थी, जो आज बढ़कर करीब 20,000 रुपये प्रति टन हो गई है। इससे किसानों की कमाई में काफी सुधार हुआ है।
खाद्य तेल पर विदेशी निर्भरता को कम करने की पहल
राष्ट्रीय खाद्य तेल मिशन को अगस्त 2021 में शुरू किया गया था, जिसका मकसद ताड़ के साथ पारंपरिक फसलों के उत्पादन को बढ़ाना है। इसका मुख्य लक्ष्य 2025-26 तक कच्चे पाम तेल का उत्पादन बढ़ाकर 11.20 लाख टन करना है। इस योजना के तहत केंद्र और राज्य सरकारें मिलकर खर्च उठाती हैं। सामान्य राज्यों के लिए यह अनुपात 60:40 है, जबकि पूर्वोत्तर राज्यों के लिए 90:10 का अनुपात रखा गया है।
आंकड़ों के अनुसार, इस साल योजना के लिए 757.62 करोड़ रुपये का बजट रखा गया था, जिसमें से केंद्र ने राज्यों को 583.23 करोड़ रुपये जारी कर दिए हैं। हालांकि, अब तक राज्यों ने 40 प्रतिशत से भी कम फंड का इस्तेमाल किया है। आंध्र प्रदेश, केरल, नागालैंड और मिजोरम ने अपने हिस्से का 50% से अधिक खर्च कर लिया है, जबकि गुजरात ने मात्र 6%, ओडिशा ने 15%, छत्तीसगढ़ ने 22% और असम व मणिपुर ने 24-24% फंड का ही इस्तेमाल किया है।
बाजार भाव गिरने पर सरकार देती है सुरक्षा
किसानों को बाजार में उतार-चढ़ाव से बचाने के लिए सरकार ने वायबिलिटी गैप पेमेंट की व्यवस्था की है। इसके तहत अगर पाम के फलों का बाजार भाव सरकार द्वारा तय कीमत (जो हर पाम ऑयल वर्ष: नवंबर-अक्टूबर के लिए घोषित होती है) से नीचे गिर जाता है, तो नुकसान की भरपाई सरकार सीधे किसानों के बैंक खाते (DBT) में करती है।
अब तक देश में पाम ऑयल का कुल रकबा बढ़कर 6.96 लाख हेक्टेयर हो गया है। इसमें से 3.28 लाख हेक्टेयर क्षेत्र इसी राष्ट्रीय मिशन के तहत जोड़ा गया है।
खेती और उपकरणों के लिए भारी सब्सिडी
सरकार पूर्वोत्तर राज्यों के किसानों को पौधे लगाने, प्रबंधन और पहाड़ी क्षेत्र की चुनौतियों (जैसे जमीन साफ करना, बाड़ लगाना आदि) से निपटने के लिए प्रति हेक्टेयर 1,00,000 रुपये की विशेष मदद दे रही है। इसके अलावा, कटाई के उपकरणों की खरीद के लिए भी 2,90,000 रुपये की आर्थिक सहायता दी जा रही है।
शुरुआती सालों की चुनौती और समाधान
जानकारों के अनुसार, इस खेती में सबसे बड़ी चुनौती यह है कि फसल से व्यावसायिक उपज मिलने में 3 से 4 साल का समय लग जाता है। इस अवधि में किसान पाम के पेड़ों के बीच खाली जगह पर अंतर-फसल (सह-फसली खेती) कर सकते हैं। किसान सब्जियां, दालें और हल्दी जैसी कम समय वाली फसलें उगाकर अपनी बीच की आमदनी बनाए रख सकते हैं।
किसानों की मदद के लिए गोदरेज के 'समाधान' केंद्र लगभग 2,000 हेक्टेयर क्षेत्र में तकनीकी मार्गदर्शन, बिना गारंटी के कर्ज और खेती से जुड़ी जरूरी सलाह दे रहे हैं।
प्रसंस्करण सुविधा पर भी करना होगा फोकस
जानकारों के अनुसार, ताड़ के फलों की कटाई के 24 घंटे के भीतर उनकी प्रोसेसिंग करना जरूरी होता है। इसलिए, जैसे-जैसे खेती का रकबा बढ़ रहा है, उसी रफ्तार से प्रोसेसिंग मिलों और कलेक्शन सेंटरों का विस्तार करना भी बेहद जरूरी है। इसके लिए गांवों की सड़कों, यातायात सुविधाओं और खरीद नेटवर्क में निवेश करना महत्वपूर्ण होगा।