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Drought Hits Western Rajasthan Rabi Sowing In Danger Scientists Advise Farmers
पश्चिमी राजस्थान में सूखे की मार : रबी की बुवाई पर संकट, वैज्ञानिकों ने किसानों को दी ये सलाह
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Thu, 29 Oct 2026 05:04 PM IST
सार
पश्चिमी राजस्थान में बारिश की कमी से रबी की बुवाई पर संकट गहराया। जानें चना, रायड़ा और तारामीरा की खेती बचाने, मिट्टी की नमी बनाए रखने और कम पानी में फसल लेने के लिए वैज्ञानिकों ने क्या सलाह दी।
पश्चिमी राजस्थान में बारिश की कमी से खरीफ फसलों को नुकसान हुआ है। अब इसका असर रबी सीजन की बुवाई पर भी पड़ने की आशंका है। पाली, जालोर और बाड़मेर समेत जोधपुर संभाग के कई इलाकों में खेतों की मिट्टी में नमी कम होने से चना, रायड़ा और तारामीरा की खेती प्रभावित हो सकती है।
जुलाई में अच्छी बारिश के बाद किसानों ने खरीफ फसलों की बुवाई की थी, लेकिन 2 अगस्त के बाद बारिश नहीं होने से खेतों में पानी और नमी का संकट बढ़ गया। इससे मूंग की फसल को भी नुकसान पहुंचा है। हालात को देखते हुए कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को फसल का चुनाव सोच-समझकर करने, मिट्टी की नमी बचाने और सिंचाई के पानी का सही इस्तेमाल करने की सलाह दी है।
पाली, जालोर और बाड़मेर में मूंग की फसल को नुकसान
पश्चिमी राजस्थान में बारिश की कमी का असर खासकर पाली, जालोर और बाड़मेर जिलों में दिखाई दे रहा है। जुलाई में अच्छी बारिश होने से किसानों को बेहतर फसल की उम्मीद थी, लेकिन अगस्त की शुरुआत के बाद बारिश थमने से फसलों की बढ़वार प्रभावित हुई। मूंग की फसल को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचने की आशंका है। इससे किसानों के लिए खेती की लागत निकालना भी मुश्किल हो सकता है।
केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (काजरी), जोधपुर के प्रधान वैज्ञानिक डॉ. एच.आर. माहला के मुताबिक, बारिश की कमी का असर केवल खरीफ की फसलों तक सीमित नहीं रहेगा। मिट्टी में नमी कम होने से रबी सीजन की फसलों की बोआई और उत्पादन पर भी असर पड़ सकता है।
मिट्टी में नमी नहीं तो कैसे होगी रबी की बुवाई?
जोधपुर संभाग और पाली जिले के कई इलाकों में किसान मिट्टी में बारिश के बाद बची नमी के सहारे रबी की फसल बोते हैं। लेकिन अगस्त और सितंबर में पर्याप्त बारिश नहीं होने से खेतों की नमी काफी कम हो गई है। ऐसे में चना, रायड़ा और तारामीरा की बोआई का रकबा घटने की आशंका है।
वैज्ञानिकों के मुताबिक, बीज के अंकुरण और पौधों की शुरुआती बढ़वार के लिए मिट्टी में पर्याप्त नमी होना जरूरी है। नमी की कमी के बावजूद बिना योजना के बुवाई करने से बीज और मजदूरी पर खर्च बेकार जा सकता है। इसलिए किसानों को खेत की स्थिति देखकर ही फसल का चुनाव करना चाहिए।
कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को दें प्राथमिकता
कृषि वैज्ञानिकों ने सलाह दी है कि जिन खेतों में नमी बहुत कम है, वहां किसान पानी की अधिक जरूरत वाली फसलों के बजाय कम अवधि में तैयार होने वाली फसलों पर विचार करें। ऐसे इलाकों में जीरा, ईसबगोल और मेथी जैसी फसलों के विकल्प पर विचार किया जा सकता है। हालांकि, फसल का चुनाव स्थानीय मिट्टी, उपलब्ध पानी और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर करना चाहिए।
जिन किसानों के पास सिंचाई के सीमित साधन हैं, वे अपने क्षेत्र के लिए उपयुक्त कम अवधि वाली उन्नत किस्मों का चुनाव कर सकते हैं। इससे उपलब्ध पानी का बेहतर इस्तेमाल करने और फसल पर जोखिम कम करने में मदद मिल सकती है।
खेत की नमी बचाने के लिए अपनाएं ये तरीके
मिट्टी में बची नमी को लंबे समय तक बनाए रखने के लिए वैज्ञानिकों ने कुछ जरूरी उपाय सुझाए हैं।
जोताई के बाद पाटा चलाएं : जोताई के तुरंत बाद खेत में पाटा चलाने से मिट्टी की ऊपरी सतह बंद होती है और नमी के नुकसान को कम करने में मदद मिल सकती है।
फसल अवशेषों का इस्तेमाल करें : खेत में उपलब्ध खरपतवार और फसल अवशेषों से मिट्टी को ढकने पर पानी के वाष्पीकरण को कम किया जा सकता है।
फसल का चुनाव सोच-समझकर करें : खेत में नमी और सिंचाई की उपलब्धता के अनुसार ही फसल और किस्म चुनें।
जरूरत के मुताबिक सिंचाई करें : पानी की कमी होने पर फसल की जरूरी अवस्था में सिंचाई को प्राथमिकता दें।
कम पानी में सिंचाई के तरीके अपनाने की सलाह
जिन किसानों के पास ट्यूबवेल या डिग्गी में सीमित पानी उपलब्ध है, उन्हें पानी का इस्तेमाल सावधानी से करना चाहिए। वैज्ञानिकों ने बाढ़ विधि से सिंचाई करने के बजाय टपक सिंचाई या फव्वारा पद्धति अपनाने की सलाह दी है। इन तरीकों से पानी का बेहतर इस्तेमाल किया जा सकता है।
पानी की भारी कमी होने पर खेत में बार-बार सिंचाई करने के बजाय फसल की जरूरत और उसकी अवस्था को ध्यान में रखकर पानी देना चाहिए। इससे सीमित जल संसाधनों का सही उपयोग करने में मदद मिलेगी।
किसानों के लिए जरूरी सलाह : पश्चिमी राजस्थान में बारिश की कमी को देखते हुए रबी की बोआई जल्दबाजी में न करें। पहले खेत में नमी की स्थिति, सिंचाई के लिए उपलब्ध पानी और फसल की जरूरत का आकलन करें। जरूरत पड़ने पर स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विशेषज्ञ से सलाह लेकर ही फसल और किस्म का चुनाव करें।
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