चीनी व्यापारियों के संगठन ऑल इंडिया शुगर ट्रेड एसोसिएशन ने सरकार के सामने चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य को 31 रुपये से बढ़ाकर 42 रुपये प्रति किलो करने की मांग की है। इसके अलावा संस्था ने गन्ना किसानों के लिए सरकार द्वारा तय किए गए भाव का समर्थन करते हुए इसे पूरी तरह से उचित बताया है।
दूसरी तरफ सरकार ने हाल ही में गन्ना किसानों और चीनी उद्योग की मांगों को देखते हुए रमेश चंद की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया है।
चीनी का रेट 4,200 रुपये प्रति क्विंटल करने की मांग
एसोसिएशन के अध्यक्ष प्रफुल्ल विठलानी कहते हैं कि साल 2019 के फरवरी महीने के बाद से चीनी के न्यूनतम बिक्री मूल्य में कोई बदलाव नहीं हुआ है। संस्था का कहना है कि इसे कम से कम 4,200 रुपये प्रति क्विंटल किया जाना चाहिए। इस बढ़ोतरी का मुख्य उद्देश्य तय करना है कि चीनी मिलों को अपनी उत्पादन लागत से कम कीमत पर चीनी न बेचनी पड़े।
रमेश चंद समिति ने बेंगलुरु और फिर 4 नवंबर को पुणे में गन्ना उत्पादक किसानों से मुलाकात की। पुणे की इस बैठक में AISTA का एक प्रतिनिधिमंडल भी शामिल हुआ था।
भारत में गन्ने का दाम सबसे ज्यादा, किसान आंदोलन पर कही बड़ी बात
सरकार ने 5 मई को 2026-27 सीजन (अक्टूबर-सितंबर) के लिए गन्ने का उचित और लाभकारी मूल्य (FRP) 365 रुपये प्रति क्विंटल तय किया था। यह कीमत 10.25 प्रतिशत की बुनियादी चीनी रिकवरी दर पर आधारित है। संस्था के अध्यक्ष विठलानी के अनुसार, उस समय
सभी संबंधित पक्षों ने इस कीमत को स्वीकार कर लिया था, इसलिए अब इस मुद्दे पर आंदोलन करने का कोई कारण नहीं दिखता है। संस्था ने यह भी बताया कि भारत में गन्ने की कीमतें दुनिया में सबसे ज्यादा हैं।
गन्ना भुगतान के लिए गुजरात मॉडल लागू करने का सुझाव
किसानों के गन्ना भुगतान को लेकर संस्था ने समिति को गुजरात मॉडल का अध्ययन करने का सुझाव दिया है। इस दो-तरफा मॉडल में किसानों के पास दो विकल्प होंगे। पहला विकल्प- किसान अपनी फसल देने के 7 से 14 दिनों के अंदर पूरा FRP (तय मूल्य) ले लें। दूसरा विकल्प- अगर किसान तीन किस्तों में भुगतान लेना स्वीकार करते हैं, तो उन्हें FRP के साथ 10 प्रतिशत अतिरिक्त (प्रीमियम) राशि दी जाए।
सूखे की मार, गन्ने से इथेनॉल उत्पादन में गिरावट का खतरा
संस्था ने पेट्रोल में 20 प्रतिशत इथेनॉल मिलाने के सरकारी कार्यक्रम के तहत इथेनॉल प्लांट लगाने वाली मिलों के लिए भी राहत की मांग की है। संस्था के मुताबिक, खराब मौसम के कारण मौजूदा और अगले चीनी सीजन में गन्ने में रस की कमी होने की आशंका है। इससे इथेनॉल का उत्पादन घटेगा और चीनी मिलें अपना कर्ज नहीं चुका पाएंगी।
इथेनॉल कारखानों के लोन में रियायत की मांग
इस संकट से बचने के लिए संस्था ने सरकार से मांग की है कि इथेनॉल प्रोजेक्ट के लिए लिए गए लोन के मूलधन और ब्याज चुकाने पर दो साल की मोहलत दी जाए। इसके अलावा संस्था ने कहा है कि इन दो सालों के दौरान सरकार ब्याज पर मिलने वाली अपनी सब्सिडी को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 100 प्रतिशत कर दे, ताकि मिलों के ये लोन बैड डेब्ट में न बदलें।