उत्तर प्रदेश के किसानों के लिए खुशखबरी है, जिनका गन्ना भुगतान 1990 के दशक से मिलों पर बकाया है। दरअसल इलाहाबाद हाईकोर्ट में कुल 1,936 करोड़ रुपये के गन्ना बकाये का मामला चल रहा रहा है। हाइकोर्ट ने 15 प्रतिशत ब्याज दर के बजाय 12 प्रतिशत पर रिकवरी सर्टिफिकेट जारी करने पर नाराजगी जताई थी।
आंकड़ों के अनुसार, 1,936 करोड़ रुपये के गन्ना बकाये में 849.5 करोड़ रुपये ब्याज की रकम है। हाइकोर्ट के इस रुख ने साफ कर दिया कि मिलों को 15 प्रतिशत की दर से ही किसानों को भुगतान करना होगा। हालांकि यूपी सरकार ने इस मामले को सुप्रीम कोर्ट में 6 अक्तूबर को उठाया। राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय में तर्क दिया कि आर्थिक संकट का सामना कर रही चीनी मिलों को 15 प्रतिशत ब्याज के हिसाब से भुगतान उन्हें दिवालिया होने की कगार पर धकेल सकता है और मिलें बंद होने से किसानों को ही नुकसान होगा। सरकार की ओर से यूपी गन्ना (पूर्ति और खरीद विनियमन) अधिनियम, 1953 की धारा 17(3) का हवाला देते हुए ब्याज कम या माफ करने की गुहार लगाई थी।
14 दिन की देरी, ब्याज भुगतान अनिवार्य
सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की इन दलीलों को खारिज कर दिया। सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि 14 दिनों की समयसीमा और 15 प्रतिशत ब्याज का प्रावधान किसानों को कर्ज के जाल से बचाने के लिए कानूनी तौर पर अनिवार्य सुरक्षा उपाय है। कानून के तहत मिलों को गन्ना आपूर्ति के 14 दिनों के भीतर भुगतान करना जरूरी होता है, और इसके बाद देरी होने पर ब्याज देना अनिवार्य हो जाता है।
30 साल लंबी कानूनी लड़ाई
साल 2006 में इस मामले को लेकर जनहित याचिका दायर करने वाले राष्ट्रीय किसान मजदूर संगठन के अध्यक्ष और पूर्व जनता दल विधायक वी.एम. सिंह के अनुसार, यह फैसला उनकी सालों की लंबी लड़ाई की बड़ी जीत है। उन्होंने कहा कि यह आदेश एक बहुत बड़ी उपलब्धि है और 30 साल तक इंतजार करने का दर्द केवल एक किसान ही समझ सकता है।
असल देनदारी काफी ज्यादा, साल दर साल के हिसाब से ब्याज का पूरा हिसाब सामने आए
दूसरी तरफ, किसान नेताओं का एक वर्ग हर किसान के साल दर साल के बकाया ब्याज का पूरा हिसाब सार्वजनिक पटल पर रखने की मांग कर रहा है। इस वर्ग का तर्क है कि असल देनदारी दिखाए जा रहे आंकड़ों के कहीं ज्यादा है।
किसान नेताओं के अनुसार, भुगतान में देरी की सबसे बड़ी मार छोटे किसानों को झेलनी पड़ी है। खेती-बाड़ी में निवेश से लेकर बेटियों किी शादी जैसे जरूरी खर्चों में चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। दशकों पुराने इस बकाये के बीच गन्ना आपूर्ति करने वाले कई किसानों का अब निधन हो चुका है, लेकिन आज भी कई परिवारों के पास उस समय की तौल पर्चियां सुरक्षित रखी हैं।