बासमती धान उगाने वाले किसानों को इस साल फसल के अच्छे दाम मिल रहे हैं। पिछले साल जहां बासमती चावल की कीमत 28 रुपये प्रति किलो के आसपास थी, वहीं इस साल बढ़कर 42 से 45 रुपये प्रति किलो हो गई है। यानी कीमतों में करीब 53 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। शुरुआती किस्म पूसा 1509 की बाजार में आवक के साथ ही पंजाब और हरियाणा की मंडियों में भी बासमती के अच्छे भाव मिल रहे हैं।
हालांकि, बासमती की कीमतों में इस बढ़ोतरी की वजह केवल घरेलू बाजार में कम उत्पादन नहीं है। विशेषज्ञों के मुताबिक, पश्चिम एशिया और खाड़ी देशों में बासमती चावल की मांग बढ़ने से कीमतों में उछाल आया है। अमेरिका-ईरान तनाव और होर्मुज जलडमरूमध्य में समुद्री व्यापार प्रभावित होने की आशंका के बीच खाड़ी देश चावल का भंडार बढ़ा रहे हैं।
खाड़ी देशों में बढ़ी मांग, कीमतों को मिला सहारा
अमृतसर के पूर्व उपायुक्त और सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी केबीएस सिद्धू ने द प्रिंट को बताया कि खाड़ी देशों में बासमती चावल का भंडार बढ़ाने की कोशिशों से इसकी मांग में तेजी आई है। अंतरराष्ट्रीय हालात में अनिश्चितता के कारण ये देश खाद्यान्न का पर्याप्त स्टॉक रखना चाहते हैं।
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चावल निर्यातक देश है। भारत हर साल दो करोड़ टन से अधिक चावल का निर्यात करता है, जिसमें करीब 60 लाख टन बासमती चावल शामिल है। भारतीय बासमती का आधे से अधिक निर्यात पश्चिम एशिया के देशों में होता है। इनमें सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात (यूएई), यमन और ईरान प्रमुख हैं। दुनिया में बासमती चावल की मांग का लगभग 70 से 80 फीसदी हिस्सा भारत पूरा करता है। पाकिस्तान बासमती का दूसरा बड़ा निर्यातक देश है।
पिछले साल 28 रुपये था भाव, अब 45 रुपये किलो तक उम्मीद
भारत में बासमती धान के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) तय नहीं है। ऐसे में किसानों को मिलने वाला भाव काफी हद तक अंतरराष्ट्रीय मांग और बाजार की स्थिति पर निर्भर करता है। पिछले साल बासमती चावल की कई किस्मों के दाम 24 से 28 रुपये प्रति किलो के बीच थे। हरियाणा के उचाना क्षेत्र के किसान अनिल बेनीवाल ने इस साल अपने चार एकड़ खेत में बासमती की 1121 किस्म उगाई है। उनका कहना है कि मौजूदा बाजार भाव को देखते हुए उन्हें 45 से 50 रुपये प्रति किलो तक कीमत मिलने की उम्मीद है।
हालांकि, किसानों के लिए अच्छी कीमत मिलने के बावजूद खेती की लागत एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। बेनीवाल के मुताबिक, बासमती की खेती में सामान्य धान की तुलना में कम पानी लगता है, लेकिन इसके लिए अच्छी गुणवत्ता वाला पानी जरूरी है। अगर ट्यूबवेल के पानी में कठोरता अधिक है, तो फसल उगाने में परेशानी हो सकती है। उन्होंने बताया कि इस साल कटाई के आखिरी दौर में बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि से उत्पादन पर कुछ असर पड़ा है। इससे भी कीमतों को सहारा मिल सकता है।
होर्मुज संकट के बीच चावल का स्टॉक बढ़ा रहे देश
ऑल इंडिया राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन (एआईआरईए) ने 12 अक्टूबर को बताया था कि बासमती की कीमतों में तेजी से किसानों को फायदा मिल रहा है। संगठन ने इसे पश्चिम एशिया के संकट से जुड़ा बताया। अमेरिका और ईरान के बीच फरवरी 2026 में शुरू हुए संकट के बाद होर्मुज जलडमरूमध्य से व्यापारिक जहाजों की आवाजाही प्रभावित हुई। यह समुद्री मार्ग फारस की खाड़ी तक पहुंचने के लिए बेहद अहम है।
मार्च की शुरुआत में करीब चार लाख टन भारतीय बासमती चावल के बंदरगाहों और रास्ते में फंसे होने की खबर आई थी। इसमें मुंद्रा और कांडला जैसे भारतीय बंदरगाहों पर मौजूद चावल भी शामिल था, जिसे पश्चिम एशिया भेजा जाना था।
हालांकि, पंजाब बासमती राइस एक्सपोर्टर्स एसोसिएशन के प्रमुख अशोक सेठी के मुताबिक, मौजूदा तेजी की वजह केवल समुद्री रास्ते में आई रुकावट नहीं है। पश्चिम एशिया के देशों में खाद्यान्न की खपत और भंडारण की रणनीति में बदलाव भी इसकी बड़ी वजह है। उन्होंने कहा कि क्षेत्र के देशों को कीमतों में उतार-चढ़ाव और आपूर्ति को लेकर अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए वे बासमती चावल का पर्याप्त भंडार रखना चाहते हैं।
कम उत्पादन नहीं, ज्यादा खरीद है तेजी की बड़ी वजह
भारत ने वर्ष 2025 में करीब 65 लाख टन बासमती चावल का निर्यात किया था, जो पिछले दस वर्षों में सबसे अधिक था। इस साल किसानों और कारोबारियों के अनुमानों के मुताबिक, उत्पादन और आपूर्ति में बहुत बड़ी गिरावट नहीं है। ऐसे में कीमतों में बढ़ोतरी की प्रमुख वजह कम उत्पादन के बजाय खाड़ी देशों की ओर से ज्यादा खरीद और भंडार बढ़ाने की कोशिश मानी जा रही है।
सेठी का कहना है कि बासमती पंजाब की जलवायु और खेती के लिहाज से उपयुक्त फसल है। इसमें सामान्य धान की तुलना में कम पानी की जरूरत होती है। इसलिए कीमतों में उतार-चढ़ाव के बावजूद पंजाब के किसानों को इसकी खेती पर विचार करना चाहिए।
अच्छे भाव के बावजूद किसान क्यों सतर्क?
बासमती के बढ़ते दाम से किसानों को राहत जरूर मिली है, लेकिन वे इसे लंबे समय तक बने रहने वाली स्थिति नहीं मान रहे हैं। इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि बासमती के लिए एमएसपी की गारंटी नहीं है और इसकी कीमतें अंतरराष्ट्रीय बाजार पर निर्भर करती हैं। अमृतसर के किसान जगजीत सिंह के मुताबिक, एक साल अच्छे भाव मिलने का मतलब यह नहीं है कि अगले साल भी कीमतें ऐसी ही रहेंगी। खेती में बीज, खाद, सिंचाई और दूसरे खर्च अधिक होने के कारण किसान बिना भरोसे के बड़े पैमाने पर बासमती की खेती बढ़ाने से बच सकते हैं।
विशेषज्ञों ने भी किसानों को सावधानी बरतने की सलाह दी है। अगर किसान इस साल ऊंचे दाम देखकर बासमती का रकबा बढ़ा देते हैं और अगले साल अंतरराष्ट्रीय मांग घट जाती है, तो उन्हें नुकसान हो सकता है। किसानों के लिए जरूरी बात: इस साल बासमती के अच्छे भाव मिलने से फायदा हो सकता है, लेकिन अगले सीजन में इसकी कीमत की गारंटी नहीं है। इसलिए किसानों को खेती का फैसला लेने से पहले उत्पादन लागत, पानी की उपलब्धता, स्थानीय मंडी के भाव और निर्यात की मांग को ध्यान में रखना चाहिए।
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