आंध्र प्रदेश के रायलसीमा क्षेत्र में कभी भी फलों और सब्जियों के उत्पादन की कोई कमी नहीं रही है, लेकिन बंपर उपज का मतलब हमेशा किसानों के लिए मुनाफा नहीं होता। अक्सर मंडियों में फसल की बंपर आवक कीमतों को गिरा देती है और किसानों को मजबूरी में कम रेट पर अपनी उपज बेचनी पड़ती है। इस जमीनी हकीकत को बदलने के लिए शुक्रवार को मदनपल्ले में एक लाख करोड़ रुपये के ग्लोबल हॉर्टिकल्चर हब की नींव रखी गई है। यह परियोजना किसानों को पज का बेहत भाव दिलाने और बिचौलियों पर निर्भरता खत्म करने के कड़ी में एक बदलाव के रूप में देखी जा रही है।
बंपर पैदावार लेकिन मजबूरी में बिक्री
गर्मियों में चित्तूर या तिरुपति के आम के बाग हों, दक्षिण भारत के सबसे बड़े व्यापारिक केंद्रों में से एक मदनपल्ले की टमाटर मंडी हो, या नेल्लोर (गुडूर) से लेकर अन्नमय्या, कडपा, कुरनूल और अनंतपुर तक फैले केले, पपीते और नींबू के खेत हों; रायलसीमा हर साल लाखों टन पैदावार करता है। लेकिन फसल के जल्दी खराब होने की प्रकृति और कोल्ड स्टोरेज की भारी कमी के कारण किसानों के पास कमीशन एजेंटों और व्यापारियों के मनमाने दाम स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं होता है। कई बार मदनपल्ले मंडी में टमाटर के दाम 2 से 3 रुपये प्रति किलो तक गिर जाते हैं, जिससे तुड़ाई और क्रेट का खर्च भी नहीं निकल पाता। वहीं कडपा में, जहां 83,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में बागवानी होती है, दाम गिरने पर किसानों को अक्सर केले और पपीते को राजमार्गों पर फेंकने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
हॉर्टिकल्चर हब से क्या बदलाव आएगा?
ग्लोबल हॉर्टिकल्चर हब योजना का मुख्य उद्देश्य रायलसीमा के दस जिलों में कलेक्शन सेंटर, पैक-हाउस, कोल्ड स्टोरेज और प्रोसेसिंग यूनिट्स का एक मजबूत नेटवर्क तैयार करना है। अकेले कडपा जिले में इस परियोजना के तहत 75,000 हेक्टेयर अतिरिक्त क्षेत्र को बागवानी से जोड़ने की योजना है। इस हब के जरिए यह तय किया जाएगा कि किसान अपनी फसल को बिना सड़े कम से कम एक हफ्ते तक सुरक्षित रख सकें और कमीशन एजेंटों पर निर्भर रहे बिना सीधे अच्छे दामों पर बेच सकें। स्थानीय किसानों का मानना है कि इस योजना का असली फायदा तभी मिलेगा जब अगली बड़ी फसल आने से पहले स्थानीय प्रोसेसिंग इकाइयां और कोल्ड रूम पूरी तरह से चालू हो जाएं।
अलग-अलग जिलों में किसानों की मुख्य चुनौतियां
हर जिले के किसानों की अपनी अलग समस्या है। चित्तूर में लगभग 1.12 लाख हेक्टेयर में आम की खेती होती है, जिसमें 86,000 हेक्टेयर में केवल 'तोतापुरी' आम उगाया जाता है जो स्थानीय पल्प (गूदा) फैक्ट्रियों में जाता है। कागजों पर यहां बड़ा पल्प उद्योग है, लेकिन फैक्ट्री मालिक मनमाने ढंग से कीमतें तय करते हैं, भुगतान में देरी करते हैं और फैक्ट्री के गेट पर गुणवत्ता के नाम पर पैसे काट लेते हैं। तिरुपति में तरबूज और नींबू उगाने वाले किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती फसल का जल्दी खराब होना है। हालांकि राज्य ने 2024-25 में सूक्ष्म-सिंचाई योजना (एपीएमआईपी) के तहत 2,400 हेक्टेयर क्षेत्र को जोड़ा है, लेकिन किसानों का कहना है कि इसके साथ तत्काल बाजार कनेक्टिविटी भी होनी चाहिए। कुरनूल में 24,000 हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में प्याज की खेती करने वाले किसान कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव से परेशान हैं।
अनंतपुर में सूखे की मार और पानी का भारी संकट
इन सब से अलग अनंतपुर जिले में बागवानी करने वाले किसानों के सामने पानी खत्म होने का एक गंभीर और अस्तित्व का खतरा मंडरा रहा है। 2023 के जिला सर्वेक्षण के अनुसार, यहां 4,608 हेक्टेयर में बागवानी होती है, जिसमें मुख्य रूप से मीठा संतरा (2,851.91 हेक्टेयर), केला (655.66 हेक्टेयर), आम और अनार शामिल हैं। यहां तेजी से बोरवेल सूख रहे हैं और किसानों को सूखे के मौसम में अपने बागों को जिंदा रखने के लिए पानी के टैंकरों पर हजारों रुपये खर्च करने पड़ रहे हैं।
सफलता का असली पैमाना क्या होगा?
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पूरे आंध्र प्रदेश में 18.23 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में 365 लाख टन से अधिक बागवानी उपज होती है, जो राज्य की अर्थव्यवस्था (जीवीए) में 60,000 करोड़ रुपये से अधिक का योगदान देती है। आंकड़े बहुत प्रभावशाली हैं, लेकिन रायलसीमा के किसानों के लिए 'ग्लोबल हॉर्टिकल्चर हब' की सफलता बड़े निवेश लक्ष्यों या परियोजना के उद्घाटन से नहीं मापी जाएगी। उनके लिए इस हब की सफलता का केवल एक ही पैमाना है- क्या यह प्रोजेक्ट उन्हें ग्राहकों द्वारा चुकाई गई कीमत का एक बड़ा हिस्सा दिला पाएगा?