खेत में फसल उगाने के साथ सौर ऊर्जा पैदा करने की तकनीक को बढ़ावा देने के लिए नई दिल्ली के भारत मंडपम में 7वें एग्रीवोल्टिक्स विश्व सम्मेलन का उद्घाटन हुआ। इसमें कृषि वैज्ञानिकों, नीति निर्माताओं और ऊर्जा विशेषज्ञों ने खेती और सौर ऊर्जा उत्पादन को एक साथ आगे बढ़ाने पर चर्चा की। सम्मेलन में छोटे और सीमांत किसानों के लिए उपयोगी मॉडल विकसित करने, फसलों पर सोलर पैनलों की छाया के असर को समझने और किसानों की आमदनी बढ़ाने पर जोर दिया गया।
केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि एग्रीवोल्टिक्स के ऐसे मॉडल विकसित करने की जरूरत है, जो छोटे और सीमांत किसानों की जरूरतों के अनुकूल हों। उन्होंने इस तकनीक पर शोध और इसे अपनाने के लिए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) तथा नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय (एमएनआरई) के बीच सहयोग का भरोसा दिया। उन्होंने देश के 15 कृषि-जलवायु क्षेत्रों की अलग-अलग मौसम परिस्थितियों और खेती की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए फसलों के चयन का वैज्ञानिक आधार तैयार करने पर भी जोर दिया।
क्या है एग्रीवोल्टिक्स तकनीक?
एग्रीवोल्टिक्स ऐसी तकनीक है, जिसमें एक ही जमीन पर खेती और सौर ऊर्जा का उत्पादन किया जाता है। खेत में सोलर पैनल इस तरह लगाए जाते हैं कि उनके नीचे या आसपास फसल उगाई जा सके। हालांकि, इसके लिए पैनलों की ऊंचाई, उनके बीच की दूरी और फसल की धूप की जरूरत का ध्यान रखना जरूरी है।
इस तकनीक से जमीन का दोहरा उपयोग हो सकता है। किसानों को फसल से कमाई के साथ सौर ऊर्जा उत्पादन से भी लाभ मिलने की संभावना रहती है। लेकिन इसका फायदा फसल, क्षेत्र की जलवायु और पैनलों की व्यवस्था पर निर्भर करता है।
खेती और सौर ऊर्जा को जोड़ने पर जोर
केंद्रीय नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्री प्रल्हाद जोशी ने भी एग्रीवोल्टिक्स को आगे बढ़ाने के लिए एमएनआरई और कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत बताई। कृषि अनुसंधान एवं शिक्षा विभाग के सचिव और आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एमएल जाट ने जोधपुर और नई दिल्ली में इस क्षेत्र में आईसीएआर के शोध कार्यों का उल्लेख किया। उन्होंने कृषि क्षेत्रों में उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करके इस तकनीक का दायरा बढ़ाने की जरूरत बताई।
उन्होंने देश में मौजूद करीब 14 लाख कृषि तालाबों और खेतों के बड़े तटबंधों का उपयोग करने की संभावनाओं पर भी चर्चा की। उनके मुताबिक, एग्रीवोल्टिक्स को कृषि वानिकी और पशुपालन के साथ जोड़कर खेती की टिकाऊ व्यवस्था विकसित की जा सकती है। डॉ. जाट ने बताया कि सही तरीके से अपनाने पर यह तकनीक खेतों के सूक्ष्म वातावरण को नियंत्रित करने, पानी के संग्रह में मदद करने और कार्बन क्रेडिट के अवसर पैदा करने में भी योगदान दे सकती है।
फसल और सोलर पैनल का सही तालमेल जरूरी
आईसीएआर के उप महानिदेशक (फसल विज्ञान) डॉ. डीके यादव ने सम्मेलन के एक वैज्ञानिक सत्र की अध्यक्षता की। उन्होंने कहा कि अलग-अलग क्षेत्रों के मौसम और फसलों की छाया सहन करने की क्षमता को ध्यान में रखकर फसल संयोजन विकसित किए जाने चाहिए।
हर फसल को धूप की जरूरत अलग-अलग होती है। इसलिए सोलर पैनलों के नीचे कौन-सी फसल बेहतर उगेगी, इसका फैसला वैज्ञानिक अध्ययन और स्थानीय परिस्थितियों के आधार पर करना जरूरी है। इससे बिजली उत्पादन के साथ फसल की पैदावार बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
एग्रीवोल्टिक्स पर नीति पुस्तिका जारी
सम्मेलन के दौरान आईसीएआर और एमएनआरई की ओर से संयुक्त रूप से तैयार ‘भारत में एग्रीवोल्टिक्स ऊर्जा पर नीति पुस्तिका’ का विमोचन किया गया। इसका उद्देश्य देश में एग्रीवोल्टिक्स को बढ़ावा देने के लिए नीतिगत ढांचे को मजबूत करना है।
कार्यक्रम में आईसीएआर के वरिष्ठ अधिकारियों, वैज्ञानिकों और कृषि-फोटोवोल्टिक उत्कृष्टता केंद्र के विद्यार्थियों ने भी भाग लिया। इस दौरान शोध, नई तकनीकों और नवीकरणीय ऊर्जा को टिकाऊ खेती से जोड़ने पर चर्चा हुई।
सम्मेलन में इस बात पर जोर दिया गया कि एग्रीवोल्टिक्स को सफल बनाने के लिए वैज्ञानिक शोध, स्पष्ट नीतियों और विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय जरूरी है। इससे कृषि भूमि का बेहतर इस्तेमाल करने, किसानों की आजीविका को सहारा देने और स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने में मदद मिल सकती है।
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