भारत की सबसे लंबी वेम्बनाड झील में चलाई गई काली सीप से जुड़ी पुनरुत्थान परियोजना के परिणाम सामने आए हैं। केंद्रीय समुद्री मात्स्यिकी अनुसंधान संस्थान के अनुसार, अलप्पुझा जिले के वड़क्कुमकारा में एक हेक्टेयर क्षेत्र में डाले गए बीज के मुकाबले सात से आठ गुना अधिक उत्पादन दर्ज किया गया है। 12 महीने के पालन चक्र के सफल समापन पर एक फसल उत्सवआयोजित कर इस उपलब्धि को रेखांकित किया गया।
पांच टन बीज से तैयार हुई 40 टन फसल
परियोजना के तहत पिछले साल सितंबर में एक हेक्टेयर के दायरे में पांच टन ब्लैक क्लैम के बीज डाले गए थे। सीएमएफआरआई के अनुसार, कटाई के समय सीप की अच्छी वृद्धि देखी गई और उनके जीवित रहने की दर 80 से 90 प्रतिशत तक दर्ज की गई। इस एक हेक्टेयर क्षेत्र से कुल उत्पादन लगभग 40 टन तक पहुंचने का अनुमान है, जो शुरुआती बीज की मात्रा से सात से आठ गुना अधिक है।
यह परियोजना केंद्र सरकार की अनुसूचित जाति उप-योजना के तहत अनुसूचित जाति समुदायों के लिए 100 प्रतिशत सब्सिडी पर संचालित की गई थी। इसमें सीएमएफआरआई ने तकनीकी मार्गदर्शन प्रदान किया और थाइक्काट्टुश्शेरी ब्लैक क्लैम को-ऑपरेटिव सोसाइटी के सहयोग से इसे जमीनी स्तर पर लागू किया गया।
ब्लैक क्लैम वेम्बनाड झील का एक बेहद प्रमुख जलीय संसाधन है, जिसकी हिस्सेदारी भारत के कुल क्लैम संसाधनों में 80 प्रतिशत से भी अधिक है। इस संसाधन पर 6,000 से अधिक परिवारों की आजीविका सीधे तौर पर टिकी है, जबकि इससे दोगुनी संख्या में लोग इससे जुड़ी सहायक गतिविधियों से अपनी रोजी-रोटी कमाते हैं।
सीएमएफआरआई के आकलन के अनुसार, अत्यधिक दोहन और बदलते पर्यावरणीय हालातों के चलते वेम्बनाड में क्लैम की उपलब्धता में लगातार कमी आ रही थी। क्षेत्र में ब्लैक क्लैम की कुल पकड़ वर्ष 2006 के 75,592 टन के उच्चतम स्तर से घटकर वर्ष 2024 में 45,601 टन रह गई थी, जो लगभग 40 प्रतिशत की भारी गिरावट थी। इस पृष्ठभूमि में यह वैज्ञानिक पहल बेहद अहम साबित हुई है।
पारिस्थितिकी तंत्र के सुधार और मछुआरों की आजीविका को मिलेगा मजबूत सहारा
फसल उत्सव का उद्घाटन करते हुए सीएमएफआरआई के निदेशक डॉ. ग्रिन्सन जॉर्ज ने कहा कि यह पहल दिखाती है कि वैज्ञानिक तरीके से घटते क्लैम संसाधनों की भरपाई कैसे की जा सकती है, जिससे मछुआरा समुदायों को दीर्घकालिक आजीविका मिल सके। उन्होंने बताया कि क्लैम जल को साफ रखने वाले (फिल्टर-फीडिंग) जीव हैं, इसलिए इनके प्राकृतिक भंडार में वृद्धि से झील के मुहाने वाले पारिस्थितिकी तंत्र और उसकी उत्पादकता को भी मजबूती मिलेगी।
परियोजना समन्वयक और सीएमएफआरआई की वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विद्या आर. ने बताया कि वैज्ञानिक जांच के बाद चुने गए इस क्षेत्र में पहले से कोई क्लैम मौजूद नहीं था। परियोजना में मानक सैंपलिंग विधियों और उपयुक्त घनत्व के नियमों का पालन किया गया। उन्होंने कहा कि यह परिणाम साबित करता है कि वैज्ञानिक हस्तक्षेप के जरिए प्राकृतिक संसाधनों का पुनरुत्थान, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली और स्थानीय समुदाय का आर्थिक सशक्तिकरण एक साथ संभव है।