जम्मू-कश्मीर में ऑटम सिल्क कोकून नीलामी बाजार शुरू, स्थानीय रेशम उद्योग को बढ़ावा देने की तैयारी।
जम्मू-कश्मीर में हर साल 800 से 900 टन रेशम कोकून का उत्पादन, करीब 27 हजार ग्रामीण परिवार इस काम से जुड़े।
रेशम की रीलिंग के लिए जम्मू और अनंतनाग में दो नई यूनिट लगाने की योजना, 90% तक सब्सिडी का प्रस्ताव।
इस समय 70% से अधिक कच्चा रेशम कोकून बाहरी राज्यों में बिकता है, जिससे स्थानीय स्तर पर प्रसंस्करण और किसानों के लिए मुनाफे की संभावनाएं सीमित।
जम्मू-कश्मीर के कश्मीर संभाग में सिल्क कोकून नीलामी बाजार की शुरुआत कर दी गई है। इसका उद्देश्य रेशम उत्पादन और इससे जुड़े काम को राज्य के भीतर ही बढ़ावा देना है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, फिलहाल यहां रेशम कोकून से धागा बनाने की सुविधा कम होने के कारण 70 प्रतिशत से अधिक कच्चा कोकून पश्चिम बंगाल जैसे बाहरी राज्यों के व्यापारियों को बेच दिया जाता है। बाहरी खरीदारों पर निर्भरता के कारण राज्य के लोग उच्च गुणवत्ता वाले रेशम उत्पाद बनाकर ज्यादा मुनाफा कमाने से चूक जाते हैं।
किसानों की कमाई और नई यूनिट लगाने की तैयारी
आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, जम्मू-कश्मीर हर साल लगभग 800 से 900 टन रेशम कोकून का उत्पादन करता है। इससे लगभग 27,000 ग्रामीण परिवारों की रोजी-रोटी चलती है। इस काम से जुड़े ज्यादातर परिवार आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों से हैं, जिनमें बड़ी संख्या में महिलाएं शामिल हैं।
धागा बनाने की यूनिट पर मिलेगी सब्सिडी
जम्मू-कश्मीर के रेशम पालन विभाग के निदेशक एजाज अहमद भट ने श्रीनगर में इस नीलामी बाजार का उद्घाटन किया। उन्होंने बताया कि राज्य में रेशम के धागा बनाने के लिए दो नई यूनिट लगाने की योजना है- एक जम्मू में और दूसरी अनंतनाग में। भट के अनुसार, सरकार से मंजूरी मिलने के बाद इन यूनिट्स को 90 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाएगी। विभाग का कहना है कि कोकून उत्पादन से लेकर कपड़ा बनाने तक की पूरी प्रक्रिया राज्य में ही विकसित की जानी चाहिए।
अच्छी किस्म का रेशम और स्थानीय उद्योगों को फायदा
विभाग के अनुसार, जम्मू-कश्मीर का मौसम उच्च गुणवत्ता वाले बाइवोल्टाइन रेशम के उत्पादन के लिए बहुत अनुकूल है, जो अपनी चमक और बारीकी के लिए जाना जाता है। हालांकि, इस खासियत का अभी तक पूरा फायदा नहीं उठाया जा सका है। अगर राज्य में ही रेशम तैयार करने का उद्योग मजबूत होता है, तो इससे स्थानीय उद्योगों को बड़ा फायदा होगा। दस्तावेज के अनुसार, कश्मीर का कालीन उद्योग इसका एक बड़ा बाजार बन सकता है, जो फिलहाल बाहर से रेशम मंगाता है।
किसानों के सामने चुनौतियां और सुधार के उपाय
रेशम उत्पादन के क्षेत्र में अभी कई चुनौतियां भी हैं। विभाग के अनुसार, इनमें कम पैदावार, कोकून की कीमतों में उतार-चढ़ाव और कीड़े पालने की उचित जगह न होना शामिल है। आज भी कई किसान कीड़े पालने के लिए अलग और साफ घर बनाने की बजाय अपने रहने वाले घरों का ही इस्तेमाल करते हैं।
अनुसंधान संस्थानों और किसानों की पैदावार के बीच काफी अंतर देखा गया है। सरकार के अनुसार, इसे सुधारने के लिए किसानों को बेहतर ट्रेनिंग, अच्छे किस्म के बीज, शहतूत के पेड़ लगाने और मजबूत तकनीकी मदद देने की जरूरत है।
विभाग ने बाजार तक किसानों की पहुंच आसान बनाने के लिए डिजिटल मार्केटिंग, बेहतर नीलामी बाजार और जम्मू-कश्मीर के रेशम को 'जीआई' (GI) टैग दिलाने जैसे कदम उठाने का भी सुझाव दिया है। निदेशक भट ने कहा कि स्थानीय स्तर पर प्रोसेसिंग सुविधाएं विकसित करना विभाग की बड़ी योजना का हिस्सा है, ताकि ज्यादा से ज्यादा मुनाफा जम्मू-कश्मीर के भीतर ही रहे।