महाराष्ट्र में 2026 के मानसून सीजन की बेरुखी ने 1972 की यादों को ताजा कर दिया है। प्रदेश के लातूर, बीड, धाराशिव और परभणी जिलों में कम बारिश से 80 प्रतिशत फसलें पूरी तरह सूख चुकी हैं। मौसम की इस मार ने आर्थिक मोर्चे पर किसानों को नुकसान पहुंचाया है, जिससे आगामी रबी सीजन में फसलों की बुवाई का काम भी प्रभावित होने का खतरा है। दूसरी तरफ पशु चारे और आगामी रबी के लिए पानी की उपलब्धता को लेकर भी चिंता खड़ी हुई है।
लागत निकलना भी मुश्किल, खेत साफ करने के भी देने पड़ेंगे पैसे
आंकड़े बताते हैं कि जून से सितंबर के दौरान इस इलाके में सामान्य 679.5 मिलीमीटर की जगह मात्र 424.5 मिलीमीटर बादल ही बरसे। इस वजह से खाद्य फसलों के साथ पशुओं के लिए चारे, ग्रामीण मजदूरी और घरेलू आमदनी पर असर पड़ा है।
आंकड़ों के अनुसार, जून से सितंबर के बीच इस इलाके में सामान्य 679.5 मिलीमीटर की जगह केवल 424.5 मिलीमीटर बारिश हुई है। इसका सीधा असर खेती, डेयरी , ग्रामीण मजदूरी और घरेलू आमदनी पर पड़ा है।
अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, सूखे की इस मार की वजह से लातूर के देवकरा गांव से काफी दुखद घटना सामने आई हैं, जहां पहली बार किसी किसान ने आत्महत्या की है।
लागत निकालना मुश्किल, खेत की सफाई पर होगा खर्च
इलाके के किसानों की आर्थिक सेहत खराब हो चुकी है। हिंगणगांव के 40 एकड़ के किसान तुकाराम अंबाजी का कहना है कि वह प्रति एकड़ 30 से 35 हजार रुपये लगा चुके हैं, लेकिन अब फसल से यह लागत निकलना भी मुश्किल लग रहा है। वहीं, सावरगांव रोकड़े के किसान राम बेल्लाडे ने अपनी आठ एकड़ फसल पर डेढ़ लाख रुपये खर्च किए थे। अब उन्हें सूखी फसल को खेत से हटाने के लिए प्रति एकड़ पांच हजार रुपये अतिरिक्त खर्च करने पड़ेंगे। अब जो थोड़ी बहुत फसल बची है, वह सिर्फ पशुओं के चारे के काम आ सकती है। हगदल गांव के किसान बालाजी मुंडे बताते हैं कि गन्ना सामान्य रूप से 20 से 25 फुट तक बढ़ता है, लेकिन इस बार पानी न मिलने से यह 10 से 12 फुट पर ही रुककर सूखने लगा है। 2025 में किसानों ने भारी बारिश का कहर झेला था और इस साल सूखे ने उन्हें बर्बाद कर दिया है।
जलाशयों में बचा सिर्फ 12 फीसदी पानी
फसल के साथ-साथ इलाके में पीने के पानी और सिंचाई का बड़ा संकट खड़ा हो गया है। लातूर की जीवनरेखा मानी जाने वाली माजरा नदी सूख रही है और लातूर शहर से 70 किलोमीटर दूर स्थित माजरा बांध का जलस्तर काफी नीचे चला गया है। लातूर जिले के 158 जलाशयों में अब औसतन सिर्फ 12.5 प्रतिशत पानी ही बचा है। स्थानीय पत्रकार शशिकांत पाटिल के अनुसार, नवाबों के समय का ऐतिहासिक साइ डैम भी इसी बदहाली का शिकार है, जिससे कभी लातूर की प्यास बुझती थी। उनका मानना है कि अगर पानी के रिसाव को रोकने और जल प्रबंधन पर सही से ध्यान दिया जाता, तो इस संकट को कम किया जा सकता था।
1972 के बाद का सबसे भयंकर सूखा
पूर्व जिला परिषद सदस्य त्र्यंबक नारायण गुट्टे इसे 1972 के बाद का सबसे भयंकर सूखा मानते हैं। किसानों के सामने अब तीन तरह के संकट आ गए हैं- पहले बुआई में परेशानी हुई, फिर फसल बचाने की जद्दोजहद और अब सूखी फसल को हटाकर अगली खेती के लिए पूंजी जुटाने की चिंता।
प्रदेश की अधिकतर तहसीलें सूखे का शिकार, सरकार की तैयारी
महाराष्ट्र सरकार के अनुसार, हालात को देखते हुए राहत कार्य शुरू कर दिए गए हैं। सरकार ने पहले 265 तालुकों और बाद में 43 अन्य तालुकों को सूखा प्रभावित सूची में शामिल किया है। खेतों में नुकसान के पंचनामे (सर्वे) और पानी-चारे की व्यवस्था पर काम चल रहा है।
अधिकारियों के अनुसार, इस सूखे से निपटने के लिए सरकारी खजाने पर 50 हजार करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है। हालांकि, खेतों में खड़े किसानों को फिलहाल नुकसान की भरपाई, पानी-चारे के इंतजाम के साथ-साथ अगली फसल तक अपना परिवार चलाने के लिए तुरंत आर्थिक मदद की सख्त जरूरत है।