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Women Sweat In Fields Yet Banks Refuse To Accept Farmers Major Hurdle In Getting Loans
खेतों में पसीना बहाती हैं महिलाएं : फिर भी बैंक नहीं मानते किसान... कर्ज पाने में बड़ी बाधा
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Sun, 08 Nov 2026 02:45 PM IST
सार
महिलाएं खेती में अहम भूमिका निभाती हैं, लेकिन जमीन के दस्तावेजों की कमी के कारण उन्हें बैंक से कृषि ऋण लेने में परेशानी होती है। जानिए महिला किसानों के लिए बैंकिंग व्यवस्था में बदलाव क्यों जरूरी है।
भारत की कृषि अर्थव्यवस्था में महिलाओं की अहम भूमिका है। वे खेतों में फसल उगाने से लेकर पशुपालन और ग्रामीण परिवारों को संभालने तक की जिम्मेदारी निभाती हैं। इसके बावजूद खेती-किसानी से जुड़ी वित्तीय सुविधाओं का लाभ उठाने में उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।
बिजनेस लाइन में पब्लिश SAVE Solutions Pvt. Ltd. (SAVE Group) के मैनेजिंग डायरेक्टर और सह-संस्थापक अजीत कुमार सिंह की रिपोर्ट के अनुसार, इसकी एक बड़ी वजह यह है कि खेती में योगदान देने के बावजूद कई महिलाओं की पहचान आधिकारिक तौर पर किसान के रूप में नहीं हो पाती। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या महिलाओं तक बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाना ही काफी है या उन्हें आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनाने के लिए कर्ज और दूसरी वित्तीय सेवाओं तक आसान पहुंच देना भी जरूरी है?
खेती में बड़ी भूमिका, लेकिन जमीन पर महिलाओं का अधिकार कम
आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (PLFS) 2023-24 के मुताबिक, भारत में कामकाजी महिलाओं में करीब 64.4 फीसदी कृषि और इससे जुड़ी गतिविधियों में लगी हुई हैं। वहीं, कृषि जनगणना 2015-16 के अनुसार, देश में केवल करीब 14 फीसदी कृषि जोतों का संचालन महिलाओं के हाथों में था।
ये दोनों आंकड़े अलग-अलग पहलुओं को दर्शाते हैं, लेकिन इनसे खेती में महिलाओं की स्थिति की एक बड़ी तस्वीर सामने आती है। महिलाएं खेती में मेहनत तो करती हैं, लेकिन उनके नाम पर जमीन और दूसरे कृषि संसाधन कम होने के कारण उन्हें किसान के तौर पर पहचान नहीं मिल पाती।
बैंकों से फसल ऋण लेने के लिए अक्सर जमीन के दस्तावेज, आमदनी का प्रमाण और पहले से मौजूद क्रेडिट रिकॉर्ड मांगे जाते हैं। ऐसे में परिवार की जमीन पर खेती करने या किराये पर जमीन लेकर काम करने वाली महिलाओं को कर्ज मिलने में परेशानी होती है। यानी समस्या सिर्फ गांव में बैंक की दूरी नहीं है, बल्कि यह भी है कि खेती करने वाली महिला को किसान के रूप में कितनी पहचान मिल रही है।
गांव तक बैंकिंग सुविधाएं पहुंचाने की जरूरत
ग्रामीण इलाकों में बैंक शाखाएं जरूरी हैं, लेकिन सिर्फ बैंक खोल देने से महिलाओं की वित्तीय समस्याएं दूर नहीं होंगी। कई महिलाओं को बैंक तक पहुंचने के लिए लंबी दूरी तय करनी पड़ती है। इससे आने-जाने का खर्च बढ़ता है और खेती व घर के काम का समय भी प्रभावित होता है। इसके अलावा बैंकिंग प्रक्रिया की जानकारी और जरूरी दस्तावेजों की कमी भी उनके लिए मुश्किल पैदा करती है।
इस समस्या को कम करने में बैंकिंग कॉरेस्पोंडेंट (BC) यानी बैंक मित्र अहम भूमिका निभा सकते हैं। इनके जरिए गांवों में ही बैंक से जुड़ी कई सुविधाएं उपलब्ध कराई जा सकती हैं। बैंक मित्रों की मदद से महिलाएं पैसे जमा करने, निकालने, भुगतान करने और डिजिटल लेनदेन जैसी सुविधाओं का लाभ उठा सकती हैं। इससे उन्हें छोटी-छोटी बैंकिंग जरूरतों के लिए बार-बार बैंक शाखा नहीं जाना पड़ता।
हालांकि, बैंक मित्र बैंक का विकल्प नहीं हैं। वे बैंकिंग सेवाओं को गांवों तक पहुंचाने और लोगों को औपचारिक बैंकिंग व्यवस्था से जोड़ने में मदद करते हैं। कर्ज देने और उसकी पात्रता तय करने की जिम्मेदारी संबंधित बैंक की ही होती है।
स्वयं सहायता समूहों से खुल रहे आर्थिक आत्मनिर्भरता के रास्ते
महिलाओं को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने में स्वयं सहायता समूह (SHG) अहम भूमिका निभा रहे हैं। राष्ट्रीय कृषि और ग्रामीण विकास बैंक (NABARD) की माइक्रोफाइनेंस रिपोर्ट 2024-25 के मुताबिक, मार्च 2025 तक देश में करीब 1.23 करोड़ महिला स्वयं सहायता समूह बैंक बचत खाते से जुड़े थे। इससे पता चलता है कि बड़ी संख्या में ग्रामीण महिलाएं बैंकिंग व्यवस्था से जुड़ रही हैं। हालांकि, बैंक में बचत खाता होने का मतलब यह नहीं है कि उन्हें खेती के लिए आसानी से कर्ज भी मिल जाएगा।
महिला किसानों को खेती की जरूरत के हिसाब से वित्तीय मदद मिलनी चाहिए। जैसे- बुवाई से पहले बीज खरीदने के लिए पैसा, फसल तैयार होने तक खेती का खर्च, पशुपालन के लिए पूंजी और सिंचाई व कृषि उपकरणों के लिए कर्ज। खेती में आमदनी हर महीने एक जैसी नहीं होती। किसानों को फसल तैयार होने और बाजार में बेचने के बाद आमदनी मिलती है। मौसम और बाजार की कीमतों में बदलाव से भी उनकी कमाई प्रभावित होती है।
इसलिए कृषि ऋण की किस्तें और भुगतान की समयसीमा फसल चक्र और किसान की आमदनी को ध्यान में रखकर तय की जानी चाहिए। साथ ही महिलाओं को फसल बीमा, वित्तीय जानकारी और बाजार से जुड़ी सुविधाओं के बारे में भी जागरूक करना जरूरी है। इससे कर्ज का सही इस्तेमाल हो सकेगा और खेती की उत्पादकता बढ़ाने में मदद मिलेगी।
महिला किसानों को कर्ज देने के लिए क्या करना होगा?
महिला किसानों को आर्थिक रूप से मजबूत बनाने के लिए तीन अहम कदम उठाने की जरूरत है।
जमीन के मालिकाना हक से आगे बढ़कर पहचान: बैंकों को नियमों के दायरे में ऐसे तरीके विकसित करने चाहिए, जिनसे जमीन अपने नाम न होने के बावजूद खेती का संचालन करने वाली महिलाओं की कृषि गतिविधियों और काम का आकलन किया जा सके।
गांव में ही बैंकिंग और वित्तीय जानकारी: बैंक, बैंक मित्र और स्वयं सहायता समूह मिलकर महिलाओं को डिजिटल बैंकिंग, सरकारी योजनाओं और कृषि ऋण की जानकारी उपलब्ध कराएं।
खेती की जरूरत के मुताबिक कर्ज: महिलाओं को ऐसा कृषि ऋण मिले, जो फसल उत्पादन, पशुपालन, सिंचाई, कृषि उपकरणों और बाजार से जुड़ी जरूरतों को पूरा कर सके। इसके साथ बीमा और जोखिम से सुरक्षा की सुविधाएं भी जरूरी हैं।
सिर्फ बैंक की पहुंच नहीं, महिला किसानों की आर्थिक मजबूती जरूरी
भारत में वित्तीय समावेशन का मतलब सिर्फ गांवों तक बैंकिंग सेवाएं पहुंचाना नहीं होना चाहिए। असली लक्ष्य यह होना चाहिए कि महिला किसानों को खेती के लिए समय पर पैसा मिले और वे अपनी जरूरत के मुताबिक आर्थिक फैसले ले सकें।
महिलाएं खेती में बड़ा योगदान दे रही हैं। अब जरूरत है कि बैंकिंग और कृषि ऋण व्यवस्था में भी उन्हें स्वतंत्र किसान के रूप में पहचान मिले। इससे न सिर्फ उनकी आर्थिक स्थिति मजबूत होगी, बल्कि खेती और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी फायदा मिल सकता है।
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