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आसमान को देखें, न भूलें जमीन : समय के भंवर में जब विज्ञान ठहर जाता है, तो मुस्कुराकर ये उत्तर देता है अध्यात्म

डॉ गरिमा संजय दुबे, साहित्यकार एवं प्राध्यापक Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 07 Nov 2026 07:57 PM IST
सार

समय और ब्रह्मांड के रहस्यों की खोज विज्ञान और अध्यात्म को करीब लाती है। 'इंटरस्टेलर' जैसी फिल्में इस जिज्ञासा को नए आयाम देती हैं। लेकिन दूसरे ग्रहों पर जीवन खोजने की दौड़ में क्या हम अपनी अनमोल धरती को बचाने की जिम्मेदारी भूल रहे हैं? जानिए, विस्तार से...

समय अनंत है, ब्रह्मांड विराट है और मनुष्य की जिज्ञासा असीम।
समय अनंत है, ब्रह्मांड विराट है और मनुष्य की जिज्ञासा असीम। - फोटो : एआई
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विस्तार
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समय सर्वशक्तिमान है। शायद उस विधाता से भी अधिक, जिसे हम सृष्टि का रचयिता कहते हैं। प्रकृति का वह तत्व, जिससे सब कुछ उपजा और जिसमें सब कुछ विलीन हो जाता है। भारतीय मनीषा ने समय को केवल घड़ी की सुइयों के बीच बीतते क्षणों की तरह नहीं, बल्कि सृष्टि के मूल तत्व के रूप में देखा है। महाभारत का विराट घोष—'मैं समय हूं' - इसी गहरी अवधारणा की याद दिलाता है। शिव को महाकाल कहा गया है, यानी समय के भी अधिपति।

समय और ब्रह्मांड के रहस्यों को समझने की जिज्ञासा जितनी प्राचीन है, उतनी ही आधुनिक भी। ज्ञान और विज्ञान मुझे एक ही मंजिल की ओर जाने वाले दो पथिक दिखाई देते हैं। ज्ञान किसी विराट सत्य के सामने सहजता से समर्पित हो जाता है, जबकि विज्ञान हर रहस्य को खोलने के लिए प्रश्न पर प्रश्न करता है। एक स्वीकार में शांति खोजता है, दूसरा खोज में अपनी गति। दोनों का केंद्र अंततः सत्य ही है।

मनुष्य की जिज्ञासा और ब्रह्मांड के रहस्य
मनुष्य की नैसर्गिक प्रज्ञा ने उसे प्रकृति के रहस्यों को समझने और अज्ञात की सीमाएं लांघने के लिए प्रेरित किया। इसी जिज्ञासा से कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी तकनीक विकसित हुई, जो अब ब्रह्मांड की खोज में भी उसकी मदद कर रही है।

हाल में फिल्म 'इंटरस्टेलर' दोबारा देखते हुए समय, गुरुत्वाकर्षण, ब्लैक होल और अंतरिक्ष की अनंत दूरियों पर विचार करने का अवसर मिला। आइंस्टाइन के सापेक्षता सिद्धांत पर आधारित यह फिल्म मनोरंजन से आगे जाकर मनुष्य के अस्तित्व और भविष्य से जुड़े सवाल उठाती है।

फिल्म के कई प्रसंग प्राचीन ग्रंथों में वर्णित समय और स्थान संबंधी अवधारणाओं की याद दिलाते हैं। भारतीय पुराणों में अलग-अलग लोकों में समय की गति अलग होने और ब्रह्मा के एक दिन को हजारों युगों के बराबर बताए जाने जैसे वर्णन मिलते हैं। महाभारत में संजय को प्राप्त दिव्य दृष्टि का प्रसंग भी समय और स्थान की सीमाओं से परे देखने की कल्पना जगाता है।

क्या प्राचीन ऋषि समय के ऐसे आयामों का कोई गहरा बोध रखते थे, जिन्हें आज विज्ञान गणितीय सिद्धांतों से समझने की कोशिश कर रहा है? ये प्रश्न जिज्ञासा जरूर जगाते हैं, लेकिन किसी प्राचीन ग्रंथ में विचार का उल्लेख होना और उसका आधुनिक वैज्ञानिक प्रयोगों से प्रमाणित होना दो अलग बातें हैं। अपनी विरासत का सम्मान जरूरी है, पर उसकी आड़ में पनपे अंधविश्वास और पाखंड को प्राचीन ज्ञान का पर्याय नहीं बनाया जा सकता।

समय, ब्लैक होल और सृष्टि का रहस्य
फिल्म में धरती के जीवन के अनुकूल न रह जाने की आशंका के बीच वैज्ञानिक दूसरे ग्रहों पर नई दुनिया बसाने की कोशिश करते हैं। कहीं बर्फ से ढके ग्रह हैं, तो कहीं समय की गति इतनी धीमी कि वहां का एक घंटा धरती के सात वर्षों के बराबर हो जाता है। ब्लैक होल का असाधारण गुरुत्वाकर्षण समय और स्थान की सामान्य समझ को चुनौती देता है।

विज्ञान के अनुसार, गुरुत्वाकर्षण और गति समय के प्रवाह को प्रभावित कर सकते हैं। अधिक गुरुत्वाकर्षण वाले क्षेत्र में समय अपेक्षाकृत धीमी गति से गुजरता है। क्वांटम भौतिकी और आधुनिक ब्रह्मांड विज्ञान भी बताते हैं कि वास्तविकता हमारी सामान्य समझ से कहीं अधिक जटिल है। विज्ञान लगातार नए सिद्धांतों और गणनाओं के जरिए समय और अंतरिक्ष की प्रकृति समझने का प्रयास कर रहा है।

दूसरी ओर, अध्यात्म इस विराट व्यवस्था को समय, प्रकृति या ईश्वर का नाम देता है। विज्ञान प्रयोगों और प्रमाणों के आधार पर आगे बढ़ता है, जबकि अध्यात्म अस्तित्व के अर्थ को अपनी मान्यताओं और संवेदना से समझता है। दोनों की अपनी अलग कसौटियां और सीमाएं हैं।

प्रकृति ही है सबसे बड़ी प्रयोगशाला...
विज्ञान की सबसे बड़ी शक्ति है कि वह प्रयोगों से तथ्यों को प्रमाणित करता है। लेकिन यह भी सच है कि जिन प्रक्रियाओं को मनुष्य आज प्रयोगशाला में समझ और नियंत्रित कर रहा है, वे प्रकृति में अनादि काल से घटित होती रही हैं।

जब विज्ञान ने बीज से पौधा विकसित करने की तकनीक खोजी, तब पेड़ अस्तित्व में नहीं आए थे। वे तो सृष्टि के आरंभ से मौजूद थे। इसी तरह परखनली में भ्रूण विकसित करने की तकनीक ने संतान उत्पत्ति की प्रक्रिया को जन्म नहीं दिया, बल्कि प्रकृति में पहले से मौजूद प्रक्रिया के कुछ रहस्यों को समझकर उसे नियंत्रित करने का रास्ता खोला।

किसी चीज को खोज लेना और उसका अस्तित्व पैदा करना अलग बातें हैं। विज्ञान घटनाओं के कारण और उनके पीछे काम कर रहे सिद्धांतों को समझता है। प्रकृति की सबसे बड़ी प्रयोगशाला यह विशाल ब्रह्मांड है, जिसका कितना हिस्सा हमारी समझ से बाहर है, इसका अनुमान लगाना भी कठिन है।

सृष्टि, विनाश और पुनर्निर्माण के सबक...
जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक संसाधनों का क्षरण और पर्यावरणीय असंतुलन धरती पर जीवन के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ा रहे हैं। इसी वजह से दूसरे ग्रहों पर जीवन की संभावनाएं तलाशी जा रही हैं। भारतीय परंपरा में सृष्टि के निर्माण, मन्वंतर, कल्प और महाप्रलय की अवधारणाएं मिलती हैं। दुनिया की दूसरी परंपराओं में मनु की नाव और नूह की नौका जैसी कथाएं भी हैं, जिनमें विनाश के बीच जीवन के बीज बचाने और पुनर्निर्माण की आशा दिखाई देती है।

अंतरिक्ष से धरती को देखने वाले कई यात्रियों ने जीवन और प्रकृति के प्रति अपनी संवेदना गहरी होने की बात कही है। दूर से हमारी पृथ्वी एक छोटा, नीला और सीमित ग्रह दिखाई देती है। शायद ब्रह्मांड के विस्तार को समझने के साथ ही मनुष्य अपनी धरती का महत्व भी अधिक महसूस करने लगता है।

दूसरी धरती से पहले अपनी धरती को बचाएं
आज तक की खोजों में कोई ऐसा ग्रह सामने नहीं आया है, जिसे जीवन के लिए हमारी धरती से बेहतर कहा जा सके। कहीं पानी बर्फ के रूप में जमा है, कहीं वातावरण अनुकूल नहीं, तो कहीं तापमान और गुरुत्वाकर्षण की परिस्थितियां जीवन के लिए चुनौती हैं। जिन ग्रहों पर जीवन की तलाश में अरबों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, वहां जीवन की बुनियादी सुविधाएं भी अभी कल्पना का विषय हैं।

इसके उलट हमारी धरती पर हवा, पानी, मिट्टी, जंगल, नदियां, समुद्र और जीवन की असंख्य प्रजातियां हैं। यह केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि प्रकृति के संतुलन से बनी एक जटिल और अद्भुत व्यवस्था है।

ब्रह्मांड के रहस्यों को जानने की जिज्ञासा अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन क्या किसी दूसरी धरती की तलाश से पहले हमें अपनी धरती को बचाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए? जितना प्रयास हम दूसरे ग्रहों पर जीवन खोजने में लगा रहे हैं, उसका एक हिस्सा भी पर्यावरण सुधारने, प्राकृतिक संसाधनों को बचाने और अपने लालच को सीमित करने में लगाएं, तो यह धरती और सुंदर, स्वस्थ तथा रहने योग्य बन सकती है।

ब्रह्मांड की यात्रा हमें दूर तक ले जाए, यह अच्छी बात है। लेकिन वहां से लौटकर अपनी धरती के प्रति हमारा प्रेम और जिम्मेदारी और गहरी होनी चाहिए। आखिर हमारी सांसों में इसी धरती की हवा है और जीवन का आधार भी यही मिट्टी है।

शायद ब्रह्मांड को जानने की सबसे बड़ी उपलब्धि किसी दूसरे ग्रह पर जीवन खोज लेना नहीं, बल्कि अपनी धरती पर जीवन का महत्व समझना है। समय अनंत है, ब्रह्मांड विराट है और मनुष्य की जिज्ञासा असीम। लेकिन इन सबके बीच हमारी धरती एक अनमोल वर्तमान है, जिसे खोकर किसी भविष्य की कल्पना भी व्यर्थ होगी।
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