लीची सिर्फ स्वाद और मिठास के लिए ही नहीं, बल्कि इसमें मौजूद फेनोलिक्स, फ्लेवोनॉयड और एंटीऑक्सीडेंट जैसे जैव सक्रिय तत्वों के कारण भी महत्वपूर्ण है। मुजफ्फरपुर स्थित आईसीएआर-राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र (ICAR-NRC on Litchi) में किए गए एक अध्ययन में लीची की 30 अलग-अलग जीनोटाइप यानी किस्मों की जांच की गई। शोध में पाया गया कि लीची के अलग-अलग हिस्सों में इन स्वास्थ्यवर्धक यौगिकों की मात्रा काफी अलग-अलग होती है।
खास बात यह रही कि लीची के छिलके (Pericarp) में गूदे की तुलना में फेनोलिक्स और एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि अधिक पाई गई। इससे लीची के छिलके को खाद्य पदार्थों और प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट उत्पादों के लिए उपयोगी बनाने की संभावनाएं बढ़ी हैं।
30 जीनोटाइप पर किया गया अध्ययन
यह अध्ययन आईसीएआर-राष्ट्रीय लीची अनुसंधान केंद्र, मुजफ्फरपुर, बिहार में उगाए जा रहे 30 अलग-अलग लीची जीनोटाइप पर किया गया। वैज्ञानिकों ने लीची के फूल, फूल की कलियों, नई और पुरानी पत्तियों, गूदे, छिलके और बीज में फेनोलिक्स और फ्लेवोनॉयड की मात्रा का परीक्षण किया। इसके साथ ही वैज्ञानिकों ने गूदे और छिलके की एंटीऑक्सीडेंट क्षमता और DPPH रेडिकल स्कैवेंजिंग गतिविधि भी जांची।
शोध का उद्देश्य यह पता लगाना था कि अलग-अलग लीची जीनोटाइप में स्वास्थ्य से जुड़े इन जैव सक्रिय तत्वों की मात्रा कितनी अलग है और इनमें से कौन-सी किस्में भविष्य में बेहतर किस्म विकसित करने और खाद्य व औषधीय उपयोग के लिए अधिक उपयोगी हो सकती हैं।
पुरानी पत्तियों में सबसे ज्यादा फेनोलिक्स
अध्ययन में फेनोलिक्स की मात्रा अलग-अलग जीनोटाइप और पौधे के हिस्सों में काफी अलग पाई गई। 30 जीनोटाइप में कुल फेनोलिक्स की मात्रा-
फूलक्रम (Inflorescence): 18.20 से 48.70 mg GAE/g
फूल की कली : 46.10 से 107.30 mg GAE/g
नई पत्ती : 62.70 से 115.50 mg GAE/g
पुरानी/परिपक्व पत्ती : 19.82 से 124.99 mg GAE/g
गूदा : 0.20 से 8.41 mg GAE/g
छिलका : 8.57 से 61.24 mg GAE/g
बीज : 23.68 से 86.56 mg GAE/g
अध्ययन में परिपक्व पत्तियों में फेनोलिक्स की मात्रा सबसे अधिक पाई गई। जीनोटाइप IC-0615611 की पुरानी पत्ती में इसकी मात्रा 124.99 mg GAE/g FW तक पहुंची। वहीं, सबसे कम मात्रा IC-0615600 के गूदे में 0.20 mg GAE/g FW रही।
गूदे में 32 गुना से ज्यादा अंतर
अलग-अलग लीची जीनोटाइप के बीच फेनोलिक्स की मात्रा में काफी बड़ा अंतर देखने को मिला। गूदे में सबसे ज्यादा फेनोलिक्स IC-0615586 में पाया गया, जबकि सबसे कम IC-0615600 में था। दोनों के बीच करीब 32.3 गुना का अंतर रहा। छिलके में भी जीनोटाइप के बीच करीब 7.14 गुना का अंतर मिला। इसमें IC-0615613 में सबसे अधिक और IC-0615606 में सबसे कम फेनोलिक्स पाया गया। इससे पता चलता है कि लीची की किस्म का जैव सक्रिय तत्वों की मात्रा पर काफी असर पड़ता है।
फ्लेवोनॉयड में भी बड़ी विविधता
शोध में फ्लेवोनॉयड की मात्रा भी अलग-अलग जीनोटाइप में काफी अलग पाई गई। 30 जीनोटाइप में कुल फ्लेवोनॉयड की मात्रा-
फूलक्रम : 8.61 से 21.11 mg CAE/g
फूल की कली : 17.26 से 46.79 mg CAE/g
नई पत्ती : 2.29 से 23.02 mg CAE/g
परिपक्व पत्ती : 8.15 से 26.55 mg CAE/g
गूदा : 0.50 से 23.88 mg CAE/g
छिलका : 0.75 से 96.49 mg CAE/g
बीज : 2.41 से 27.50 mg CAE/g
फ्लेवोनॉयड की सबसे अधिक मात्रा IC-0615613 के छिलके में 96.49 mg CAE/g तक दर्ज की गई। गूदे में सबसे ज्यादा फ्लेवोनॉयड IC-0615613 में मिला, जबकि सबसे कम Coll. 36 में पाया गया। दोनों के बीच करीब 47.7 गुना का अंतर रहा। छिलके में यह अंतर और भी बड़ा था। IC-0615610 और Coll. 37 के बीच फ्लेवोनॉयड की मात्रा में करीब 128.6 गुना का अंतर पाया गया।
छिलका गूदे से ज्यादा एंटीऑक्सीडेंट वाला
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि लीची के छिलके में गूदे की तुलना में एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि अधिक थी। गूदे की DPPH रेडिकल-स्कैवेंजिंग गतिविधि 25.63 से 73.15 प्रतिशत के बीच रही। इसमें IC-0615593 ने सबसे बेहतर प्रदर्शन किया। वहीं, सबसे कम गतिविधि IC-0615594 में दर्ज की गई।
लीची के छिलके में DPPH गतिविधि 56.75 से 90.35 प्रतिशत तक रही। सबसे अधिक गतिविधि IC-0615585 में 90.35 प्रतिशत दर्ज की गई। इससे वैज्ञानिकों का मानना है कि लीची का छिलका प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट का अच्छा स्रोत हो सकता है।
एंटीऑक्सीडेंट क्षमता में भी किस्मों का अंतर
वैज्ञानिकों ने CUPRAC विधि से कुल एंटीऑक्सीडेंट क्षमता की भी जांच की। लीची के गूदे में यह क्षमता 3.39 से 7.80 mol TE/g FW के बीच रही। सबसे अधिक क्षमता IC-0615596 में 7.80 mol TE/g पाई गई, जबकि सबसे कम IC-0615600 में रही। छिलके में एंटीऑक्सीडेंट क्षमता 6.35 से 10.28 mol TE/g FW के बीच दर्ज की गई। यह गूदे की तुलना में अधिक थी। शोध के अनुसार, फेनोलिक्स की अधिक मात्रा और एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि के बीच सकारात्मक संबंध पाया गया। गूदे में यह संबंध 0.708 और छिलके में 0.571 रहा।
फेनोलिक्स बढ़ने पर एंटीऑक्सीडेंट क्षमता भी बढ़ी
शोधकर्ताओं ने पाया कि जिन जीनोटाइप में फेनोलिक्स की मात्रा ज्यादा थी, उनमें सामान्य तौर पर एंटीऑक्सीडेंट क्षमता भी बेहतर रही। गूदे में फेनोलिक्स और एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि के बीच सकारात्मक संबंध पाया गया। DPPH रेडिकल-स्कैवेंजिंग गतिविधि और एंटीऑक्सीडेंट क्षमता के बीच भी मजबूत संबंध मिला। हालांकि, वैज्ञानिकों के अनुसार एंटीऑक्सीडेंट क्षमता केवल फेनोलिक्स पर निर्भर नहीं करती। विटामिन, कैरोटेनॉयड, वाष्पशील तेल और अन्य जैव सक्रिय यौगिक भी इसमें योगदान कर सकते हैं।
लीची की नई बेहतर किस्में विकसित करने में मिलेगी मदद
अध्ययन में 30 जीनोटाइप को उनके फेनोलिक्स, फ्लेवोनॉयड और एंटीऑक्सीडेंट गुणों के आधार पर अलग-अलग समूहों में बांटा गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि इन जीनोटाइप में जैव सक्रिय तत्वों को लेकर काफी विविधता है। यह विविधता पौध प्रजनन (Breeding) के लिए महत्वपूर्ण है।
अलग-अलग गुणों वाले जीनोटाइप को क्रॉस कर वैज्ञानिक भविष्य में ऐसी लीची किस्में विकसित कर सकते हैं जिनमें बेहतर फल गुणवत्ता, अधिक पोषण और ज्यादा एंटीऑक्सीडेंट क्षमता हो। विशेष रूप से IC-0615593 ने गूदे की DPPH रेडिकल-स्कैवेंजिंग गतिविधि में बेहतर प्रदर्शन किया। शोधकर्ताओं के अनुसार, इस जीनोटाइप का आगे मूल्यांकन और प्रजनन कार्यक्रमों में उपयोग किया जा सकता है।
लीची के छिलके से बन सकते हैं वैल्यू-एडेड उत्पाद
लीची का छिलका सामान्य तौर पर फल खाने के बाद फेंक दिया जाता है। लेकिन इस अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि इसमें फेनोलिक्स, फ्लेवोनॉयड और एंटीऑक्सीडेंट पर्याप्त मात्रा में मौजूद हैं। इसलिए लीची के छिलके से भविष्य में प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट, खाद्य उत्पादों में प्राकृतिक एडिटिव और अन्य वैल्यू-एडेड उत्पाद तैयार करने की संभावनाएं हैं। इससे लीची प्रसंस्करण के दौरान निकलने वाले कचरे का बेहतर उपयोग हो सकता है और किसानों तथा प्रसंस्करण उद्योग के लिए अतिरिक्त मूल्य भी पैदा किया जा सकता है।
शोध में आया यह परिणाम
शोध से साफ हुआ कि लीची की सभी किस्मों में पोषण और जैव सक्रिय तत्वों की मात्रा समान नहीं होती। पौधे के अलग-अलग हिस्सों में भी इनकी मात्रा में बड़ा अंतर है। लीची का छिलका गूदे की तुलना में फेनोलिक्स और एंटीऑक्सीडेंट गतिविधि का बेहतर स्रोत पाया गया।
वहीं, अलग-अलग जीनोटाइप में फेनोलिक्स और फ्लेवोनॉयड की मात्रा में कई गुना अंतर मिला। शोध के परिणाम लीची की नई उन्नत किस्मों के विकास, खाद्य प्रसंस्करण, प्राकृतिक एंटीऑक्सीडेंट और संभावित औषधीय उपयोग के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं। साथ ही, यह अध्ययन भारत में मौजूद लीची के आनुवंशिक संसाधनों की विविधता को समझने में भी मदद करता है।
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