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खरपतवार से जंग का नया हथियार बनेगा AI : लेजर और रोबोट से कम दवा, कम मजदूरी, मगर भारी कीमत की रहेगी चुनौती

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Wed, 21 Oct 2026 01:37 PM IST
सार

खेत से खरपतवार हटाने का तरीका एक बार फिर बदलने की दहलीज पर है। मिसिसिपी विश्वविद्यालय और कॉर्नेल विश्वविद्यालय का नए अध्ययन के मुताबिक, लेजर, रोबोट और सटीक छिड़काव करने वाली मशीनें खरपतवारनाशी रसायनों और हाथ की मजदूरी पर निर्भरता घटा सकती हैं। पर, इनके साथ भारी कीमत और कई चुनौतियां भी जुड़ी हैं। जानिए, विस्तार से...

वैज्ञानिकों के अनुसार, सटीक खरपतवार प्रबंधन अगली क्रांति होगा, जिससे फसलों की देखरेख का तरीका बदल सकता है।
वैज्ञानिकों के अनुसार, सटीक खरपतवार प्रबंधन अगली क्रांति होगा, जिससे फसलों की देखरेख का तरीका बदल सकता है। - फोटो : AI
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विस्तार
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एआई से चलने वाले लेजर, रोबोटिक निराई मशीनें और सटीक छिड़काव यंत्र खरपतवार प्रबंधन की तीसरी क्रांति बन सकते हैं। ये तकनीकें खरपतवारनाशी रसायनों और हाथ की मजदूरी पर निर्भरता घटा सकती हैं, पर इनकी कीमत भारी है और प्रतिरोधी खरपतवार, मिट्टी की सेहत तथा मशीन के स्थानीय प्रशिक्षण जैसी चुनौतियां भी बनी रहेंगी।

मिसिसिपी विश्वविद्यालय और कॉर्नेल विश्वविद्यालय के नए अध्ययन में ये बातें उभरकर आई हैं। ओल मिस के नेशनल सेंटर फॉर नेचुरल प्रोडक्ट्स रिसर्च के शोध प्रोफेसर स्टीफन ड्यूक इसे खरपतवार प्रबंधन की "तीसरी क्रांति" कहते हैं।

ड्यूक के मुताबिक, बीते सौ साल में दो क्रांतियां आईं। पहली कृत्रिम खरपतवारनाशी रसायनों की और दूसरी ऐसी फसलों की, जो उन रसायनों को सह सकें। उन्हें लगता है कि एआई से चलने वाला सटीक खरपतवार प्रबंधन अगली क्रांति होगा और फसलों के प्रबंधन का तरीका भारी हद तक बदल सकता है।

तीनों की आंख एक, काम अलग-अलग
तीनों तकनीकें असली समय में तस्वीरों का विश्लेषण करके फसल की कतारों के बीच खरपतवार को पहचानती हैं। पहचान होते ही मशीन तीन में से कोई एक काम कर सकती है। वह शक्तिशाली प्रकाश किरण से खरपतवार पर वार करे, उस पर खरपतवारनाशी रसायन छिड़के या उसे यांत्रिक तरीके से मिट्टी से हटा दे।

फसल की सुरक्षा पहले
ड्यूक और कॉर्नेल विश्वविद्यालय के इंटीग्रेटिव प्लांट साइंस स्कूल की एसोसिएट प्रोफेसर लिन सोस्नोस्की ने 'इंजीनियरिंग' जर्नल में प्रकाशित रिपोर्ट में तीन उभरती तकनीकों पर ध्यान दिया है। ये हैं एआई निर्देशित लेजर, रोबोटिक निराई मशीनें और सटीक छिड़काव यंत्र।

सोस्नोस्की विशेष फसलों में काम करती हैं और बताती हैं कि फल और सब्जियां खरपतवारनाशी रसायनों के प्रति बेहद संवेदनशील होती हैं। ये रसायन फसल के उगने में देरी कर सकते हैं या उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं, यहां तक कि पौधे की बढ़वार रोक सकते हैं। खरपतवार रोकना ज्यादा जरूरी है, इसलिए यह नुकसान अब तक सहा जाता रहा है। पर सटीक तकनीक से रसायन का कुछ हिस्सा, और कभी-कभी पूरा हिस्सा, फसल से दूर रखा जा सकता है।

जैविक किसानों को नई राह
ड्यूक के अनुसार, जैविक किसान कृत्रिम खरपतवारनाशी नहीं इस्तेमाल करते, इसलिए उनके पास खरपतवार रोकने के अच्छे साधन नहीं हैं। वे ज्यादातर हाथ की मजदूरी पर टिके हैं, जो और महंगी तथा दुर्लभ होती जा रही है। लेजर और रोबोटिक निराई से वे बड़े खेतों की निराई कठिन शारीरिक श्रम के बिना कर सकते हैं।

कम रसायन, कम जोखिम
रसायन कम पड़ने से खेतों पर रसायनों का संपर्क भी घट सकता है। अध्ययनों के मुताबिक हर साल फसलों पर भारी मात्रा में खरपतवारनाशी छिड़कने से स्थानीय पारिस्थितिकी को नुकसान पहुंच सकता है। सोस्नोस्की कहती हैं कि इससे खेतों में काम करने वालों को भी फायदा होगा, क्योंकि संपर्क कम होगा, मजदूरों की सुरक्षा बढ़ेगी, फसल पर अवशेष संभवतः घटेंगे और पर्यावरण में कम रसायन जाएगा।

कीमत की ऊंची दीवार बरकरार 
हर फायदे के साथ एक कीमत भी चुकानी पड़ती है। कुछ व्यावसायिक यांत्रिक और रोबोटिक निराई प्रणालियों की कीमत करीब 75,000 डॉलर या उससे ज्यादा आती है, जबकि लेजर आधारित प्रणालियां 10 लाख डॉलर से भी ऊपर जा सकती हैं।

ड्यूक बताते हैं कि जर्मनी में यूरोपीय किसानों के एक सलाहकार परिचित ने उन्हें नीदरलैंड के एक जैविक किसान के बारे में बताया। उस किसान ने 10 लाख डॉलर से ज्यादा में एक रोबोटिक लेजर निराई मशीन खरीदी और उससे इतनी सहूलियत मिली कि दूसरी मशीन भी ले ली। पर यह सबके लिए संभव नहीं होगा। ज्यादा कीमत वाली फसलें उगाने वाले कुछ किसान इतना खर्च कर सकते हैं, पर कई नहीं कर सकते।

अपेक्षाकृत सटीक छिड़काव वाली मशीनों के दाम ज्यादा लोगों के अपनाने पर घट सकते हैं। फिर भी शोधकर्ताओं ने चेताया है कि ये खरपतवारनाशी प्रतिरोधी खरपतवारों के विकास और फैलाव को बढ़ावा देने का जोखिम बनाए रख सकती हैं।

प्रतिरोधी खरपतवार की समस्या जस की तस
कई किसान पहले से ऐसे खरपतवारों से जूझ रहे हैं, जिन पर खरपतवारनाशी असर नहीं करते। शोधकर्ताओं के अनुसार रसायन कम इस्तेमाल करने और ज्यादा सटीक छिड़काव से यह समस्या मिटने की संभावना नहीं है।

ड्यूक कहते हैं कि इसका मतलब यह नहीं कि हर खरपतवार हर रसायन से प्रतिरोधी है, पर ऐसे खरपतवारों की संख्या काफी है और यह वाकई बहुत बड़ी समस्या बन चुकी है। इसी तरह, रोबोटिक जुताई जैसी विधि से जरूरत से ज्यादा जुताई होने पर मिट्टी की गुणवत्ता प्रभावित हो सकती है।

मशीन को स्थानीय खरपतवार सिखाना जरूरी
पहचान करने वाले एआई मॉडल अक्सर केवल खास फसलों या खास परिस्थितियों में प्रशिक्षित होते हैं। सोस्नोस्की के अनुसार कई कंपनियों ने पश्चिमी अमेरिका को निशाना बनाया है, क्योंकि एरिजोना, कैलिफोर्निया, ओरेगन और वाशिंगटन में सब्जियों का भारी उत्पादन होता है। पर वहां की जलवायु दक्षिण-पूर्व अमेरिका से बहुत अलग है।

उन्होंने एक कंपनी के साथ काम किया, जिसका शुरुआती एल्गोरिदम एक खास खरपतवार प्रजाति, कॉमन रैगवीड को बार-बार छोड़ देता था। पता चला कि कैलिफोर्निया में रैगवीड की वह प्रजाति नहीं होती। इसका मतलब है कि मिसिसिपी, अलबामा या आसपास के क्षेत्र का कोई सब्जी उत्पादक इसे अपनाना चाहे, तो पहले यह पक्का करना होगा कि मशीन को वहां के माहौल और वहां के खरपतवारों पर प्रशिक्षित किया गया है।

खरपतवार भी बदलेंगे अपनी चाल
सोस्नोस्की बताती हैं, खुद खरपतवार भी इस तकनीक के जवाब में बदल सकते हैं। जो खरपतवार फसल जैसे दिखते हैं, इस घटना को क्रॉप मिमिक्री यानी फसल की नकल कहते हैं, अगर वे बच गए तो वे प्रजनन करके और ज्यादा फसल जैसे दिखने वाले खरपतवार पैदा कर सकते हैं। समय के साथ इससे वही खरपतवार पनपेंगे, जो उन्हीं मशीनों को चकमा देना सीख लें, जिन्हें उन्हें खत्म करने के लिए बनाया गया है।

आगे वह कहती हैं कि सिर्फ इसलिए कि हमारे पास यह तकनीक है, तो यह मान लेना सही नहीं होगा कि हम खरपतवारों से मुक्त हो गए हैं। खरपतवार नियंत्रण में हमें हमेशा यह सोचना होगा कि खरपतवार कैसे प्रतिक्रिया देंगे या "जीतने" की कोशिश करेंगे। इसलिए हमें इन समस्याओं पर पहले से सक्रिय रहकर सोचना होगा।
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