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नासा का अनोखा प्रयोग: 11 फसलों के बीज अंतरिक्ष की सैर से लौटे, अब खुलेगा मंगल पर खेती का रहस्य

उमाशंकर मिश्र, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Fri, 18 Sep 2026 01:29 PM IST
सार

नासा ने वर्ष 2020 में 11 फसलों के बीज एक्स-37बी स्पेसप्लेन से अंतरिक्ष में भेजे थे। महीनों बाद धरती पर लौटे इन बीजों पर हुए प्रयोगों से वैज्ञानिक यह जानने का प्रयास कर रहे हैं कि क्या भविष्य में मंगल पर भी खेती संभव हो सकेगी? जानिए, अंतरिक्ष से लौटे बीजों की रोचक यात्रा और भविष्य की खेती से जुड़े दिलचस्प रहस्य... 

अंतरिक्ष से लौटे बीज खोलेंगे भविष्य की खेती का रहस्य।
अंतरिक्ष से लौटे बीज खोलेंगे भविष्य की खेती का रहस्य। - फोटो : एआई
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विस्तार
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कल्पना कीजिए, धरती से दूर, अंतरिक्ष के सन्नाटे में महीनों तक चुपचाप तैरते कुछ नन्हे बीज। न मिट्टी, न पानी, बस अनंत शून्य और बेतहाशा विकिरण की चुनौती। साल 2020 में नासा ने ठीक यही प्रयोग शुरू किया। 11 फसलों के बीजों को एक प्रायोगिक स्पेसप्लेन में बिठाकर अंतरिक्ष भेज दिया। महीनों बाद जब ये बीज धरती पर लौटे, तो वैज्ञानिकों के मन में बस एक सवाल था कि क्या ये अब भी अंकुरित हो पाएंगे?

कैसे हुआ यह अनोखा प्रयोग
यह पूरा प्रयोग अमेरिकी स्पेस फोर्स द्वारा संचालित पुन: प्रयोज्य यान X-37B ऑर्बिटल टेस्ट व्हीकल-6 (OTV-6) के जरिए किया गया, जिसने 17 मई 2020 को उड़ान भरी थी। नासा के कैनेडी स्पेस सेंटर के वैज्ञानिकों ने इसे दो हिस्सों (RAD-SEED 1 और RAD-SEED2) में अंजाम दिया। इस शोध की अगुवाई प्रमुख वैज्ञानिक डॉ. ये झांग ने की, साथ में डॉ. हॉवर्ड जी. लेवीन और जेफ्री टी. रिचर्ड्स की टीम भी जुड़ी रही।

मंगल मिशन से क्यों जुड़ा है यह सवाल
असल में यह प्रयोग सिर्फ जिज्ञासा भर नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक बड़ा लक्ष्य छिपा था - भविष्य में जब इंसान मंगल या किसी दूर ग्रह की लंबी यात्रा पर निकलेंगे, तब उन्हें ताज़ा भोजन की जरूरत पड़ेगी। पैकेज्ड फूड पोषण तो दे सकता है, लेकिन पौधे उगाना न सिर्फ ताज़ा आहार देगा, बल्कि अंतरिक्ष यात्रियों को लंबे अलगाव के दौरान मानसिक सहारा भी देगा। पर इससे पहले यह जानना जरूरी है कि क्या लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने के बाद बीज अपनी क्षमता बरकरार रख पाते हैं।

इन 11 फसलों को भेजा गया अंतरिक्ष में
इस प्रयोग के लिए दो मॉडल पौधे चुने गए - एरेबिडॉप्सिस थैलियाना और ब्रैकीपोडियम, जो पहले भी अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन (ISS) पर उगाए जा चुके हैं। इनके अलावा, जिन फसलों को अंतरिक्ष स्टेशन पर पहले उगाया जा चुका है या भविष्य में उगाया जाना है, उनमें मिज़ुना, लेट्यूस (सलाद पत्ता), टमाटर, पाक चोई, मूली, हैच मिर्च और बौना गेहूं शामिल थीं। वहीं, अलग बीज आकार और खासियतों के चलते चुनी गई फसलों में चार्ड, प्याज, चावल और खीरा शामिल रहे। 

धरती पर भी हुई तुलनात्मक जांच
वैज्ञानिकों ने सिर्फ अंतरिक्ष से लौटे बीजों पर भरोसा नहीं किया। इसके समानांतर धरती पर भी नियंत्रित प्रयोग चलाए गए। कुछ बीजों को ब्रूकहेवन नेशनल लेबोरेटरी की नासा स्पेस रेडिएशन लेबोरेटरी (NSRL) में एक विशेष रेडिएशन वातावरण (GCRsim) में रखा गया, ताकि उड़ान के दौरान मिलने वाले विकिरण की स्थिति को कृत्रिम रूप से दोहराया जा सके। इन तुलनाओं का मकसद भविष्य के गहन अंतरिक्ष मिशनों के लिए एक व्यापक डेटाबेस तैयार करना था।

धरती पर लौटकर ऐसे हुई बीजों की परख
अंतरिक्ष से लौटने के बाद बीजों को कैनेडी स्पेस सेंटर में नियंत्रित माहौल में उगाया गया। यह कुछ वैसा ही वातावरण था, जो ISS पर चलने वाले वेजी (Veggie) पौधा प्रयोग में इस्तेमाल होता है। 22 डिग्री सेल्सियस तापमान, 40-45% नमी, कार्बन डाइऑक्साइड स्तर 3000 ppm, रोशनी 300 माइक्रोमोल प्रति वर्ग मीटर प्रति सेकंड, 16 घंटे रोशनी और 8 घंटे अंधेरे का चक्र इस वातावरण में शामिल है।

हर प्रजाति के बीज को छह से दस दिनों के भीतर जांचा गया। अंकुरण दर मापी गई, पौधों की बनावट और ऊतक संरचना का भी अध्ययन किया गया।

फसल उत्पादन की भी हुई परख
वैज्ञानिकों ने चुनिंदा फसलों से मिलने वाले खाद्य हिस्से की भी जांच की। इन्हें 28 से 90 दिनों के बीच काटा गया और पौधे के आकार, वजन, रंग-रूप के साथ-साथ उनमें मौजूद खनिज और विटामिन जैसे पोषक तत्वों की भी पड़ताल की गई। सवाल सिर्फ यह नहीं था कि बीज अंकुरित होंगे या नहीं, बल्कि यह भी था कि क्या वे भविष्य में असली भोजन बन सकते हैं।

मंगल मिशन के लिए बीज इतने अहम क्यों?
लंबी अंतरिक्ष यात्राओं के लिए ऐसी व्यवस्था चाहिए, जो धरती से बार-बार सामान मंगाए बिना काम कर सके। मंगल जैसी यात्रा के लिए रास्ते भर और वहां पहुंचने के बाद भी भोजन चाहिए होगा। बीज एक बेहतरीन विकल्प हो सकते हैं, क्योंकि इन्हें स्टोर करके जरूरत पड़ने पर उगाया जा सकता है, बशर्ते यह पता हो कि लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने के बाद भी वे उपयोगी बने रहते हैं।

धरती के उलट, अनंत अंतरिक्ष में विकिरण से बचाव की वैसी सुरक्षा नहीं मिलती। यही वजह है कि RAD-SEED शोध विकिरण, बीज भंडारण और पौध वृद्धि से जुड़े इस अहम सवाल का जवाब तलाश रहा है।

धरती की खेती के लिए भी काम आएगा शोध
दिलचस्प बात यह है कि इस प्रयोग का फायदा सिर्फ अंतरिक्ष तक सीमित नहीं है। अलग-अलग फसलें पर्यावरणीय तनाव पर अलग तरह से प्रतिक्रिया देती हैं। इन प्रतिक्रियाओं को समझकर वैज्ञानिक उन खास गुणों की पहचान कर सकते हैं, जो कठिन और चरम परिस्थितियों में भी फसल उगाने में मदद करें।

इस प्रयोग का लाभ धरती पर होने वाली खेती और अनुसंधान को भी मिल सकता है।

गौरतलब है कि X-37B ने वैज्ञानिकों को यह दुर्लभ मौका दिया कि वे एक ही बीज को अंतरिक्ष में भेजकर, वापस लाकर, बारीकी से परख सकें। उड़ान के नमूनों, धरती पर हुए नियंत्रित प्रयोगों और सिम्युलेटेड रेडिएशन टेस्ट के मिले-जुले नतीजे आने वाले समय में बीज भंडारण, पौध वृद्धि और विकिरण से सुरक्षा से जुड़े शोध की नई राह खोल सकते हैं।
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