एक शोध के अनुसार, इंसानों और पशुओं के मल-मूत्र में मौजूद नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटेशियम से दुनियाभर की फसलों की कुल पोषक तत्वों जरूरत का 13 प्रतिशत हिस्सा पूरा किया जा सकता है। यह शोध कॉर्नेल यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने किया है, जिसे नेचर सस्टेनेबिलिटी नाम की पत्रिका मं जगह मिली है।
146 देशों के आंकड़ों पर हुआ शोध
इस शोध के नतीजे खाद्य और कृषि संगठन और इंटरनेशनल फर्टिलाइजर एसोसिएशन के आंकड़ो और सैटेलाइट मैप के आधार पर सामने आए हैं। लगभग 146 देशों के आकड़ों के विश्लेषण में सामने आया कि मानव ौर पशुओं के मल-मूत्र में मौजूद नाइट्रोजन से दुनिया की 16 प्रतिशत, फास्फोरस से 8 प्रतिशत और पोटेशियम से 14 प्रतिशत खाद की जरूरत पूरी हो सकती है। प्रमुख पोषक तत्वों के लिए यह संयुक्त आंकड़ा 13 प्रतिशत बैठता है।
शोधकर्ताओं ने माना है कि मल-मूत्र का परिवाहन काफी महंगा है। ऐसे में यह शोध फोकस करता है कि जहां मल-मूत्र की उपलब्धता है, वहीं, आसपास के खेतों में इनका उपयोग किया जाए।
रासायनिक खाद के आयात पर घटेगी निर्भरता
शोधकर्ताओं के शोध ढांचे में सामने आया कि अगर उपलब्ध मल-मूत्र को घरेलू स्तर पर पुनर्चक्रण किया जाए, तो रासायनिक उर्वरकों के आयात पर निर्भरता काफी कम हो जाएगी।इससे वैश्विक स्तर पर नाइट्रोजन खाद के आयात में 41 प्रतिशत, फास्फोरस के आयात में 3 प्रतिशत और पोटेशियम के आयात में 36 प्रतिशत की कमी आ सकती है।
मिट्टी में होगा सुधार
शोध के अनुसार, जिन देशों में स्थानीय स्तर पर पशुओं का मल-मूत्र और रासायनिक खाद मिलकर भी फसलों की जरूरत पूरी नहीं कर पाते, वहां मल-मूत्र का सही उपयोग पोषक तत्वों की कमी को काफी पाट सकता है। इस तरह नाइट्रोजन की कमी औसतन 20 प्रतिशथ, फास्फोरस में 11 प्रतिशत और पोटेशियम में 13 प्रतिशत का सुधार हो सकता है।
जल प्रदूषण से बचाव और पर्यावरण को फायदा
रिपोर्ट में जोहान्स लेहमैन के हवाले से बताया गया है कि मल-मूत्र का फायदा सिर्फ रासायनिक खाद की जगह लेने तक सीमित नहीं है। जब मानव या पशुओं के कचरे का सही प्रबंधन नहीं होता, तो इसके पोषक तत्व खेतों में जाने के बजाय आसपास के पानी और मिट्टी में मिल जाते हैं। इससे पानी में प्रदूषण होता है और हानिकारक काई (algal blooms) जमने लगती है, जैसा कि न्यूयॉर्क की फिंगर लेक्स (Finger Lakes) में देखा गया है। मल-मूत्र को खाद के रूप में रीसायकल करने से इस प्रदूषण को रोका जा सकता है।
शोधकर्ता इसे एक सर्कुलर इकॉनमी का हिस्सा मानते हैं, जहां पोषक तत्व खेती से भोजन में, फिर उपभोग व पशुओं से होकर वापस खेती के सिस्टम में पहुंच जाते हैं।
खाद सुरक्षा और भू-राजनीतिक चुनौतियां
शोधकर्ताओं का तर्क है कि मल-मूत्र के इस्तेमाल से रासायनिक खाद के उत्पादन पर भी निर्भरता कम होगी। लेहमैन के अनुसार, वैश्विक उर्वरक आपूर्ति कच्चे तेल जैसी ही एक भू-राजनीतिक समस्या है। उन्होंने बताया कि फास्फोरस एक ऐसा संसाधन है जो दोबारा नहीं बनता और इसकी खदानें दुनिया के कुछ ही देशों तक सीमित हैं। वहीं, नाइट्रोजन खाद बनाने में भारी मात्रा में ऊर्जा लगती है, जिससे ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है।
2050 तक मल-मूत्र काफी अहम होंगे
लेहमैन ने कॉर्नेल को बताया कि सैद्धांतिक रूप से, मल-मूत्र का उपयोग अन्य स्रोतों के साथ मिलकर वर्तमान खाद की जरूरत को पूरा कर सकता है। लेहमैन का मानना है कि 2050 के आसपास जब दुनिया की आबादी लगभग 10 अरब (10 billion) हो जाएगी, तब दुनिया भर के लोगों का पेट भरने की चुनौती के बीच मल-मूत्र की खाद के रूप में रीसाइक्लिंग और भी अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी।