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नई रिसर्च : मेघालय के जंगली पौधे में मिले कैंसर-रोधी गुण, स्थानीय लोग सदियों से कर रहे हैं इसका औषधीय उपयोग

डॉ. उमाशंकर मिश्र, लुमामी (नागालैंड) Published by: Umashankar Mishra Updated Mon, 10 Nov 2025 02:04 PM IST
सार

नागालैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने मेघालय के जंगलों में पाए जाने वाले एक लुप्तप्राय पौधे - गोनियोथैलेमस सिमोंसी - के औषधीय गुणों की पुष्टि की है, जिसका दावा स्थानीय समुदाय के लोग सदियों से करते रहे हैं। शोधकर्ताओं ने दिखाया है कि पारंपरिक चिकित्सा में उपयोग होने वाले इस पौधे के प्राकृतिक यौगिक कैंसर-संबंधी प्रोटीन के साथ कैसे परस्पर प्रतिक्रिया करते हैं। यह जानकारी कैंसर के उपचार के लिए प्रकृति-आधारित दवाओं के विकास के नए रास्ते खोल सकती है। 

वेस्ट गारो हिल्स के ग्रामीण पौधे की प्रजाति के साथ।
वेस्ट गारो हिल्स के ग्रामीण पौधे की प्रजाति के साथ। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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पूर्वोत्तर भारत के जंगलों में पाया जाने वाला कटहल चम्पा एक दुर्लभ पौधा है। मेघालय सहित पूर्वोत्तर के कई इलाकों में पाया वाले के कई इलाकों में इस लुप्तप्राय औषधीय पौधे का उपयोग पारंपरिक चिकित्सा में होता रहा है। एक नए अध्ययन में, गोनियोथैलेमस सिमोंसी प्रजाति के इस पौधे के उन पारंपरिक औषधीय गुणों की पहली बार पुष्टि की गई है, जिसका दावा स्थानीय समुदाय के लोग सदियों से करते रहे हैं। यह संयुक्त अध्ययन, नागालैंड विश्वविद्यालय और असम डाउनटाउन विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं द्वारा किया गया है।  

रोगाणुरोधी और कैंसर-रोधी गुण 
गोनियोथैलेमस सिमोंसी प्रजाति के इस पौधे का उपयोग लंबे समय से स्थानीय समुदायों द्वारा जठरांत्र संबंधी जटिलताओं, गले में जलन, टाइफाइड बुखार और मलेरिया के इलाज के लिए किया जाता रहा है। शोधकर्ताओं का दावा है कि इससे पहले इसकी वैज्ञानिक या औषधीय क्षमता का अध्ययन नहीं किया गया था। यह अध्ययन, इस पौधे के पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक आधार प्रदान करता है और दर्शाता है कि जी. सिमोंसी शक्तिशाली एंटीऑक्सीडेंट, सूजनरोधी, मधुमेहरोधी, रोगाणुरोधी और कैंसर-रोधी गतिविधियों वाले जैविक रूप से सक्रिय पादप रासयनों का समृद्ध स्रोत है। 

दवाओं के विकास में सहायक भारत की जैव विविधता 
डॉ. मयूर मौसूम फुकन के नेतृत्व में यह अध्ययन उनके शोध छात्र सैमसन रोज़ली संगमा ने किया है। नागालैंड विश्वविद्यालय के वानिकी विभाग के सहायक प्रोफेसर, डॉ. फुकन ने कहा, "यह अध्ययन ऐसे समय में पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान से जोड़ता है, जब एंटीबायोटिक प्रतिरोध, पुरानी बीमारियां और सिंथेटिक दवाओं के दुष्प्रभाव स्वास्थ्य सेवा प्रणालियों पर दबाव डाल रहे हैं। शोध के निष्कर्ष पुष्टि करते हैं कि भारत की समृद्ध जैव विविधता में आधुनिक औषधि खोज की अपार संभावनाएं हैं। गोनियोथैलेमस सिमोंसी न केवल औषधीय रूप से आशाजनक है, बल्कि ऐसी लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण की तत्काल आवश्यकता को भी रेखांकित करता है।"

नागालैंड विश्वविद्यालय के कुलपति, प्रो. जगदीश के. पटनायक ने कहा, "इस अध्ययन के माध्यम से, हमारे शोधकर्ता न केवल एक दुर्लभ पादप प्रजाति के संरक्षण और समझ में योगदान दे रहे हैं, बल्कि पारंपरिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के बीच की खाई को पाटने में भी मदद कर रहे हैं।" प्रो. पटनायक ने आगे कहा, "मैं शोध दल की उनके समर्पण और अभिनव दृष्टिकोण की सराहना करता हूं, और मुझे विश्वास है कि यह कार्य हमारी समृद्ध जैव विविधता के सतत उपयोग के लिए नए रास्ते खोलेगा।" 

सैमसन रोज़ली संगमा ने कहा, "गोनियोथैलेमस सिमोंसी दुर्लभ प्रजाति है, जिसकी आबादी चिंताजनक रूप से घट रही है और अब यह केवल कुछ प्राकृतिक आवासों तक ही सीमित है। इस गिरावट का मुख्य कारण स्थानीय समुदायों में इसके औषधीय महत्व के बारे में सीमित जागरूकता है। अंतर्राष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) द्वारा 'लुप्तप्राय' पौधों की सूची में शामिल इस पौधे को अब अधिक संरक्षण प्रयासों की आवश्यकता है। हमें उम्मीद है कि यह अध्ययन, इस दुर्लभ पौधे के संरक्षण और खेती की पहल को प्रोत्साहित करेगा, जिससे जंगल में इसका स्थायी उपयोग और सुरक्षा सुनिश्चित होगी।"

भारत के पारंपरिक ज्ञान को वैज्ञानिक आधार 
यह अध्ययन, भारत की स्वदेशी औषधीय विरासत को वैज्ञानिक रूप से वेरिफाई करने के प्रयासों महत्व को उजागर करता है। साथ ही, यह जैव विविधता आधारित इनोवेशन और संरक्षण के महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में पूर्वोत्तर की भूमिका को भी मजबूती से पेश करता है। शोधकर्ता इन नतीजों को और वेरिफाई करने और भविष्य में फाइटोफार्मास्युटिकल फॉर्मूलेशन के रूप में इस पौधे की क्षमता का पता लगाने के लिए प्रायोगिक और चिकित्सीय अध्ययन की योजना बना रहे हैं। उनका कहना है कि यह रिसर्च पारंपरिक ज्ञान, बायोडायवर्सिटी और टिकाऊ स्वास्थ्य समाधानों के बीच संबंध को मजबूत करती है।

शोध पत्रिका केमिस्ट्री एंड बायोडायवर्सिटी में प्रकाशित इस अध्ययन के शोधकर्ताओं में, डॉ. फुकन और रोज़ली संगमा के अलावा, नागालैंड विश्वविद्यालय के डॉ. प्रणय पुंज पंकज एवं शोधार्थी वाहशी चोंगलोई और असम डाउनटाउन विश्वविद्यालय के डॉ. ध्रुबज्योति गोगोई शामिल हैं। 
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