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हिमाचल प्रदेश : पतंगे के अंडों पर हमला करेगी नई ततैया, बुरांस के पेड़ों को बचाने की जगी उम्मीद

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Wed, 30 Sep 2026 06:05 PM IST
सार

दो साल के अध्ययन में वैज्ञानिकों ने गैजालिना क्राइसोलोफा पतंगे के अंडों को नष्ट करने वाली नई ततैया ‘टेलेनोमस अल्टिकोलस’ खोजी है। इसे इस पतंगे के अंडों का दुनिया में दर्ज पहला परजीवी बताया गया है। खोज से बुरांस और हिमालयी एल्ड को बचाने के लिए प्राकृतिक जैविक नियंत्रण की नई उम्मीद जगी है।

सांकेतिक तस्वीर
सांकेतिक तस्वीर - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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हिमालयी क्षेत्रों में बुरांस के पेड़ों को नुकसान पहुंचा रहे गैजालिना क्राइसोलोफा पतंगे से निपटने की उम्मीद जगी है। भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (जेडएसआई) और पद्मजा नायडू हिमालयी प्राणी उद्यान के वैज्ञानिकों ने दार्जिलिंग के जंगलों में पतंगे के अंडों को नष्ट करने वाली ततैया की नई प्रजाति ‘टेलेनोमस अल्टिकोलस’ खोजी है।

वैज्ञानिकों के अनुसार, गैजालिना क्राइसोलोफा के अंडों का यह दुनिया में दर्ज पहला परजीवी है। दो साल तक चले अध्ययन में सामने आई इस खोज से बुरांस और हिमालयी एल्ड जैसे महत्वपूर्ण पेड़ों को बचाने के लिए प्राकृतिक जैविक नियंत्रण का नया रास्ता खुल सकता है।

सैकड़ों पेड़ों को नुकसान पहुंचा रहा था पतंगा
वैज्ञानिकों ने सिंगालीला राष्ट्रीय उद्यान में बुरांस के पेड़ों पर गैजालिना क्राइसोलोफा के प्रकोप के बाद अध्ययन शुरू किया। इस पतंगे ने पेड़ों की टहनियों और पत्तियों को नुकसान पहुंचाया, जिससे बड़ी संख्या में पेड़ सूखने लगे। अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों ने पतंगे के अंडों और उसके जीवन चक्र से जुड़े जीवों की जांच की। इसी दौरान उन्हें नई ततैया प्रजाति मिली। यह ततैया पतंगे के अंडे में अपना अंडा देती है। ततैया का विकास उसी अंडे के अंदर होता है और अंततः पतंगे का अंडा नष्ट हो जाता है। शोध के निष्कर्ष हाल ही में बायोकंट्रोल साइंस एंड टेक्नोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुए हैं।

बुरांस और हिमालयी एल्ड के लिए क्यों अहम?
गैजालिना क्राइसोलोफा कई तरह के पौधों को नुकसान पहुंचाने वाला पतंगा है। हिमालयी क्षेत्र में इसका असर खास तौर पर बुरांस और हिमालयी एल्ड पर देखा गया है। बुरांस हिमालयी राज्यों का महत्वपूर्ण पेड़ है। इसके फूलों से जूस और अन्य खाद्य उत्पाद तैयार किए जाते हैं। वहीं हिमालयी एल्ड का इस्तेमाल बड़ी इलायची की खेती में छायादार पेड़ के रूप में किया जाता है। ऐसे में पतंगे के प्राकृतिक दुश्मन की खोज इन पेड़ों को बचाने की दिशा में महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

दूसरे प्राकृतिक दुश्मन भी मिले
अध्ययन के दौरान वैज्ञानिकों को पतंगे से जुड़े कुछ अन्य प्राकृतिक शत्रु भी मिले। इनमें मेगासेलिया स्केलेरिस नाम की एक स्कटल फ्लाई और तीन तरह के ऐसे कवक शामिल हैं, जो पतंगे के लार्वा को संक्रमित कर उन्हें मार सकते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि इन प्राकृतिक शत्रुओं का आगे अध्ययन कर पतंगे के प्रकोप को नियंत्रित करने के लिए जैविक तरीकों को विकसित किया जा सकता है।

मनुष्यों और पशुओं के लिए भी खतरा
अध्ययन में पतंगे से जुड़े संभावित स्वास्थ्य जोखिमों का भी उल्लेख किया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार, इसकी वयस्क मादाओं से मनुष्यों में गंभीर आंखों के संक्रमण का खतरा हो सकता है। पशुओं के इसे गलती से खा लेने पर भी गंभीर नुकसान हो सकता है।

पेड़ों के सूखने की वजह पर और शोध जरूरी
नौणी विश्वविद्यालय, सोलन के वैज्ञानिकों ने पहले बुरांस के पेड़ों के निचले क्षेत्रों में सूखने और ऊंचाई वाले इलाकों में नए पेड़ों के उगने का अध्ययन किया था। हालांकि, उस अध्ययन में पेड़ों के सूखने के पीछे किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं बताया गया था। मौजूदा अध्ययन में गैजालिना क्राइसोलोफा के प्रकोप से पेड़ों को हुए नुकसान की जानकारी सामने आई है। हालांकि, बुरांस के पेड़ों के सूखने में कीटों के साथ मौसम और पर्यावरणीय बदलावों की भूमिका को समझने के लिए आगे और अध्ययन की जरूरत है।

छह वैज्ञानिकों ने किया अध्ययन
यह शोध पल्लव चटर्जी, रूपम देबनाथ, कब्बिनाहल्ली पुट्टेगौड़ा दिनेश, बसवराज होलेयाची, केलोथ राजमोहना और नवनीत सिंह ने भारतीय प्राणी सर्वेक्षण और पद्मजा नायडू हिमालयी प्राणी उद्यान के सहयोग से किया। अध्ययन को पश्चिम बंगाल चिड़ियाघर प्राधिकरण और विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग के विज्ञान एवं इंजीनियरिंग अनुसंधान बोर्ड का सहयोग मिला।

वैज्ञानिक ने कहा
डॉ. नवनीत सिंह, प्रभारी, भारतीय प्राणी सर्वेक्षण, सोलन ने बताया कि दार्जिलिंग समेत हिमालयी क्षेत्रों में गैजालिना क्राइसोलोफा बुरांस और हिमालयी एल्ड के पेड़ों को नुकसान पहुंचा रहा था। सिंगालीला राष्ट्रीय उद्यान में इसके प्रकोप से सैकड़ों पेड़ प्रभावित हुए। दो साल के अध्ययन में मिली टेलेनोमस अल्टिकोलस ततैया पतंगे के अंडों को नष्ट करती है। इससे इन पेड़ों को प्राकृतिक तरीके से बचाने की संभावनाएं बढ़ी हैं।
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