भारत के वैश्विक तापमान बढ़ाने में कृषि क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 28% है। पशुपालन और धान के खेतों से निकलने वाली मीथेन और नाइट्रस ऑक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों को इसका प्रमुख कारण बताया गया है। एक अध्ययन के मुताबिक, भारत ऐतिहासिक रूप से वैश्विक तापमान बढ़ाने में योगदान देने वाले देशों में पांचवें स्थान पर है।
ब्रिटेन की क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी और आईआईटी खड़गपुर के शोधकर्ताओं ने वर्ष 1750 से 2024 तक यानी करीब 274 वर्षों के उत्सर्जन से जुड़े आंकड़ों का अध्ययन किया। शोध के अनुसार, इस अवधि में भारत के उत्सर्जन के कारण वैश्विक तापमान में करीब 0.05 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी का अनुमान है।
ऊर्जा क्षेत्र की सबसे बड़ी हिस्सेदारी
अध्ययन के मुताबिक, भारत के वैश्विक तापमान प्रभाव में ऊर्जा क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 61% है। शोधकर्ताओं ने इसका प्रमुख कारण बिजली उत्पादन और परिवहन में जीवाश्म ईंधन के इस्तेमाल को बताया है। इसके बाद कृषि क्षेत्र का योगदान महत्वपूर्ण है। खासकर पशुपालन से निकलने वाली मीथेन और धान के खेतों से निकलने वाली मीथेन एवं नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन को कृषि क्षेत्र के तापमान प्रभाव का प्रमुख स्रोत माना गया है।
पशु आहार और पानी प्रबंधन से घट सकता है उत्सर्जन
शोधकर्ताओं ने कृषि क्षेत्र से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन कम करने के लिए कुछ उपाय भी सुझाए हैं। इनमें पशुओं के आहार में सुधार और धान की खेती में बेहतर जल प्रबंधन प्रमुख हैं। इन उपायों से मीथेन जैसे उत्सर्जन को कम करने में मदद मिल सकती है। कृषि क्षेत्र में जल प्रबंधन, पशु आहार और खेती के तरीकों में बदलाव से एक तरफ उत्पादन को बनाए रखने और दूसरी तरफ खेती से होने वाले ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को कम करने में मदद मिल सकती है।
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