एक दौर था, जब पारंपरिक बासमती की कम पैदावार किसानों के लिए चुनौती थी। फिर कृषि वैज्ञानिकों के शोध ने बासमती की दुनिया बदल दी। आज भारत की बासमती दुनियाभर में अपनी खुशबू, स्वाद और लंबे दानों के लिए मशहूर है और देश को हजारों करोड़ रुपये की विदेशी मुद्रा दिलाने में अहम भूमिका निभाती है।
गांव जंक्शन के इस विशेष इंटरव्यू में भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान (IARI), पूसा के पूर्व निदेशक और पद्मश्री से सम्मानित कृषि वैज्ञानिक डॉ. अशोक कुमार सिंह बता रहे हैं बासमती की ऐतिहासिक यात्रा, पारंपरिक किस्मों से पूसा बासमती तक का सफर और उन वैज्ञानिक प्रयासों की कहानी, जिन्होंने किसानों और भारतीय चावल निर्यात को नई पहचान दी।
इस बातचीत की पहली कड़ी में जानिए:
बासमती चावल को खास क्या बनाता है?
पारंपरिक बासमती से आधुनिक किस्मों तक का सफर कैसे तय हुआ?
पूसा बासमती 1121, 1509 और दूसरी प्रमुख किस्मों की खासियत क्या है?
बासमती के जीआई टैग का क्या महत्व है और किन क्षेत्रों में इसकी मान्यता है?
भारत के बासमती निर्यात और किसानों की आमदनी में इन किस्मों की क्या भूमिका है?
यह इंटरव्यू दो भागों में प्रकाशित किया जा रहा है। पहले भाग में बासमती की यात्रा, किस्मों, जीआई टैग और निर्यात पर चर्चा की गई है। दूसरे भाग में किसानों के लिए उपयोगी तकनीकों, नकली बीजों की पहचान, सीधी बिजाई, रोग प्रबंधन, पानी की बचत और खेती के भविष्य पर बातचीत होगी।
देखिए गांव जंक्शन की यह खास पेशकश और जानिए बासमती की खुशबू के पीछे छिपी विज्ञान की कहानी।
HIGHLIGHTS
पारंपरिक बासमती से आधुनिक पूसा बासमती किस्मों तक का सफर
पूसा बासमती 1121, 1509 और दूसरी प्रमुख किस्मों की खासियत
बासमती चावल की खुशबू, स्वाद और लंबे दानों का विज्ञान
बासमती को मिले GI टैग का महत्व और मान्यता प्राप्त क्षेत्र
भारतीय बासमती निर्यात में वैज्ञानिक शोध की भूमिका
बासमती की उन्नत किस्मों से किसानों को मिलने वाले फायदे