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मुर्गीपालन की चमक के पीछे धुंधली तस्वीर: पोल्ट्री इकाइयों में पशु कल्याण, स्वच्छता और सुरक्षा पर गंभीर सवाल

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Tue, 08 Sep 2026 06:30 PM IST
सार

भारत में बढ़ते मुर्गीपालन और अंडा उत्पादन के बीच पोल्ट्री फार्मों में पशु कल्याण, स्वच्छता और जैव-सुरक्षा पर भी ध्यान देने की जरूरत है। पशु कल्याण संगठन सेंटिएंट की चार राज्यों में 21 पोल्ट्री इकाइयों की जांच में फार्म में भीड़भाड़, मुर्गियों की चोट, खराब अपशिष्ट प्रबंधन और कमजोर जैव-सुरक्षा जैसी चिंताएं सामने आई हैं। 

रिपोर्ट के अनुसार, 21 पोल्ट्री फार्म्स में से केवल एक इकाई में स्पष्ट जैव-सुरक्षा उपाय दिखाई दिए।
रिपोर्ट के अनुसार, 21 पोल्ट्री फार्म्स में से केवल एक इकाई में स्पष्ट जैव-सुरक्षा उपाय दिखाई दिए। - फोटो : ai
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विस्तार
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भारत में मुर्गीपालन किसानों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए आय और रोजगार का अहम साधन बन रहा है। लेकिन, उत्पादन बढ़ाने के साथ पोल्ट्री फार्मों में मुर्गियों की सेहत, स्वच्छता, जैव-सुरक्षा और अपशिष्ट प्रबंधन पर भी ध्यान जरूरी है। पोल्ट्री किसानों और अंडा एवं चिकन कारोबार की तरक्की के साथ ही पशुओं की देखभाल और सुरक्षित उत्पादन व्यवस्था कैसे मजबूत हो, इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है। पशु कल्याण संगठन सेंटिएंट द्वारा हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु समेत चार राज्यों की 21 पोल्ट्री इकाइयों की जांच में ये बातें उभर कर आई हैं। 

4 राज्यों की 21 पोल्ट्री इकाइयों की जांच
संगठन ने हरियाणा, पंजाब, मध्य प्रदेश और तमिलनाडु की 21 लेयर-हेन पोल्ट्री इकाइयों की जांच के बाद ये निष्कर्ष जारी किए हैं। जांच में शामिल इकाइयों की अनुमानित क्षमता करीब 3,000 से 2 लाख मुर्गियों तक थी और सभी में बैटरी-केज प्रणाली इस्तेमाल होने की बात कही गई है। कई फार्मों में मुर्गियों के लिए जगह की कमी, आपसी लड़ाई और चोट जैसी समस्याएं बार-बार दिखाई दीं।

चोट और डीबीकिंग पर चिंता
जांचकर्ताओं ने पोल्ट्री फार्म्स में मुर्गियों की गर्दन और पंखों पर चोट, टूटे पैर, रक्तस्राव, त्वचा संबंधी समस्याओं और अत्यधिक कमजोरी जैसी स्थितियां दर्ज करने का दावा किया है। कई मुर्गियों के खड़े न हो पाने की बात भी रिपोर्ट में कही गई है। डीबीकिंग यानी चोंच के हिस्से को काटने की प्रक्रिया भी कई इकाइयों में सामान्य प्रथा के रूप में सामने आने का दावा किया गया। संगठन ने इससे जुड़ी चोट और रक्तस्राव की तस्वीर भी सामने रखी है।

गंदगी और कचरा प्रबंधन बना बड़ी चुनौती
कई फार्मों में पिंजरों के नीचे लंबे समय तक जमा मुर्गियों की बीट, दुर्गंध, रुका हुआ पानी, चूहे, कॉकरोच और मच्छरों के लार्वा मिलने की बात रिपोर्ट में कही गई है। कुछ जगहों पर चारे में फफूंद या संभावित संदूषण के संकेत भी देखे गए। अपशिष्ट और गंदे पानी के निकास की व्यवस्था भी कई इकाइयों में कमजोर बताई गई। कहीं नालियां जाम थीं तो कहीं गंदा पानी जमा या बहता हुआ मिला।

जैव-सुरक्षा व्यवस्था भी सवालों में
रिपोर्ट के अनुसार, 21 पोल्ट्री फार्म्स में से केवल एक इकाई में स्पष्ट जैव-सुरक्षा उपाय दिखाई दिए। बाकी जगहों पर कर्मचारियों और आगंतुकों के लिए मास्क तथा अन्य सुरक्षा उपकरणों के इस्तेमाल की व्यवस्था सीमित बताई गई। पोल्ट्री फार्मों में जैव-सुरक्षा इसलिए अहम है क्योंकि कमजोर स्वच्छता और बाहरी संक्रमण नियंत्रण से पक्षियों के स्वास्थ्य के साथ-साथ पूरे उत्पादन तंत्र पर असर पड़ सकता है।

MP की 7 इकाइयों पर अनुपालन का सवाल
मध्य प्रदेश में जांची गई सातों इकाइयों के पास राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड की Consent to Establish या Consent to Operate नहीं होने का दावा किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, कुछ इकाइयों को लेकर 2024 में शिकायतें भी दर्ज कराई गई थीं।

किसान और पोल्ट्री कारोबार के लिए क्यों अहम?
पोल्ट्री फार्मिंग छोटे और मध्यम किसानों समेत ग्रामीण परिवारों की आय का महत्वपूर्ण हिस्सा है। इसलिए, पशु कल्याण के सवाल को केवल कंपनियों या बड़े फार्मों तक सीमित देखने के बजाय किसानों को बेहतर तकनीक, पशु चिकित्सा सहायता, स्वच्छ फार्म प्रबंधन और जैव-सुरक्षा प्रशिक्षण उपलब्ध कराना भी जरूरी है। बेहतर व्यवस्थाएं पक्षियों के स्वास्थ्य, उत्पादन की स्थिरता और किसानों की आर्थिक सुरक्षा - तीनों के लिए महत्वपूर्ण हो सकती हैं।

बच्चों के काम करने पर भी उठे सवाल
Sentient के मुताबिक, कुछ पोल्ट्री इकाइयों में बच्चों को अंडे इकट्ठा करने और परिसर की सफाई जैसे काम करते देखा गया। संगठन ने यह भी कहा कि निरीक्षण के दौरान देखे गए वयस्क और बच्चे सामान्यतः मास्क या अन्य व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों से लैस नहीं थे।

जांच ने दिए मजबूत निगरानी के संकेत
Sentient ने नियमित निरीक्षण, पशु-चिकित्सा सहायता, बेहतर जैव-सुरक्षा, सुरक्षित शव एवं कचरा निपटान, श्रमिक सुरक्षा और नियमों के प्रभावी अनुपालन की मांग की है। हालांकि, ये निष्कर्ष संगठन की जांच और उसके अवलोकनों पर आधारित हैं। रिपोर्ट में कुछ जगहों पर मृत्यु की संख्या जैसी जानकारियां कर्मचारियों के कथनों पर आधारित हैं और वास्तविक मृत्यु दर का स्वतंत्र सत्यापन नहीं किया गया।

पोल्ट्री क्षेत्र के लिए संदेश साफ है कि उत्पादन और मुनाफे के साथ मुर्गियों की सेहत, किसानों की सुरक्षा, स्वच्छता और जिम्मेदार फार्म प्रबंधन को भी विकास का हिस्सा बनाना होगा।


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