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यूपी के एक गांव वाले की ईरान में क्रांति : उखाड़ फेंका था शाही तख्त, कायम किया इस्लामी गणराज्य
गांव जंक्शन, लखनऊ
Published by: Mohammad Aamil
Updated Fri, 13 Jun 2025 06:24 PM IST
सार
अयातुल्लाह खुमैनी के दादा सैय्यद अहमद मूसवी हिंदी का जन्म 1790 में बाराबंकी के किन्तूर गांव में हुआ था। वे अवध के नवाब के धार्मिक सलाहकारों में से थे और 40 वर्ष की उम्र में तीर्थयात्रा पर ईरान गए थे।
UP के किंतूर गांव में जन्में थे दादा
- फोटो : गांव जंक्शन
Iran Israel War: ईरान और इजराइल के बीच तनाव बढ़ गया है। 13 जून 2025 की सुबह इजराइल ने ईरान के परमाणु ठिकानों को टारगेट बनाते हुए कई हमले किए हैं। ईरान एक शिया मुस्लिम बाहुल्य इस्लामी मुल्क है। लेकिन, 1979 से पहले इस मुल्क में राजशाही थी, जिसे भारत के एक गांव से निकले एक ग्रामीण ने बदल डाला और ईरान में इस्लामी गणराज्य की स्थापना की। कम ही लोग जानते हैं कि 1979 में ईरानी क्रांति के प्रमुख नेता अयातुल्लाह रुहोल्लाह खुमैनी की जड़े उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के गांव किंतूर से जुड़ी हैं।
UP के किंतूर गांव में जन्में थे दादा
अयातुल्लाह खुमैनी के दादा सैय्यद अहमद मूसवी हिंदी का जन्म 1790 में बाराबंकी के किन्तूर गांव में हुआ था। वे अवध के नवाब के धार्मिक सलाहकारों में से थे और 40 वर्ष की उम्र में तीर्थयात्रा पर ईरान गए थे। 1830 में वे ईरान में हजरत अली की कब्र पर जियारत के लिए पहुंचे। उसके बाद वह वहां से वापस भारत नहीं लौटे और वहीं ईरान के खुमैनी नामक गांव में बस गए। इस बीच सैय्यद अहमद मूसवी ने ‘हिंदी’ उपनाम को अपने नाम में जोड़ लिया, जो उनकी भारतीय विरासत का प्रतीक बन गया। लेखक और पत्रकार बाकर मोईन के मुताबिक, भारत में पैर जमा चुकी ब्रिटिश हुकूमत से बचने के लिए ईरान में बस गए थे।
बचपन में हो गई पिता की हत्या
ईरान में सैय्यद अहमद मूसवी के पुत्र मुस्तफा हिंदी, और फिर उनके पौत्र रुहोल्लाह खुमैनी, दोनों ही इस्लाम धर्म के उच्च विद्वान बने। रुहोल्लाह खुमैनी का झुकाव बचपन से ही इस्लामी कानून और दर्शन की ओर रहा। इतिहास के मुताबिक, रुहोल्लाह खुमैनी जब दो वर्ष के थे, तब उनके पिता की हत्या कर दी गई थी। उसके बाद उनको उनकी मां और चाची ने पाला। पिता की हत्या वाली घटना से रुहोल्लाह खुमैनी का जीवन बदल डाला।
बगावत के बाद किया देश निकाला
खुमैनी ने ईरान के अराक और कोम जैसे प्रमुख धार्मिक शिक्षण केंद्रों में पढ़ाई की और वहीं अध्यापन भी किया। शिक्षण के दौरान ही वे शाह मोहम्मद रजा पहलवी की राजशाही के कट्टर विरोधी बन गए। उन्होंने 'विलायत-ए-फकीह' यानी धार्मिक विद्वानों की सर्वोच्चता पर आधारित शासन की अवधारणा प्रस्तुत की। इसके चलते उन्हें देश निकाला दे दिया गया, लेकिन वे अपने आंदोलन से पीछे नहीं हटे। 26 अक्टूबर 1964 को, खुमैनी ने शाह और संयुक्त राज्य अमेरिका दोनों की निंदा की। इसी साल उन्हें ईरान में गिरफ्तार किया गया और छह महीने तक जेल में रखा गया। उसके बाद खुमैनी को देश निकाला कर दिया गया।
अखबार ने लिखा भारतीय मूल का 'मुल्ला'
14 साल तक रुहोल्लाह खुमैनी ईरान से बाहर रहे। पहले वे तुर्की फिर ईराक में आकर बसे। ईराक के उपराष्ट्रपति बने सद्दाम हुसैन ने खुमैनी को ईराक से निकाल दिया। उसके बाद वह पेरिस और फ्रांस पहुंचे। इस बीच ईरान में क्रांति फैल गई। रुहोल्लाह खुमैनी को भारतीय और ब्रिटेन का एजेंट साबित करने के लिए 7 जनवरी, 1978 को इत्तेलात अखबार में उन्हें एक भारतीय मूल का 'मुल्ला' कहा गया, तो जनता में आक्रोश और भड़क गया। लाखों लोग सड़कों पर उतर आए और इसके खिलाफ विद्रोह शुरू हो गया। आखिर में, 16 जनवरी 1979 को सत्ताधारी शाह मोहम्मद रजा पहलवी, ईरान देश छोड़कर भाग गए।
खत्म की राजसत्ता, कायम किया इस्लामी गणराज्य
1 फरवरी 1979, को खुमैनी 14 वर्षों के निर्वासन के बाद ईरान लौटे। उनके स्वागत में लाखों की भीड़ जुटी। शीघ्र ही उन्होंने शहंशाही शासन को समाप्त कर इस्लामी गणराज्य ईरान की स्थापना की और 1989 में अपनी मृत्यु तक वे देश के सर्वोच्च नेता बने रहे। ईरान में शिया मुस्लिमों की संख्या सबसे अधिंक है।
भारत में शिया समुदाय
भारत में भी शियाओं की आबादी करीब एक करोड़ से ज्यादा है। यहां के शिया लोग धार्मिक यात्रा के लिए ईरान और ईराक जाते हैं। यहां इनके पवित्र तीर्थ स्थान हैं। वह यहां हजरत अली, हजरत इमाम हुसैन के रोजा ए मुबारक की जियारत करते हैं। नबावी दौर में भारत के अवध इलाके में शिया मुसलमानों की आबादी अच्छी तादात में थी। वर्तमान में भी उत्तर प्रदेश के लखनऊ और उसके आसपास शिया समुदाय के लोग बड़ी संख्या में रहते हैं।
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