छत्तीसगढ़ सरकार अपनी मुख्यमंत्री ग्रामीण बस योजना का विस्तार दूसरे चरण में आठ नए जिलों के अनुसूचित क्षेत्रों में करने जा रही है। सरकार के अनुसार, इस चरण के तहत अब तक नियमित बस सेवा से वंचित 4,368 गांवों को परिवहन तंत्र से जोड़ा जाएगा। इससे पहले योजना के प्रथम चरण में बस्तर और सरगुजा संभाग के 850 गांवों तक पहली बार नियमित बस सेवा पहुंचाई गई थी। इस नए विस्तार से 85 आदिवासी विकासखंडों के लगभग 14.57 लाख लोगों को सीधा लाभ मिलने का अनुमान है।
दूसरे चरण की योजना और डिजिटल भुगतान की तैयारीयोजना के दूसरे चरण को मोहला-मानपुर-अंबागढ़ चौकी, खैरागढ़-छुईखदान-गंडई, बालोद, गरियाबंद, गौरेला-पेंड्रा-मरवाही, रायगढ़, कोरबा और धमतरी जिलों के 85 आदिवासी विकासखंडों में लागू करने की तैयारी है। इसके तहत 60 से 80 नई बसों के संचालन का प्रस्ताव रखा गया है। यात्रियों की सुविधा को ध्यान में रखते हुए बस के किराए का भुगतान यूपीआई (UPI) और क्यूआर (QR) कोड के माध्यम से करने की सुविधा भी प्रस्तावित की गई है।
मुख्यमंत्री विष्णु देव साय के अनुसार, "दूरदराज के गांवों तक सुरक्षित और सुलभ परिवहन पहुंचाना हमारी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता है और हम इसे हासिल करेंगे।" मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि सुदूर गांवों के नागरिकों को भी शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार, बाजार और प्रशासनिक सेवाओं तक आसान पहुंच के समान अवसर मिलने चाहिए और यह योजना इस सोच को जमीन पर उतार रही है।
एक साल में 24 लाख किलोमीटर का सफर
इस योजना की शुरुआत 4 अक्टूबर 2025 को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जगदलपुर से 34 मार्गों पर लगभग 250 गांवों को जोड़ने के साथ की थी। पिछले एक वर्ष के दौरान 13 जिलों के 106 मार्गों पर 107 बसों के माध्यम से लगभग 24 लाख किलोमीटर की दूरी तय की गई है। वर्तमान में बस्तर संभाग के 51 मार्गों पर 50 बसें और सरगुजा संभाग के 55 मार्गों पर 57 बसें संचालित हो रही हैं। ये बसें 14 किलोमीटर से लेकर 105 किलोमीटर तक के कुल 5,300 किलोमीटर अधिसूचित मार्गों पर रोजाना करीब 17,500 किलोमीटर चलती हैं। अधिकांश मार्गों पर बसें प्रतिदिन दो फेरे लगाती हैं।
ग्रामीणों को राहत और स्थानीय व्यापार को बढ़ावा
सूत्रों के अनुसार, नियमित बस सेवा न होने के कारण ग्रामीणों को पहले पिकअप और मालवाहक वाहनों में खुले में बैठकर या खड़े होकर सफर करना पड़ता था, जिससे महिलाओं, बच्चों, बुजुर्गों और बीमारों को काफी कठिनाई होती थी। कम यात्री संख्या के चलते निजी ऑपरेटरों के लिए इन कठिन मार्गों पर बस चलाना व्यावसायिक रूप से संभव नहीं था, जिसे देखते हुए राज्य सरकार ने यह वित्तीय सहायता मॉडल तैयार किया।
इस सेवा का असर सुकमा जैसे दूरस्थ क्षेत्रों में साफ देखा गया है। सुकमा के कोंटा से जगरगुंडा के 83 किलोमीटर लंबे मार्ग पर जून 2026 में किए गए एक मैदानी आकलन के अनुसार, महिलाएं छोटे बच्चों और सामान के साथ सुरक्षित यात्रा कर रही हैं, विद्यार्थी नियमित स्कूल जा रहे हैं और मरीजों को स्वास्थ्य केंद्रों तक पहुंचना आसान हुआ है। ग्रामीण आम, महुआ के फूल, मुर्गे और अन्य वनोपज बाजार ले जाकर उसी दिन गांव लौट पा रहे हैं। साथ ही, इन मार्गों पर स्थित सुरक्षा बलों के कैंप भी इस सेवा का लाभ ले रहे हैं।
निजी ऑपरेटरों को वित्तीय सहायता और जीपीएस ट्रैकिंग
इस व्यवस्था के तहत राज्य सरकार को खुद बसें खरीदने या नए बस डिपो बनाने की आवश्यकता नहीं पड़ती। बसों का स्वामित्व और संचालन निजी ऑपरेटरों के पास ही रहता है और वे ही यात्रियों से किराया लेते हैं।
कठिन और कम यात्रियों वाले मार्गों पर संचालन को संभव बनाने के लिए राज्य सरकार ऑपरेटरों को प्रति किलोमीटर के आधार पर वित्तीय मदद दे रही है। इसके तहत पहले वर्ष 26 रुपये, दूसरे वर्ष 24 रुपये और तीसरे वर्ष 22 रुपये प्रति किलोमीटर की सहायता दी जाती है। योजना के तहत चलने वाले वाहनों को अधिकतम तीन वर्षों के लिए मासिक मोटर वाहन कर में भी छूट मिलती है। अब तक 107 बस ऑपरेटरों को कुल 5.77 करोड़ रुपये की वित्तीय सहायता दी जा चुकी है।
पारदर्शिता के लिए प्रत्येक बस में व्हीकल लोकेशन ट्रैकिंग डिवाइस (VLTD) लगाया गया है, जिसकी निगरानी परिवहन विभाग के कंट्रोल एंड कमांड सेंटर से की जाती है। एक पोर्टल के माध्यम से लाइव बस ट्रैकिंग, फेरों, मार्गों और ठहरावों की जानकारी मिलती है।
किराए में विशेष सामाजिक छूट
योजना में सामाजिक संवेदनशीलता का भी ध्यान रखा गया है। दिव्यांगजनों, एचआईवी पॉजिटिव व्यक्तियों और 80 वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों को एक सहायक (अटेंडेंट) के साथ किराए में 100 प्रतिशत की छूट दी गई है। इसके अलावा, कलेक्टर द्वारा प्रमाणित नक्सल प्रभावित व्यक्तियों को इस सेवा में यात्रा के दौरान 50 प्रतिशत की छूट दी जाती है।