हिमाचल प्रदेश में सेब की पैदावार और उसकी गुणवत्ता में सुधार के लिए न्यूजीलैंड तकनीकी सहयोग देने की तैयारी कर रहा है। कृषि विशेषज्ञों ने राज्य की औसत पैदावार और दुनिया के विकसित सेब उत्पादक क्षेत्रों के उत्पादन के बीच मौजूद भारी अंतर को देखते हुए इस सहयोग को जरूरी बताया है।
उत्पादन में बड़ा अंतर, पैदावार कई गुना बढ़ाने की गुंजाइश
'न्यूजीलैंड्स एप्पल एंड पीयर इंडस्ट्री' की मुख्य कार्यकारी अधिकारी डेनिएल एडसेट के अनुसार, वर्तमान में हिमाचल में सेब की औसत उत्पादकता केवल 5 से 6 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है। इसके विपरीत, न्यूजीलैंड में यह औसत लगभग 57 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर है और वहां के नए, आधुनिक बगीचों में पैदावार 80 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर तक पहुंच जाती है।
जमीनी हकीकत का जायजा लेने और बागवानों से बातचीत करने के लिए डेनिएल एडसेट ने अपने सहयोगी लाचलान मैके के साथ हाल ही में कोटगढ़ के सेब बागानों का दौरा किया। एडसेट ने बताया कि हिमाचल में पैदावार को 30 से 40 मीट्रिक टन प्रति हेक्टेयर तक ले जाने की पर्याप्त संभावनाएं हैं। इसके लिए क्लोनल रूटस्टॉक, बेहतर पौध सामग्री, बगीचों की बेहतर देखभाल, कीट व रोग प्रबंधन और प्रूनिंग (कटाई-छंटाई) जैसे कौशल को अपनाना होगा। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि हिमाचल का पहाड़ी क्षेत्र और मौसमी परिस्थितियां भी उन्नत क्षेत्रों की तुलना में उत्पादकता कम होने का एक कारण हैं।
एप्पल एक्शन प्लान और सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस का प्रस्ताव
इन चुनौतियों के समाधान के लिए न्यूजीलैंड ने भारत और न्यूजीलैंड के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) के तहत एक 'एप्पल एक्शन प्लान' का प्रस्ताव रखा है। इस योजना के तहत न्यूजीलैंड के विशेषज्ञ राज्य में उत्पादकता सुधारने, आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई-चेन) को मजबूत करने और भारतीय किसानों को उच्च मूल्य वाली अंतरराष्ट्रीय किस्में अपनाने में तकनीकी मदद देंगे। इसके अतिरिक्त, इस प्रस्ताव में हिमाचल प्रदेश में सेब और कीवी के लिए 'सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस' की स्थापना भी शामिल है।
किसानों के अध्ययन दौरे और स्टोन फ्रूट को शामिल करने की मांग
एचपीएमसी के पूर्व उपाध्यक्ष और सेब बागवान प्रकाश ठाकुर के अनुसार, यह प्रस्तावित सहयोग राज्य के सेब उद्योग में बड़ा योगदान दे सकता है। उन्होंने कहा कि इसमें किसानों की व्यापक भागीदारी होगी और उन्हें आधुनिक खेती की तकनीकों का प्रत्यक्ष अनुभव कराने के लिए न्यूजीलैंड के दौरे पर भी ले जाया जाएगा।
दूसरी तरफ, स्टोन फ्रूट ग्रोअर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष दीपक सिंघा ने इस तकनीकी सहायता कार्यक्रम में गुठलीदार फल उत्पादकों को भी शामिल करने की मांग उठाई है। उन्होंने कहा कि कई बागवानों ने स्टोन फ्रूट की खेती अपनाई है, इसलिए उन्हें भी इस परियोजना के माध्यम से आवश्यक सहयोग दिया जाना चाहिए।