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त्योहारों की मिठास में कल का कड़वा सच : चीनी के रास्ते में अनाज का मोड़, अगले साल फीकी न पड़ जाए चाय की चुस्की

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Umashankar Mishra Updated Sat, 10 Oct 2026 05:35 PM IST
सार

दिवाली पर चीनी की कोई किल्लत की आशंका नहीं है और भाव नरम रहने के आसार व्यक्त किए जा रहे हैं। जानकारों के मुताबिक, महंगाई का असली इम्तिहान अगले साल जून से अक्तूबर के दौरान देखने को मिल सकता है। इसलिए, तैयारी के लिए अगले छह महीने हैं। जानिए, विस्तार से...

दिवाली पर चीनी मीठी रहेगी, 2027 में कीमतें कड़वाहट घोलेंगी।
दिवाली पर चीनी मीठी रहेगी, 2027 में कीमतें कड़वाहट घोलेंगी। - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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भारत 2026-27 के चीनी सीजन में एक विरोधाभासी स्थिति के साथ दाखिल हुआ है। अक्तूबर में उपलब्धता भरपूर है, त्योहारी मांग भी सुरक्षित है और मिलों के स्तर के भाव दिवाली से पहले नरम पड़ने के आसार व्यक्त किए जा रहे हैं। पर, इस सुकून को हटाकर देखें तो हिसाब-किताब में चूक की गुंजाइश लगभग नहीं दिखाई देती। चीनी में महंगाई का ढांचागत खतरा वर्ष 2027 की समस्या है, दिवाली 2026 की नहीं, और तैयारी के लिए अगले छह महीने ही हाथ में हैं।

दिवाली पर चिंता का कारण नहीं
महाराष्ट्र के सेवानिवृत्त चीनी आयुक्त शेखर गायकवाड़ और आईएफजीई, पुणे के रीजनल डायरेक्टर (पश्चिम) दिलीप एस. पाटिल के एक विश्लेषण के मुताबिक, अक्तूबर में बाजार के पास करीब 33-34 लाख टन चीनी रहने का अनुमान है, जबकि त्योहारी महीने की खपत 24-25 लाख टन रह सकती है। मांग से 9-10 लाख टन ज्यादा चीनी मौजूद रहेगी, इसलिए घबराहट का कोई आधार नहीं है। सरकार और उद्योग को चाहिए कि इस स्थिति को स्पष्ट शब्दों में बताएं, ताकि अफवाहें जमाखोरी की वजह न बनें।

असली संकट कमजोर बफर
मौसम की मार से, खासकर महाराष्ट्र और उत्तरी कर्नाटक में, उत्पादन करीब 270 लाख टन रहने का अनुमान है, जो पिछले साल से लगभग 15 प्रतिशत कम है और बाजार की आम राय (290-310 लाख टन) से नीचे है। उत्तर प्रदेश सिंचाई के सहारे राष्ट्रीय आंकड़े को थामे हुए है। इस्मा का उपग्रह-आधारित अनुमान 285 लाख टन से नीचे आया तो बाजार का आकलन तेजी से बदलेगा।

घरेलू खपत 285-290 लाख टन के सामने 15-25 लाख टन का घाटा बनता है। अतिरिक्त आयात न हुआ तो सितंबर 2027 का अंतिम स्टॉक 5-15 लाख टन रह सकता है, जबकि दो-तीन महीने का भंडार सुरक्षित माना जाता है। पेराई में कोई भी बड़ा व्यवधान सीधे कीमतों में पड़ेगा। भाव पहले 40-42 रुपये किलो तक नरम होकर 45 रुपये के आसपास टिक सकते हैं और जून-अक्तूबर 2027 में 50 रुपये पार जा सकते हैं। ऐसे में, आयात का क्रम इस तरह तय होना चाहिए कि बाजार में घबराहट न फैले, और इस्मा का अनुमान आते ही नीति की समीक्षा हो।

इथेनॉल दोषी नहीं, पर संयम जरूरी
चीनी की कीमतों की उथल-पुथल का दोष इथेनॉल पर मढ़ना आंकड़ों से मेल नहीं खाता। इथेनॉल के लिए चीनी का डायवर्जन 35 लाख टन से घटकर करीब 30 लाख टन रह गया है और मिश्रण का लगभग 70 प्रतिशत अनाज-आधारित है। फिर भी कमी वाले साल में गन्ने का ईंधन की ओर मुड़ना न्यूनतम होना चाहिए। 

गन्ने के रस और बी-हैवी शीरे से डायवर्जन रोकने पर 25-30 लाख टन चीनी घरेलू खपत के लिए बच सकती है। ऐसे में, वर्ष 2026-27 का कार्यक्रम सी-हैवी शीरे, मक्का, चावल और खराब खाद्यान्न पर केंद्रित होने की आवश्यकता को समझा जा सकता है। यह सोचा-समझा कदम हो सकता है, जिसे खुलकर स्वीकारना बेहतर है।

अनाज का रास्ता मुफ्त नहीं
मक्का से इथेनॉल बनाने से महंगाई खत्म नहीं होती, बस उसकी जगह बदल जाती है। चीनी पर दबाव घटता है, पर वही दबाव मक्के और पशु-आहार पर आ जाता है।

देश में मक्का का उत्पादन करीब 550 लाख टन है। इथेनॉल के लिए 100 लाख टन से ज्यादा मक्का, यानी लगभग पांचवां हिस्सा, उपयोग में ली जाए तो पोल्ट्री, डेयरी और स्टार्च उद्योग को मक्का कम मिलेगा या महंगा मिलेगा। मक्का पशुओं के चारे का अहम हिस्सा है, इसलिए इसके दाम बढ़ने से अंडे, चिकन और दूध जैसे पशु-प्रोटीन उत्पाद भी महंगे हो सकते हैं।

अभी का हिसाब भी मक्के के पक्ष में झुका है। मक्का से इथेनॉल बनाने पर डिस्टिलरी को करीब 71.86 रुपये प्रति लीटर की प्रभावी कीमत मिलती है, जो सभी कच्चे माल में सबसे ज्यादा है। वहीं गन्ने के रस और बी-हैवी शीरे से इथेनॉल बनाना बढ़ती लागत के कारण कम फायदेमंद हो गया है। नतीजतन, डिस्टिलरियां मक्के की ओर झुकेंगी।

मूल्य-निर्धारण में सुधार होना चाहिए, ताकि गन्ना-आधारित डिस्टिलरी की क्षमता का उपयोग न घटे। देश को किसी एक कच्चे माल पर नहीं, संतुलित और विविध फीड पर निर्भर रहना चाहिए।

सर्दियों में मिलों की तंगी
गन्ना मूल्य (एफआरपी) 2026-27 के लिए 365 रुपये प्रति क्विंटल तय है, जबकि चीनी का न्यूनतम विक्रय मूल्य 2019 से 31 रुपये प्रति किलो पर अटका हुआ है। इस बीच गन्ना-लागत, मजदूरी और ऊर्जा बढ़ी हैं। मिल के स्तर पर 40-42 रुपये के भाव के बावजूद दिसंबर-फरवरी की चरम पेराई में गन्ना-भुगतान के समय मिलों की कार्यशील पूंजी खिंच सकती है। 

हाल के सीजन में 97 प्रतिशत से ज्यादा बकाया चुकाया गया है, पर इस बार नए साल में बकाया बढ़ने का जोखिम वास्तविक है। ऐसे में, चीनी के न्यूनतम विक्रय मूल्य की समीक्षा गंभीरता से होनी चाहिए। यह उद्योग को राहत देने के लिए नहीं, बल्कि समय पर गन्ना-भुगतान, स्थिर आपूर्ति और इथेनॉल व बायोऊर्जा निवेश की बुनियाद बचाने के लिए जरूरी समायोजन है।

आने वाले महीनों को घबराहट नहीं, तैयारी चाहिए। दिवाली की मांग सुरक्षित है, पर असली इम्तिहान सीजन के पिछले हिस्से में है: कमजोर फसल, 15-25 लाख टन का घाटा और सिमटता अंतिम स्टॉक। इथेनॉल के लिए डायवर्जन न्यूनतम रखना, आयात का सुविचारित क्रम और सर्दियों से पहले मिलों की आर्थिकी सुधारना ही तय करेंगे कि 2027 का भाव-जोखिम काबू में रहेगा या नहीं।
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