उर्वरक विभाग के अनुसार, दुनिया भर में सप्लाई सुधरने और अलग-अलग देशों से आयात के कारण यूरिया की कीमतों में भारी कमी आई है। बीते महीने यूरिया की कीमत करीब 60 प्रतिशत गिरकर 392 डॉलर प्रति टन पर आ गई है, जो मई 2026 में 947 डॉलर प्रति टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई थी। उर्वरक विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, सितंबर महीने में वैश्विक स्तर पर यूरिया की कीमतों में पिछले साल के मुकाबले 15 प्रतिशत से अधिक की गिरावट दर्ज की गई है।
यद्ध ने बिगाड़ा गणित, खाद सब्सिडी बजट के आकलन में जुटी सरकार
अमेरिका-ईरान तनाव के कारण दुनिया भर में खादों की कीमतों में काफी उतार-चढ़ाव देखा गया। सरकारी अधिकारियों के अनुसार, कीमतों में आई इस नरमी को देखते हुए सरकार वित्त वर्ष 2027 के लिए तय किए गए 1.84 लाख करोड़ रुपये के खाद सब्सिडी बजट का लगातार दोबारा आकलन कर रही है। खाद की आपूर्ति को सुरक्षित रखने के लिए सरकार ने ओमान, मलेशिया, वियतनाम, जॉर्जिया, नाइजीरिया, रूस, फिनलैंड, मिस्र, अल्जीरिया, तुर्की और नीदरलैंड जैसे कई देशों से यूरिया का आयात किया है।
सब्सिडी बिल में हजारों करोड़ का उछाल संभव
व्यापार पर नजर रखने वाले जानकारों का कहना है कि यूरिया सस्ता होने के बावजूद सरकार का कुल सब्सिडी खर्च वित्त वर्ष 2026 में हुए 2.17 लाख करोड़ रुपये के मुकाबले 15,000 से 25,000 करोड़ रुपये ज्यादा रह सकता है। ऐसा इसलिए है क्योंकि डीएपी, म्यूरेट ऑफ पोटाश और सल्फर का आयात महंगा हो गया है। लेकिन, यह खर्च उर्वरक विभाग के अप्रैल-मई के उस अनुमान से काफी कम है, जिसमें सप्लाई में भारी रुकावटों के कारण सब्सिडी बिल 3 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचने की आशंका जताई गई थी।
अधिकारियों के अनुसार, मार्च 2026 से खाद की कीमतें बढ़ने के कारण वित्त वर्ष 2026 में सब्सिडी पर कुल 2.17 लाख करोड़ रुपये का खर्च आया था, जो संशोधित अनुमान से 17 प्रतिशत अधिक था। इसमें से 1.42 लाख करोड़ यूरिया पर और 74,999 करोड़ अन्य पोषक तत्व वाली खादों पर खर्च किए गए थे।
जानकारों के हवाले से बताया जा रहा है कि पश्चिम एशिया संकट के चलते वित्त वर्ष 2027 की पहली छमाही में ही सरकार 1.14 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा की सब्सिडी दे चुकी है, जो शुरुआती बजट का 65 प्रतिशत है। इसमें से 87,316 करोड़ रुपये केवल यूरिया के आयात और घरेलू उत्पादन पर खर्च हुए हैं। पिछले वित्त वर्ष में देश में कुल 70 मीट्रिक टन खाद की खपत हुई थी, जिसमें यूरिया 40 मीट्रिक टन था। भारत ने 10 मीट्रिक टन यूरिया आयात किया था। यूरिया का घरेलू उत्पादन काफी हद तक आयातित कच्चे माल पर निर्भर करता है और खाड़ी संकट के बाद से एलएनजी (LNG) गैस की कीमतों में भी वृद्धि हुई है।
डीएपी और सल्फर की कीमतों में उछाल
सरकारी आंकड़ों के अनुसार, सितंबर में डीएपी की वैश्विक कीमतें 9 प्रतिशत बढ़कर 906 डॉलर प्रति टन हो गईं, जो अप्रैल 2026 में 853 डॉलर प्रति टन थीं। व्यापारिक सूत्रों के मुताबिक, पश्चिम एशिया संघर्ष के चलते ढुलाई महंगी होने से पिछले साल के मुकाबले डीएपी के दाम में 13 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है।
डीएपी और सिंगल सुपर फॉस्फेट बनाने में इस्तेमाल होने वाले सल्फर की कीमत भी पिछले साल की तुलना में 213 प्रतिशत बढ़कर 1030 डॉलर प्रति टन हो गई है। म्यूरेट ऑफ पोटाश की कीमत में भी पिछले साल के मुकाबले 9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है और यह 383 डॉलर प्रति टन पर पहुंच गई है। इन डीएपी और अन्य एनपीके (NPK) खादों को लाल सागर के रास्ते रूस, मोरक्को, मिस्र, अमेरिका, जॉर्डन, दक्षिण कोरिया, ट्यूनीशिया और सऊदी अरब से मंगाया जा रहा है।
किसानों के लिए खाद की कीमतों में कोई बदलाव नहीं
अंतरराष्ट्रीय बाजार में यूरिया के एक बैग की कीमत 4,000 रुपये से अधिक हो गई है, लेकिन किसानों के लिए यूरिया 266.50 रुपये प्रति 45 किलो की बोरी के भाव पर ही बिकता रहेगा। यह कीमत मार्च 2018 से नहीं बदली गई है। एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के अनुसार, वैश्विक स्तर पर कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव के बावजूद, सरकार ने किसानों के लिए डीएपी खाद की खुदरा कीमत भी 1,350 रुपये प्रति 50 किलो की बोरी पर बनाए रखी है।