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Study: रोजगार और पढ़ाई के लिए छोड़ रहे पहाड़, फिर भी गांव से नहीं टूट रहा हिमाचलियों का नाता

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Mon, 19 Oct 2026 02:44 PM IST
सार

  • हिमाचल प्रदेश के नौ गांवों के 486 परिवारों पर किया गया अध्ययन।

  • 40.68% लोगों ने रोजगार के अवसरों की कमी को पलायन की वजह बताया।

  • 38.64% लोगों ने शिक्षा को पलायन का प्रमुख कारण माना।

  • 74.55% लोग हर तीन से छह महीने में अपने गांव लौटते थे।

रोजगार और पढ़ाई के लिए छोड़ रहे पहाड़
रोजगार और पढ़ाई के लिए छोड़ रहे पहाड़ - फोटो : AI Image
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश के पहाड़ी गांवों से लोग बेहतर रोजगार और शिक्षा की तलाश में बाहर जा रहे हैं, लेकिन गांवों से उनका जुड़ाव बना हुआ है। नौ गांवों के 486 परिवारों पर किए गए एक अध्ययन में सामने आया कि पलायन करने वाले अधिकतर लोग समय-समय पर अपने गांव लौटते हैं। बाहर रहकर कमाई करने वाले कई लोग अपने परिवारों को पैसे भी भेजते हैं, जिनका इस्तेमाल घर के खर्च, खेती और बच्चों की पढ़ाई पर किया जाता है। यह शोध हाल ही में फ्रंटियर्स इन ह्यूमन डायनेमिक्स शोध पत्रिका में प्रकाशित हुआ है। इसमें हिमाचल प्रदेश के नौ जिलों के नौ गांवों में रहने वाले परिवारों की स्थिति का अध्ययन किया गया।

रोजगार और शिक्षा की कमी पलायन के प्रमुख कारण
शोधकर्ताओं ने नौ गांवों के 486 परिवारों के कुल 1,894 लोगों से जुटाई गई जानकारी का विश्लेषण किया। पलायन के कारणों पर जवाब देने वाले 440 लोगों में से 40.68 प्रतिशत ने रोजगार के अवसरों की कमी को प्रमुख वजह बताया। वहीं, 38.64 प्रतिशत लोगों ने शिक्षा को पलायन का मुख्य कारण माना।

अध्ययन में शिक्षा और पलायन के बीच भी संबंध सामने आया। शोध के अनुसार, उच्च शिक्षा प्राप्त लोगों में पलायन की संभावना कम पढ़े-लिखे लोगों की तुलना में 9.96 गुना दर्ज की गई। इससे संकेत मिलता है कि बेहतर नौकरी और शिक्षा के अवसरों की तलाश में लोग गांव छोड़कर दूसरी जगहों का रुख कर रहे हैं।शोधकर्ताओं के मुताबिक, गांवों में रोजगार के अवसर बढ़ाने और अच्छी शिक्षा की उपलब्धता बेहतर करने से पलायन के स्वरूप पर असर पड़ सकता है।

तीन से छह महीने में गांव लौट आते हैं लोग
अध्ययन में शामिल 440 लोगों के जवाबों के अनुसार, 74.55 प्रतिशत लोग हर तीन से छह महीने में अपने गांव लौटते थे। वहीं, 95 प्रतिशत लोग एक साल के भीतर गांव आए। अध्ययन में शामिल नौ गांवों में स्थायी पलायन का मामला दर्ज नहीं हुआ। हालांकि, ये निष्कर्ष केवल अध्ययन में शामिल गांवों पर लागू होते हैं। इनके आधार पर पूरे हिमाचल प्रदेश में पलायन की स्थिति का आकलन नहीं किया जा सकता।

अध्ययन के अनुसार, गांवों से बाहर जाने वाले 68.42 प्रतिशत लोग हिमाचल प्रदेश के भीतर ही दूसरी जगहों पर गए। वहीं, 26.81 प्रतिशत लोग राज्य से बाहर और 4.77 प्रतिशत विदेश गए। इनमें से 69.30 प्रतिशत लोग पर्वतीय क्षेत्रों और 30.70 प्रतिशत मैदानी या तराई वाले क्षेत्रों में गए।

परिवारों को हर महीने पैसे भेज रहे लोग
अध्ययन में पलायन के आर्थिक प्रभाव का भी आकलन किया गया। इसके मुताबिक, बाहर रहने वाले 36.59 प्रतिशत लोग अपने परिवारों को पैसे भेजते थे। शोध में एक गांव में औसतन हर महीने 1.41 लाख रुपये पहुंचने का अनुमान लगाया गया। परिवारों को भेजी जाने वाली औसत राशि 7,880 रुपये प्रतिमाह दर्ज की गई। 

गांव से बाहर कमाने गए लोगों की ओर से भेजी गई रकम का सबसे बड़ा हिस्सा घरेलू खर्च पर खर्च होता है। अध्ययन के अनुसार, कुल राशि का 36.65 प्रतिशत घर की जरूरतों, 24.22 प्रतिशत खेती-किसानी और 22.98 प्रतिशत शिक्षा पर लगाया जाता है। वहीं, 10.57 प्रतिशत रकम बचत और मकान संबंधी जरूरतों, 4.34 प्रतिशत स्वास्थ्य सेवाओं और 1.24 प्रतिशत कर्ज चुकाने में खर्च होती है। इससे परिवारों की आर्थिक जरूरतें पूरी करने में मदद मिलती है।

हिमाचल में पलायन अस्थायी, जड़ों से जुड़े रहते हैं लोग
समाजशास्त्री डॉ. मोहन झारटा के अनुसार, आम कहावत है कि पहाड़ की जवानी और पानी दूसरे क्षेत्रों के काम आते हैं, लेकिन हिमाचल प्रदेश में पलायन की स्थिति उत्तराखंड से अलग है। उनके मुताबिक, राज्य में स्वरोजगार के कई विकल्प मौजूद हैं। निचले क्षेत्रों में कृषि और ऊंचाई वाले इलाकों में बागवानी लोगों की आजीविका के साधन हैं। उनका मानना है कि हिमाचल में पलायन अधिकतर अस्थायी प्रकृति का है। लोग रोजगार या शिक्षा के लिए बाहर जाते हैं, लेकिन अपने गांव और परिवार से जुड़े रहते हैं।

 
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