तेलंगाना में जलाशयों का जलस्तर बेहद कम होने के कारण राज्य सरकार ने किसानों से रबी सीजन में धान की खेती नहीं करने की अपील की है। मुख्यमंत्री ए. रेवंत रेड्डी ने किसानों से कहा है कि वे गर्मी के मौसम में धान की बुवाई से बचें और कम पानी में तैयार होने वाली फसलों को प्राथमिकता दें। सरकार के मुताबिक, अल नीनो के संभावित प्रभाव के कारण अगले 9 से 10 महीनों तक राज्य में पानी की कमी बनी रह सकती है। ऐसे में धान की खेती करने से किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है और पीने के पानी का संकट भी बढ़ सकता है।
मुख्यमंत्री ने गुरुवार को जल उपलब्धता की समीक्षा के बाद कहा कि राज्य में पीने के पानी की जरूरत पूरी करना सरकार की प्राथमिकता है। यदि किसान पानी की कमी के बावजूद धान की बुवाई करते हैं, तो उन्हें फसल खराब होने से आर्थिक नुकसान हो सकता है। इससे पेयजल की उपलब्धता पर भी दबाव बढ़ेगा।
तेलंगाना उन चुनिंदा राज्यों में शामिल है, जहां गर्मी के मौसम में भी धान की खेती बड़े पैमाने पर होती है। राज्य में करीब 21 लाख एकड़ क्षेत्र में धान उगाया जाता है। यहां पैदा होने वाले धान का बड़ा हिस्सा उसना चावल बनाने में इस्तेमाल होता है। हालांकि, कांग्रेस सरकार की ओर से प्रति क्विंटल 500 रुपये बोनस देने की घोषणा के बाद किसान अधिक महीन चावल वाली किस्मों की खेती भी बढ़ाने लगे हैं।
किसान बोले- सिंचाई परियोजनाओं पर पहले ध्यान देती सरकार
सरकार की अपील पर किसानों ने सवाल उठाए हैं। तेलंगाना रायथु संघम के सचिव टी. सागर ने कहा कि यदि सरकार ने कालेश्वरम और पालमुरु-रंगा रेड्डी सिंचाई परियोजनाओं को फिर से चालू करने पर ध्यान दिया होता, तो राज्य के कई हिस्सों में इस सीजन में पानी की बेहतर उपलब्धता हो सकती थी।
उन्होंने कहा कि एक तरफ बाजार में चावल की मांग अधिक है, वहीं दूसरी तरफ किसानों को धान नहीं उगाने की सलाह दी जा रही है। उनके मुताबिक, उत्तर भारत के खुदरा बाजारों में चावल की कीमत 80 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गई है। यदि इस सीजन में धान की खेती कम होती है, तो आने वाले महीनों में कीमतें और बढ़ सकती हैं।
सरकार ने दलहन की खेती करने की दी सलाह
राज्य के कृषि मंत्री टी. नागेश्वर राव ने किसानों को धान की जगह दलहन की खेती करने की सलाह दी है। दलहन की फसलों में आमतौर पर धान की तुलना में कम पानी की जरूरत होती है। सरकार का मानना है कि इससे कम जल उपलब्धता के बीच खेती जारी रखने में मदद मिल सकती है। वहीं, विपक्षी भारत राष्ट्र समिति (बीआरएस) ने खरीफ फसल के महत्वपूर्ण चरण में किसानों को गुणवत्तापूर्ण बिजली उपलब्ध नहीं करा पाने के लिए राज्य सरकार की आलोचना की है।
जलाशयों में पानी का भंडार घटा
मुख्यमंत्री के अनुसार, कृष्णा नदी बेसिन में पिछले साल की इसी अवधि के मुकाबले पानी की उपलब्धता 72 फीसदी कम है। आमतौर पर इस समय राज्य के सभी जलाशयों में कुल 462 टीएमसी पानी उपलब्ध रहता था, लेकिन इस साल यह घटकर करीब 200 टीएमसी रह गया है।
राज्य सरकार के मुताबिक, अक्टूबर में बिजली की मांग भी बढ़कर 20,000 मेगावाट हो गई, जबकि पिछले साल इसी महीने यह करीब 15,000 मेगावाट थी।
पानी की कमी और बढ़ती बिजली मांग के बीच सरकार किसानों को कम पानी वाली फसलों की ओर ले जाना चाहती है। हालांकि, किसानों का कहना है कि फसल चयन को लेकर सलाह देने के साथ-साथ सरकार को सिंचाई परियोजनाओं और पानी के बेहतर प्रबंधन पर भी ध्यान देना चाहिए।
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