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बदलते मौसम में टिकाऊ खेती का मंत्र : CSE की नई रिपोर्ट ने दिखाई हरित भविष्य की राह

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Mon, 27 Oct 2025 06:12 PM IST
सार

दुनिया में वर्ष 2018 में कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 11 प्रतिशत हिस्सा खाद्य उत्पादन प्रणालियों- यानी कृषि, पशुधन पालन और कीटनाशकों के उपयोग से आया था। वहीं, विडंबना यह है कि यही किसान और पशुपालक जलवायु परिवर्तन के सबसे पहले और सबसे गंभीर शिकार भी हैं।

CSE की नई रिपोर्ट ने दिखाई हरित भविष्य की राह
CSE की नई रिपोर्ट ने दिखाई हरित भविष्य की राह - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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जलवायु परिवर्तन की मार झेल रहे कृषि क्षेत्र के लिए सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (CSE) ने एक नई राह दिखाई है। राजस्थान के निमली में आयोजित राष्ट्रीय सम्मेलन में सीएसई ने अपनी नई रिपोर्ट ‘सस्टेनेबल फूड सिस्टम्स: एन एजेंडा फॉर क्लाइमेट-रिस्क्ड टाइम्स’ जारी करते हुए यह बताया कि कैसे भारत की खेती को जलवायु-सहनशील और टिकाऊ बनाया जा सकता है। तीन दिवसीय सम्मेलन (27-29 अक्टूबर) कृषि, खाद्य सुरक्षा और जलवायु सहनशीलता पर केंद्रित है, जिसमें देशभर के विशेषज्ञ और नीति-निर्माता शामिल हुए हैं।

रिपोर्ट में न सिर्फ कृषि उत्सर्जन को कम करने की रूपरेखा दी गई है, बल्कि यह भी बताया गया है कि किसान और उपभोक्ता दोनों मिलकर कैसे जलवायु संकट के बीच एक स्वस्थ व संतुलित खाद्य प्रणाली की दिशा में कदम बढ़ा सकते हैं। कार्यक्रम में सीएसई की महानिदेशक सुनीता नारायण ने कहा, “जब हम जलवायु परिवर्तन और उत्सर्जन की बात करते हैं, तो आमतौर पर जीवाश्म ईंधन पर चर्चा होती है, लेकिन हम उस ‘दूसरे हाथी’ को नजरअंदाज कर देते हैं- यानी हमारी कृषि और हमारा भोजन।”

सीएसई की दो नई रिपोर्ट्स हुईं जारी

  1. Sustainable Food Systems: An Agenda for Climate-risked Times- यह रिपोर्ट बताती है कि किस तरह से हम अपने खाद्य उत्पादन, वितरण और उपभोग प्रणाली को जलवायु-सुरक्षित और टिकाऊ बना सकते हैं।
  2. Missing from the Plate: Edible Plants in Wetlands Lose Favour- यह रिपोर्ट भारत के आर्द्रभूमि क्षेत्रों में पाए जाने वाले खाने योग्य पौधों का दस्तावेज है, जो पोषण और जलवायु सहनशीलता दोनों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
इस अवसर पर अजय वीर जाखड़ (भारत कृषक समाज), डॉ. जी.वी. रामंजनयुलु (सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर, हैदराबाद), सुधीर कुमार गोयल (पूर्व अतिरिक्त मुख्य सचिव, कृषि, महाराष्ट्र), अपूर्व ओझा (आगा खान फाउंडेशन) और डॉ. सुल्तान इस्माइल (ईकोसाइंस रिसर्च फाउंडेशन, चेन्नई) ने विचार रखे।

जलवायु परिवर्तन और भारतीय कृषि पर प्रभाव

सीएसई की रिपोर्ट के अनुसार,  यदि अनुकूलन कदम नहीं उठाए गए, तो साल 2050 तक वर्षा आधारित धान की पैदावार में 20% और 2080 तक 47% की कमी आ सकती है। सिंचित धान की पैदावार में क्रमशः 3.5% (2050) और 5% (2080) की गिरावट अनुमानित है। देश के 573 ग्रामीण जिलों में से 90% जिले जलवायु जोखिम के घेरे में हैं। बढ़ते तापमान से कीट और रोगों का प्रकोप बढ़ रहा है, जिससे फसल उत्पादकता प्रभावित हो रही है। अनियमित मानसून के कारण जल संकट की समस्या गहराती जा रही है। 

CSE की रिपोर्ट जिस एग्रीकल्चर मॉडल की वकालत करती है, वह चार मुख्य उपायों की सलाह देता है-

  1. कृषि को कम इनपुट आधारित बनाना : मिट्टी का स्वास्थ्य बनाए रखें, सिंचाई और जैविक विकल्पों को बढ़ावा दें, रासायनिक कीटनाशकों के प्रयोग को घटाएं।
  2. जोखिम कम करने के लिए विविधता अपनाना : बहुफसली खेती और पशुधन आधारित अर्थव्यवस्था को प्रोत्साहित करें, ताकि किसान को कई आय स्रोत मिल सकें।
  3. स्थानीय और पोषक फसलों को बढ़ावा देना : सरकार को ऐसी नीतियां लानी चाहिए जो जल-संकट वाले इलाकों में बाजरा जैसे फसलों को बढ़ावा दें, जो कम पानी में भी उत्पादन दे सकें।
  4. भोजन की आदतों में परिवर्तन : उपभोक्ता के खाने की पसंद किसान के उत्पादन को तय करती है। यदि लोग पौष्टिक और जलवायु-अनुकूल आहार अपनाएंगे, तो किसान भी वैसी फसलें उगाएंगे।
इस बीच सुनीता नारायण ने कहा, “भोजन और जलवायु का रिश्ता शाकाहार या जैविक भोजन तक सीमित नहीं है। यह इस बात पर निर्भर करता है कि भोजन कैसे उगाया जाता है, हम क्या खाते हैं और कितना खाते हैं।”
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