जॉर्ज मेसन यूनिवर्सिटी के सहायक प्रोफेसर डैनियल डब्ल्यू स्मिथ, काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर के फेलो नितिन बस्सी और पेयजल एवं स्वच्छता विभाग के पूर्व सचिव परमेश्वरन अय्यर ने एक नया अध्ययन लिखा है। यह अध्ययन गुजरात में 2001 से शुरू हुई 25 साल की जल शासन यात्रा पर आधारित है। उस समय गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी थे और राज्य पानी की कमी से जूझ रहा था। अध्ययन में नर्मदा आधारित जल ग्रिड और वासमो जैसी संस्थाओं का जिक्र है।
2016 में सूखा प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों से हुई बैठकें
राष्ट्रीय स्तर पर भी इसका असर देखा गया। अय्यर ने कहा कि प्रधानमंत्री मोदी ने 2016 में सूखा प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ 10 अलग-अलग बैठकें की थीं। इनमें महाराष्ट्र भी शामिल था। अय्यर के अनुसार, गुजरात में मुख्यमंत्री मोदी द्वारा उठाए गए कई कदम महाराष्ट्र की स्थिति के अनुसार लागू किए जा सकते हैं।
स्थानीय जल संरक्षण से लेकर नदी बेसिन प्रबंधन तक पर जोर
उन्होंने याद दिलाया कि जब वे मंत्रालय में सचिव बने तो देश में सूखे का सबसे बुरा दौर था। प्रधानमंत्री ने मुख्यमंत्रियों से सूखे से निपटने के तरीकों पर विस्तार से चर्चा की। सूखे से निपटने के उपायों में स्थानीय स्तर पर जल संरक्षण, नदी बेसिन प्रबंधन और अपशिष्ट जल का प्रबंधन शामिल है।
संसाधनों और अपशिष्ट जल का सही प्रबंधन जरूरी
अय्यर ने कहा कि हर राज्य के पास नर्मदा जैसी स्थिति नहीं होती, लेकिन संसाधन और अपशिष्ट जल दोनों का सही प्रबंधन जरूरी है। कुछ उपाय अल्पकालिक हैं, कुछ मध्यम और कुछ दीर्घकालिक। इन्हें साथ में ही लागू करना होगा।
उनके अनुसार पानी का 85 से 90 प्रतिशत हिस्सा कृषि क्षेत्र में इस्तेमाल होता है। फसलों में कम या ज्यादा पानी वाली किस्मों का चुनाव और किसानों का व्यवहार बदलना भी इसमें शामिल है। किसान तभी बदलाव करेगा जब उसकी आमदनी बेहतर हो। अय्यर ने कहा कि महाराष्ट्र सरकार इस पर काम कर रही है और गुजरात के सबक मददगार हो सकते हैं।
महाराष्ट्र के 265 से ज्यादा तालुकों में सूखा
इस साल महाराष्ट्र के कई तालुकों में सूखा पड़ा है। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने बुधवार को नई दिल्ली में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह से मुलाकात की और राष्ट्रीय आपदा प्रतिक्रिया कोष से अधिकतम सहायता मांगी। फडणवीस ने एक्स पर लिखा कि 265 से ज्यादा तालुकों में सूखा घोषित किया गया है और राहत उपाय शुरू हैं। उन्होंने शाह को राज्य सरकार के कदमों और प्रभावित इलाकों की स्थिति की जानकारी दी।
यमुना सफाई में समय और बेहतर ढांचे की जरूरत
यमुना सफाई पर पूछे जाने पर अध्ययन के लेखक नितिन बस्सी ने कहा कि शहरी इलाके से गुजरने वाली नदी की सफाई में समय लगता है क्योंकि शहर बढ़ रहे हैं और ढांचा साथ चलाना पड़ता है। दिल्ली में ओखला सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट एशिया के सबसे बड़े प्लांटों में से एक है। इस्तेमाल किए गए पानी को फिर से इस्तेमाल करने से नदी में गंदा पानी कम जाएगा। गंगा से जुड़े शहरों में भी ऐसा काम हो रहा है।