महाराष्ट्र में सूखे की मार ने कई खरीफ फसलों (Kharif Season) की उपलब्धता को लेकर चिंता खड़ी कर दी है। यह चिंता मात्र महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर राष्ट्रीय बाजार और फसलों की कीमतों पर पड़ सकता है। बता दें कि महाराष्ट्र सरकार ने 358 में से 265 तहसीलों में सूखे का एलान कर दिया है। जानकारों का तर्क है कि महाराष्ट्र कई फसलों के राष्ट्रीय उत्पादन में अहम भूमिका रखता है। ऐसे में कम उपज राष्ट्रीय स्तर पर अपना प्रभाव डालेगी।
गन्ना, सोयाबीन, कपास और दलहन पर असर की आशंका
जानकारों का कहना है कि प्रदेश में गन्ना, सोयाबीन, कपास और तुअर-उड़द जैसी दलहन फसलों का उत्पादन घट सकता है। आमतौर पर महाराष्ट्र देश के गन्ना उत्पादन में करीब 35 प्रतिशत का हिस्सा रखता है। हालांकि इस खरीफ जानकार गन्ने के हिस्से में गिरावट की संभावना जता रहे हैं। गन्ने के अलावा सोयाबीन और कपास जैसी प्रमुख फसलों का उत्पदान गिरान घरेलू मिलों और पशु चारा उद्योग को विदेशी कच्चे माल पर और निर्भर बना सकता है।
दिसंबर के बाद दिख सकता है कीमतों पर दबाव
जानकारों का कहना है कि अक्तूबर और नवंबर में फसल की कटाई और मंडी में बिक्री के चरण में कीमतों पर एक साथ असर देखने को न मिले, लेकिन कटाई-बिक्री का चरण खत्म होने के दो से तीन महीने बाद कम उपलब्धता ज्यादा साफतौर पर दिखाई देगी और कीमतों पर दबाव इस दौरान बढ़ सकता है।
दलहन-कपास से लेकर खाद्य तेल के आयात में उछाल के आसार
दलहन-कपास और खाद्य तेल की घरेलू स्तर पर कमी को आयात से पाटा जा सकता है। सरकार ने दलहन के लिए आयात नीति मार्च 2027 तक खुली रखी है। तिलहन उत्पादन कमजोर रहने पर खाद्य तेलों का आयात भी बढ़ने की उम्मीद उन्होंने जताई गई है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में महाराष्ट्र ने 73.73 लाख गांठ कपास का उत्पादन किया, जो देश के कुल 297.24 लाख गांठ उत्पादन का करीब 25 प्रतिशत था। वहीं, राज्य का गन्ना उत्पादन 2025-26 में 1,316.49 लाख टन रहा, जबकि एक साल पहले यह 1,099.70 लाख टन था। महाराष्ट्र देश के प्रमुख सोयाबीन और दलहन उत्पादक राज्यों में भी शामिल है। प्याज का उत्पादन मुख्य रूप से महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश और गुजरात में होता है।
प्याज, चीनी और इथेनॉल पर भी असर की चिंता
बाजार जानकारों का कहना है कि महाराष्ट्र में सूखा फसलों के साथ उनसे जुड़े कारखानों और सप्लाई चेन पर भी असर डाल सकता है। दूसरी तरफ महाराष्ट्र का प्याज उत्पादन प्रभावित होने से कीमतों में बढ़ोतरी हो सकती है। इस मोर्चे पर प्याज की सीमित भंडारण क्षमता एक चुनौती है। गन्ने की पैदावार में कमी चीनी से इथेनॉल उत्पादन तक खराब असर डाल सकता है। इसी तरह, मक्का उत्पादन में कमी से पोल्ट्री फीड और इथेनॉल क्षेत्र प्रभावित हो सकते हैं। सोयाबीन और दलहन का उत्पादन घटने से महंगाई, आयात बिल और व्यापार घाटे पर दबाव बढ़ने की आशंका उन्होंने जताई।
जरूरत के आधार पर आयात की तैयारी करने की सलाह
जानकार सरकार को फसल पैदावार में कमी की संभावना का आकलन कर जरूरत पड़ने पर आयात की तैयारी पहले से करने की सलाह दी है। उन्होंने अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत बढ़ने के जोखिम से बचने के लिए आवश्यक जिंसों की खरीद में हेजिंग जैसे विकल्पों पर विचार करने की भी बात कही। विशेषज्ञों ने अगले फसल सीजन पर भी मौसम संबंधी दबाव बने रहने की आशंका जताई। उनके अनुसार, महाराष्ट्र में सूखे के व्यापक आर्थिक असर को सीमित करने के लिए समय पर सरकारी हस्तक्षेप, आकस्मिक बीज योजना, आपूर्ति की निगरानी और आवश्यक जिंसों की पहले से खरीद पर ध्यान देना जरूरी होगा।