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Pulses: महंगाई पर लगाम की तैयारी, दलहन फसलों के उत्पादन पर काले बादल, दालों पर आयात शुल्क घटा सकती है सरकार

गांव जंक्शन डेस्क, चंडीगढ़ Published by: Devesh Saraswat Updated Thu, 01 Oct 2026 05:53 PM IST
सार

  • अनियमित मानसूनी बारिश से इस साल दालों के उत्पादन में कमी की चिंता बढ़ी है।
  • महंगाई और आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकार आयात शुल्क घटाने पर विचार कर रही है।
  • मसूर और पीली मटर पर शुल्क में कटौती की संभावना है, जबकि चना बाहर रह सकता है।
  • अरहर और उड़द का शुल्क-मुक्त आयात मार्च 2027 तक पहले से जारी है।
  • त्योहारी सीजन में दालों की बढ़ती मांग से कीमतों पर दबाव बढ़ने की आशंका है।

दालों के आयात शुल्क में कटौती पर विचार कर रही है सरकार।
दालों के आयात शुल्क में कटौती पर विचार कर रही है सरकार। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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इस खरीफ प्रमुख उत्पादक राज्यों में कम मानसूनी बारिश ने दलहन उत्पादन में गिरावट की संभावना को जन्म दिया है। दो सरकारी और उद्योग जगत के हवाले से सामने आया है कि खाद्य महंगाई पर लगाम लगाने और बाजार में सप्लाई बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार दालों के आयात शुल्क में कटौती पर विचार कर रही है।

मसूर और पीली मटर पर मिल सकती है राहत, चना रहेगा बाहर
मीडिया रिपोर्ट में उद्योग जगत के सूत्र का हवाला देते हुए बताया गया कि आयात शुल्क में यह कटौती केवल मसूर और पीली मटर तक ही सीमित हो सकती है, जबकि चने को इससे बाहर रखा जा सकता है। मौजूदा समय में भारत सरकार लाल मसूर और चने के आयात पर 10 प्रतिशत, जबकि पीली मटर पर 30 प्रतिशत का आयात शुल्क वसूलती है। इसके अलावा, सरकार ने पहले ही अरहर (तुअर) और उड़द दाल को चालू वित्त वर्ष के अंत यानी मार्च 2027 तक बिना किसी शुल्क के आयात करने की अनुमति दे रखी है।

कम बारिश से उत्पादन पर पड़ेगा सीधा असर
दालों की खेती मुख्य रूप से उन इलाकों में होती है जो पूरी तरह से बारिश पर निर्भर होते हैं। इस साल जून से सितंबर के मानसून सीजन में दालों का उत्पादन करने वाले प्रमुख राज्यों में औसत से 30 प्रतिशत तक कम बारिश हुई है। ऐसे में इस साल दालों के कुल उत्पादन में भारी कमी आने की आशंका है।

अक्टूबर महीने से किसान चने की बुआई शुरू कर देते हैं। जानकारों का मानना है कि किसानों को चने की अधिक खेती करने के लिए प्रोत्साहित करने के मकसद से सरकार चने पर आयात शुल्क बरकरार रख सकती है।

दुनिया का सबसे बड़ा उपभोक्ता और आयातक है भारत
भारत दुनिया में दालों का सबसे बड़ा उत्पादक, उपभोक्ता और आयातक देश है। घरेलू पैदावार और बाजार की मांग के बीच के अंतर को पाटने के लिए देश आयात पर काफी निर्भर है। आंकड़ों के अनुसार, साल 2024-25 में देश की कुल खपत का लगभग 23 प्रतिशत हिस्सा आयात से पूरा किया गया था। इस दौरान देश में 2.57 करोड़ (25.7 मिलियन) टन दालों का उत्पादन हुआ था, जबकि 73 लाख (7.3 मिलियन) टन दालें बाहर से मंगाई गई थीं। भारत को दालों की आपूर्ति करने वाले प्रमुख देशों में ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, रूस, म्यांमार और कई अफ्रीकी देश शामिल हैं।

त्योहारी सीजन में मांग और महंगाई का बढ़ता दबाव
भारत में त्योहारी सीजन के दौरान दालों, खासतौर स चने की मांग काफी बढ़ जाती है। आंकड़ों के अनुसार, दिसंबर से देश में खाद्य महंगाई दर लगातार बढ़ रही है और यह अगस्त में 5.95 प्रतिशत पर पहुंच गई। दालों की कीमतें भी लगातार ऊंची बनी हुई हैं। पिछले साल के मुकाबले अरहर की महंगाई दर 5.6 प्रतिशत और उड़द की महंगाई दर 7.4 प्रतिशत दर्ज की गई है।

महंगाई को काबू में करने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार इससे पहले खाने वाले वनस्पति तेलों पर आयात शुल्क घटाने और चीनी के निर्यात (विदेशों में बिक्री) में बदलाव करने जैसे कदम उठा चुकी है।


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