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PULSES: सीएसीपी की पीली मटर के आयात पर बैन और अन्य दालों पर आयात शुल्क बढ़ाने की सिफारिश, ये सुझाव भी शामिल

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Saraswat Updated Thu, 29 May 2025 10:25 AM IST
सार

वर्तमान में भारत दालों की खपत पूरी करने के लिए आयात पर निर्भर है। दालों के आयात से कई चुनौती भी सामने आती हैं। सस्ती आयातित दालें घरेलू कीमतों पर असर डालती हैं, जिससे किसान की आय पर भी प्रभाव पड़ता है। इस कारण कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने पीली मटर के आयात पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है।
 

सीएसीपी की पीली मटर के आयात पर बैन की सिफारिश
सीएसीपी की पीली मटर के आयात पर बैन की सिफारिश - फोटो : प्रतीकात्मक
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विस्तार
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वर्तमान में भारत दालों की खपत पूरी करने के लिए आयात पर निर्भर है। दालों के आयात से कई चुनौती भी सामने आती हैं। सस्ती आयातित दालें घरेलू कीमतों पर असर डालती हैं, जिससे किसान की आय पर भी प्रभाव पड़ता है। इस कारण कृषि लागत और मूल्य आयोग (सीएसीपी) ने पीली मटर के आयात पर प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है।

दालों पर आयात शुल्क में हो बढ़ोतरी 
आयोग की सिफारिश में किसानों को उपज का बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने के लिए खरीफ विपणन सत्र 2025-26 के लिए अपनी गैर-मूल्य नीति सिफारिशों के हिस्से के रूप में अरहर, मसूर और उड़द जैसी दालों पर आयात शुल्क बढ़ाना भी शामिल किया है।

एक सिफारिश को मिली मंजूरी 
सीएसीपी में खरीफ विपणन सत्र 2025-26 के लिए विभिन्न खरीफ फसलों की एमएसपी में 1 से 13.9 प्रतिशत की बढ़ोतरी की सिफारिश की है, जिसे बुधवार को सरकार ने मंजूरी दे दी।

दलहन-तिलहन का लाभकारी मूल्य आत्मनिर्भरता के लिए जरूरी 
सीएसीपी के अनुसार, किसानों को उपज का लाभकारी मूल्य सुनिश्चित करना दालों और खाद्य तेलों में आत्मनिर्भरता हासिल करने के जरूरी रास्तों में से एक है। वहीं, किसान समर्थक व्यापार नीति तंत्र किसानों को बेहतर मूल्य सुनिश्चित करने में मदद करेगा।

खरीफ विपणन सत्र 2024-25 का उदाहरण 
सीएसीपी के अनुसार, कम और बिना आयात शुल्क पर दालों और खाद्य तेलों के बिना रोक-टोक और सस्ते आयात के कारण खरीफ विपणन सत्र 2024-25 के  दौरान सोयाबीन, मूंगफली, उड़द, मूंग और तुअर की घरेलू कीमतें एमएसपी से नीचे आ गई हैं। 

सीएसीपी का सुझाव 
सीएसीपी का कहना है कि दलहन-तिलहन फसलों की एमएसपी को आयात शुल्क की बनावट की सीध में लाने से किसानों को लाभकारी मूल्य सुनिश्चित होगा और उन्हें तिलहन और दलहनों के रकबे और उत्पादन को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा। आयोग की सिफारिश है कि पीली मटर के आयात पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए और अन्य दालों, विशेष रूप से, तुअर/अरहर, मसूर और उड़द पर आयात शुल्क बढ़ाया जाना चाहिए।

भारत में दालों के शुल्क मुक्त आयत की जानकरी  
घरेलू फसल में कमी के कारण दालों की आपूर्ति बढ़ाने के लिए सरकार ने दिसंबर 2023 में पीली मटर के आयात को खोल दिया था। दिसंबर 2023 से अप्रैल 2025 तक भारत ने 33 लाख टन से अधिक पीली मटर का आयात किया है। पीली मटर का शुल्क मुक्त आयात 31 मई, 2025 तक खुला है। इसके आलावा सरकार ने घरेलू आपूर्ति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से तुअर और उड़द जैसी दूसरी दालों के शुल्क मुक्त आयात की भी अनुमति दी थी। तुअर और उड़द के शुल्क मुक्त आयात की अनुमति मार्च 2026 तक है।

पीली मटर ने दूसरी दालों का बाजार बिगाड़ा 
पीली मटर को चना दाल का विकल्प माना जाता है। लेकिन फर्क यह है कि देश में बड़े पैमाने पर खपत की जाने वाली चना दाल से पीली मटर सस्ती है। उद्योग  के अनुसार, सस्ती पीली मटर के भारी आयात से दूसरी दालों की मांग प्रभावित हो रही है।

सीएसीपी की सिफारिश नई नहीं है 
हाल ही में व्यापार निकाय द इंडिया पल्सेस एंड ग्रेन्स एसोसिएशन ने मांग की कि सरकार पीली मटर के आयात पर अंकुश लगाने के लिए 50 प्रतिशत का शुल्क लगाए। 2024-25 के दौरान देश का दालों का आयात 68 लाख टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया, इस आयात की कीमत 5.4 बिलियन डॉलर है। 

विविधीकरण का सुझाव 
सीएसीपी ने दलहन-तिलहन फसलों के उत्पादन को बढ़ावा देने के लिए एक व्यापक विविधीकरण की तैयारी का सुझाव दिया है। आयोग के अनुसार, देश में कई कृषि उत्पादों की घरेलू उत्पादन और मांग के बीच बढ़ते असंतुलन और धान-गेहूं की फसल से जुड़ी स्थिरता की चुनौतियों के साथ, विशेष रूप से उत्तर-पश्चिमी भारत-गंगा के मैदानों में, आत्मनिर्भरता हासिल करने और इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए दलहन- तिलहन फसलों  के लिए एक रणनीतिक बदलाव आवश्यक हो गया है।

आयोग के अनुसार, बीते कुछ सालों में आयोग ने किसानों को फसल विकल्पों में विविधता लाने और आधुनिक तकनीक अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए दलहन, तिलहन और श्री अन्न के पक्ष में मूल्य प्रोत्साहन को फिर से संगठित करने की कोशिश की है, लेकिन इन फसलों की उपज का स्तर इतना कम है कि उनकी तुलनात्मक लाभप्रदता प्रतिस्पर्धी फसलों से काफी कम है। इसलिए, आयोग की सिफारिश है कि तकनीकी नवाचारों और दलहन और तिलहन किसानों के लिए लाभकारी कीमतों पर विशेष ध्यान देने के साथ एक व्यापक विविधीकरण रणनीति और कार्य योजना तैयार की जानी चाहिए।
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