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बारिश की हर बूंद बचाने की तैयारी: मिट्टी-पानी से बनेंगी खेती की योजनाएं, ड्रोन-सैटेलाइट से होगी निगरानी

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Thu, 05 Nov 2026 01:14 PM IST
सार

  • वाटरशेड विकास के लिए नई राष्ट्रीय तकनीकी गाइडलाइन तैयार की जा रही है।

  • राज्यों को स्थानीय जरूरतों के अनुसार योजनाएं लागू करने की छूट देने पर जोर।

  • मिट्टी और पानी के आंकड़ों से तैयार होंगी जल संरक्षण की योजनाएं।

  • ड्रोन, सैटेलाइट और GIS तकनीक का होगा इस्तेमाल।

वाटरशेड विकास के लिए नई राष्ट्रीय तकनीकी गाइडलाइन तैयार की जा रही है।
वाटरशेड विकास के लिए नई राष्ट्रीय तकनीकी गाइडलाइन तैयार की जा रही है। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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देश में जल संरक्षण और वाटरशेड (जलागम क्षेत्र) विकास की योजनाओं को अधिक प्रभावी बनाने के लिए वैज्ञानिक तकनीक के साथ किसानों और ग्रामीण समुदायों की भागीदारी बढ़ाने पर जोर दिया गया है। इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर नई तकनीकी गाइडलाइन तैयार की जा रही है। इन गाइडलाइन में मिट्टी और पानी के संरक्षण, बारिश के पानी का बेहतर इस्तेमाल, आधुनिक तकनीक और स्थानीय जरूरतों के अनुसार योजनाएं लागू करने का खाका तैयार किया जाएगा।

इस संबंध में भूमि संसाधन विभाग (DoLR), राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण (NRAA) और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि उपयोग नियोजन ब्यूरो (ICAR-NBSS&LUP) ने 4 और 5 नवंबर को नागपुर में दो दिवसीय राष्ट्रीय बैठक आयोजित की। इसमें केंद्र और राज्य सरकारों के अधिकारियों, कृषि वैज्ञानिकों, विश्व बैंक और विभिन्न संस्थानों के प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया।

बैठक में भूमि संसाधन विभाग के सचिव दिलीप कुमार ने कहा कि वाटरशेड विकास की तकनीकी गाइडलाइन ऐसी होनी चाहिए, जिन्हें जमीन पर आसानी से लागू किया जा सके। राज्यों पर बहुत सख्त नियम थोपने के बजाय उन्हें अपनी जरूरतों और संसाधनों के हिसाब से काम करने की छूट मिलनी चाहिए। हालांकि, कुछ जरूरी मानकों का पालन सभी राज्यों को करना होगा।

उन्होंने कहा कि जल संरक्षण से जुड़ी योजनाओं का लाभ सीधे किसानों और ग्रामीण समुदायों तक पहुंचना चाहिए। इसके लिए केवल तकनीकी योजनाएं बनाना काफी नहीं है, बल्कि उनका जमीन पर सही तरीके से लागू होना भी जरूरी है। उन्होंने राज्यों से योजनाओं के लिए आवंटित बजट का समय पर और बेहतर इस्तेमाल करने की अपील की।

मिट्टी-पानी की जानकारी से तैयार होंगी योजनाएं
राष्ट्रीय वर्षा आधारित क्षेत्र प्राधिकरण के सीईओ डॉ. चंद्रशेखर कुमार ने कहा कि वाटरशेड विकास की बेहतर योजना बनाने के लिए मिट्टी, पानी और जमीन से जुड़े आंकड़ों की उपलब्धता जरूरी है। उन्होंने राज्यों में पहले से मौजूद वैज्ञानिक आंकड़ों और पुराने सर्वे का इस्तेमाल करने पर जोर दिया। साथ ही ओडिशा और कर्नाटक में विकसित प्रणालियों के अच्छे पहलुओं को शामिल करते हुए राष्ट्रीय स्तर पर एक डिजिटल निर्णय सहायता प्रणाली (Decision Support System) तैयार करने की बात कही।

भूमि संसाधन विभाग के संयुक्त सचिव नितिन खाड़े ने कहा कि भूमि संसाधन सूची (Land Resource Inventory-LRI), डिजिटल मिट्टी के आंकड़े और आधुनिक तकनीक से गांवों में जल संरक्षण की योजनाओं को बेहतर बनाया जा सकता है। इससे किसान और ग्राम पंचायतें मिट्टी और पानी की स्थिति के आधार पर फसल का चुनाव, पोषक तत्वों का इस्तेमाल और जल संरक्षण से जुड़े फैसले ले सकेंगी।

ड्रोन और सैटेलाइट तकनीक का होगा इस्तेमाल
बैठक में वाटरशेड विकास के लिए जीआईएस, रिमोट सेंसिंग, हाई रिजॉल्यूशन सैटेलाइट तस्वीरों और ड्रोन तकनीक के इस्तेमाल पर भी चर्चा हुई। अधिकारियों ने कहा कि इन तकनीकों का उपयोग स्थानीय जरूरत और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार किया जाना चाहिए।

नितिन खाड़े ने बताया कि वाटरशेड विकास कार्यक्रम के तहत परियोजनाओं को पूरा करने की समय-सीमा भी घटाई गई है। पहले वाटरशेड विकास कार्यक्रम (WDC-PMKSY 1.0) के तहत परियोजनाओं को पूरा करने के लिए सात साल मिलते थे, जिसे दूसरे चरण (WDC-PMKSY 2.0) में घटाकर पांच साल कर दिया गया है।

जल संरक्षण के कामों की जिम्मेदारी गांवों को भी
बैठक में किसान उत्पादक संगठनों (FPO), स्वयं सहायता समूहों (SHG) और जल उपयोगकर्ता समूहों को मजबूत बनाने पर भी जोर दिया गया। इन संगठनों की मदद से ग्रामीणों की आजीविका बढ़ाने, कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन करने और बाजार तक बेहतर पहुंच बनाने में मदद मिल सकती है।

अधिकारियों ने कहा कि गांवों में बनाए जाने वाले तालाब, जलाशय और पानी रोकने वाले दूसरे ढांचों की देखभाल की जिम्मेदारी भी स्थानीय समुदायों को दी जानी चाहिए, ताकि परियोजना पूरी होने के बाद भी उनका सही इस्तेमाल होता रहे।

नई गाइडलाइन से तीसरे चरण की योजनाओं को मिलेगी दिशा
दो दिवसीय बैठक में हुई चर्चा के आधार पर विश्व बैंक की मदद से चल रहे REWARD कार्यक्रम के तहत राष्ट्रीय तकनीकी गाइडलाइन को अंतिम रूप देने में मदद मिलेगी। इन गाइडलाइन का इस्तेमाल वाटरशेड विकास कार्यक्रम के तीसरे चरण (WDC-PMKSY 3.0) की योजनाएं तैयार करने में भी किया जाएगा। इसका उद्देश्य बारिश पर निर्भर खेती वाले क्षेत्रों में जल संरक्षण को बढ़ावा देना, सूखे का असर कम करना, खेती को मौसम के बदलावों के प्रति मजबूत बनाना और किसानों की आजीविका में सुधार करना है।
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