भारत की 16 करोड़ हेक्टेयर खेती-बाड़ी की जमीन में से लगभग 30 प्रतिशत जमीन एग्रीवोल्टाइक मॉडल के लिए उपयुक्त है। भारत मंडपम में बुधवार को आयोजित 7वें एग्रीवोल्टाइक वर्ल्ड कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने यह जानकारी दी। बता दें कि एग्रीवोल्टाइक मॉडल के तहत एक खेत में जमीन से थोड़ी ऊंचाई पर सोलर पैनल लगाए जाते हैं, जबकि उनके नीचे फसलें उगाई जाती हैं।
पीएम-कुसुम 2.0 में एग्रीवोल्टाइक शामिल
केंद्रीय मंत्री ने बताया कि पीएम कुसुम योजना के दूसरे चरण के तहत एग्रीवोल्टाइक को शामिल किया गया है, जिससे किसानों को काफी फायदा होगा और देश की सौर ऊर्जा उत्पाादन क्षमता बढ़ेगी।
यह मॉडल 2050 में भारत की बिजली मांग को पूरा कर सकता है
केंद्रीय मंत्री जोशी ने द एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट के अनुमान का हवाला दिया, जो कहता है कि भारत की 4 करोड़ 75 लाख हेक्टेयर जमीन इस मॉडल के लिए उपयुक्त है। अगर मात्र 1 करोड़ 60 लाख हेक्टेयर जमीन पर भी यह मॉडल लागू किया जाए, तो सालाना 12,775 टेरावाट-घंटे बिजली का उत्पादन हो सकता है। यह 20250 तक भारत की अनुमानित बिजली मांग के बराबर या उससे भी ज्यादा है।
एग्रीवोल्टाइक मॉडल में ज्यादा खर्च, सरकार करेगी सहायता
केंद्रीय मंत्री के अनुसार, इस मॉडल के तहत खेत की जमीन से ऊपर और तिरछे सोलर पैनल लगाने में सामान्य सोलर पैनल के मुकाबले 25 से 30 प्रतिशत ज्यादा खर्च आता है। उन्होंने कहा कि सरकार इस अतिरिक्त खर्च की भरपाई करने और क्षमता बढ़ाने में मदद करेगी।
किसानों के लिए नया टूल और पॉलिसी हैंडबुक लॉन्च
इस कार्यक्रम में इंडिया एग्रीवोल्टाइक्स अलायंस द्वारा बनाया गया एक डिसीजन-मेकिंग टूल भी लॉन्च किया गया। इसकी मदद से किसान यह आंकलन कर सकेंगे कि उनकी जमीन एग्रीवोल्टाइक के लिए कितनी उपयुक्त है और इसे लगाने में कितना खर्च आएगा।
सम्मेलन में एक एग्रीपीवी पॉलिसी हैंडबुक भी जारी की गई। अधिकारियों के अनुसार, यह हैंडबुक अंतिम नीति तय करने के लिए एक आधार का काम करेगी। इस सम्मेलन में दुनिया भर के विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं, शोधकर्ताओं, उद्योगपतियों, स्टार्टअप्स और अन्य भागीदारों सहित 1200 से अधिक प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं।