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एक मक्का, कई दावेदार : मुर्गी दाने से लेकर इथेनॉल तक बढ़ी मांग, कीमतों पर क्या होगा असर?

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Fri, 23 Oct 2026 03:40 PM IST
सार

मक्का की कम बुवाई और पोल्ट्री फीड व इथेनॉल उद्योग की बढ़ती मांग से सप्लाई पर दबाव है। जानें मक्का की कीमतों, नई फसल की आवक और बाजार के ताजा अनुमान का असर।

मक्का की फसल
मक्का की फसल - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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भारत में मक्का की सप्लाई को लेकर दबाव बढ़ रहा है। कम बुवाई, सूखे से फसल प्रभावित होने की आशंका और पोल्ट्री फीड, स्टार्च व इथेनॉल उद्योग की बढ़ती मांग से मक्का की उपलब्धता पर असर पड़ सकता है। नई फसल की आवक बढ़ने से पहले बाजार में सप्लाई को लेकर चिंता बनी हुई है।

मक्का की कीमतों में बढ़ोतरी का असर पोल्ट्री कारोबार पर भी पड़ रहा है। सितंबर के आखिरी सप्ताह में पोल्ट्री किसानों को मक्का करीब 27 से 28 रुपये प्रति किलो के भाव पर मिल रहा था। वहीं, 8 अक्टूबर को देश में इसका थोक बाजार का मध्य भाव करीब 23 रुपये प्रति किलो था। इससे मक्का की खरीद लागत को लेकर पोल्ट्री उद्योग की चिंता बढ़ी है।

मक्का की बुवाई में 3.18 प्रतिशत की गिरावट
मक्का की कम बुवाई भी बाजार के लिए चिंता का कारण है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, 4 सितंबर 2026 तक देश में मक्का की बुवाई 91.09 लाख हेक्टेयर में हुई थी। पिछले साल इसी अवधि में यह रकबा 94.08 लाख हेक्टेयर था। इस तरह मक्का की बुवाई में 3.18 प्रतिशत की कमी दर्ज की गई।

कम रकबे और सूखे से फसल को नुकसान की आशंका के कारण आने वाले महीनों में मक्का की उपलब्धता पर दबाव पड़ सकता है। हालांकि, बाजार की वास्तविक स्थिति नई फसल की पैदावार और मंडियों में होने वाली आवक पर निर्भर करेगी।

मक्का की कुल मांग में पोल्ट्री फीड की बड़ी हिस्सेदारी
मक्का का इस्तेमाल पोल्ट्री फीड यानी मुर्गियों के दाने में बड़े पैमाने पर किया जाता है। नेशनल एग कोऑर्डिनेशन कमेटी (NECC) के अनुसार, देश में मक्का की कुल मांग का करीब 55 से 60 प्रतिशत हिस्सा पोल्ट्री फीड से जुड़ा है। ऐसे में मक्का की सप्लाई कम होने या कीमतें बढ़ने पर पोल्ट्री किसानों और फीड बनाने वाली कंपनियों की लागत बढ़ सकती है।

इसका असर अंडा और चिकन उत्पादन से जुड़े कारोबार पर भी पड़ सकता है। पोल्ट्री उद्योग के लिए मक्का की नियमित और उचित कीमत पर उपलब्धता जरूरी है। इसलिए बाजार में आवक कम होने पर इस क्षेत्र की खरीद लागत पर दबाव बढ़ने की आशंका रहती है।

इथेनॉल उद्योग में भी बढ़ी मक्का की अहमियत
मक्का की मांग बढ़ने की एक बड़ी वजह इथेनॉल उत्पादन भी है। उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2025-26 में भारत के कुल इथेनॉल उत्पादन में मक्का की हिस्सेदारी करीब 35.96 प्रतिशत रही। इससे इथेनॉल उद्योग के लिए मक्का एक अहम कच्चा माल बन गया है।

वर्ष 2026-27 के लिए इथेनॉल खरीद की निविदा में 1,100 करोड़ लीटर इथेनॉल की मांग रखी गई है। इस निविदा में गन्ने के रस, सिरप और कुछ प्रमुख चीनी-आधारित स्रोतों को शामिल नहीं किया गया है। इसके साथ ही मक्का से बने इथेनॉल का खरीद मूल्य 3 रुपये प्रति लीटर घटाकर 68.86 रुपये प्रति लीटर कर दिया गया है।

चीनी-आधारित स्रोतों पर लगी पाबंदी और इथेनॉल की मांग के बीच मक्का की उपलब्धता और कीमतों पर असर पड़ सकता है। हालांकि, उद्योग की वास्तविक खरीद और दूसरे कच्चे माल के इस्तेमाल से बाजार की स्थिति में बदलाव आ सकता है।

नवंबर-दिसंबर में बढ़ सकती है नई फसल की आवक
मक्का की नई फसल की आवक को लेकर भी बाजार की नजर बनी हुई है। उपलब्ध बाजार अनुमान के मुताबिक, मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र की मंडियों में नवंबर के दौरान नई फसल की आवक बढ़ने की उम्मीद है। वहीं, कर्नाटक में प्रमुख आवक दिसंबर तक जारी रह सकती है।

नई फसल मंडियों में पहुंचने के बाद सप्लाई बढ़ सकती है, जिससे कीमतों को राहत मिलने की संभावना रहेगी। दूसरी ओर, यदि आवक उम्मीद से कम रहती है या फसल की गुणवत्ता प्रभावित होती है, तो कुछ क्षेत्रों में कीमतों पर दबाव बना रह सकता है। मक्का के कारोबार में फसल की गुणवत्ता, नमी की मात्रा, मंडियों में आवक, माल ढुलाई का खर्च और अलग-अलग क्षेत्रों में उपलब्धता भी अहम भूमिका निभाएंगे।

क्या मक्का की मांग और सप्लाई में संतुलन बन पाएगा?
मक्का बाजार के सामने सबसे बड़ी चुनौती पोल्ट्री फीड, स्टार्च उद्योग और इथेनॉल उत्पादन की जरूरतों को पूरा करने की है। इन सभी क्षेत्रों में मक्का की मांग बनी रहने के कारण सप्लाई में कमी आने पर कीमतों में तेजी आ सकती है।

हालांकि, नवंबर-दिसंबर में नई फसल की आवक बढ़ने और एथेनॉल उत्पादन में चावल जैसे दूसरे कच्चे माल का इस्तेमाल बढ़ने से मक्का की मांग पर कुछ दबाव कम हो सकता है। इसका असर क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग हो सकता है। फिलहाल, जिन क्षेत्रों में मक्का की उपलब्धता कम है, वहां कीमतों को सहारा मिल सकता है। लेकिन आने वाले समय में कीमतों की दिशा काफी हद तक नई फसल की आवक और उसकी गुणवत्ता पर निर्भर करेगी।

थोक खरीदारों, व्यापारियों और पोल्ट्री फीड निर्माताओं के लिए जरूरी है कि वे मंडियों के भाव, फसल की गुणवत्ता, नमी और माल ढुलाई की लागत पर नजर रखें। इससे खरीद के फैसले बेहतर तरीके से लिए जा सकते हैं। भारत के लिए जरूरी है कि मक्का की उपलब्धता और इस्तेमाल के बीच संतुलन बनाया जाए, ताकि पोल्ट्री और खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों को पर्याप्त कच्चा माल मिले और इथेनॉल उत्पादन की जरूरतें भी पूरी हो सकें।
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