प्राकृतिक रबर की कीमत पहली बार 300 रुपये प्रति किलो के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी, घरेलू बाजार में रबर की कमी, पश्चिम एशिया में तनाव और सिंथेटिक रबर के महंगे होने से कीमतों में यह उछाल आया है। उत्पादन सीजन की शुरुआत में ही भाव बढ़ने से रबर किसानों को राहत मिलने की उम्मीद है। इससे वे उन पेड़ों से भी रबर निकालना शुरू कर सकते हैं, जिनसे कम कीमतों के कारण लंबे समय से उत्पादन नहीं लिया जा रहा था।
भारतीय रबर डीलर्स फेडरेशन के अध्यक्ष जॉर्ज वैली के मुताबिक, लंबे समय तक प्राकृतिक रबर की कीमत 147 से 197 रुपये प्रति किलो के बीच बनी हुई थी। कम भाव के कारण कई किसानों ने पेड़ों से रबर निकालना यानी टैपिंग बंद कर दिया था। अब कीमतों में तेजी से किसानों की कमाई बढ़ सकती है और उत्पादन को भी बढ़ावा मिल सकता है।
हालांकि, उन्होंने एक चिंता भी जताई। किसानों का शीट रबर बनाने के बजाय लेटेक्स उत्पादन की ओर बढ़ता रुझान भविष्य में चुनौती बन सकता है। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पादन प्रभावित हो रहा है। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय बाजार की कीमतों में अंतर भी चिंता का विषय है।
घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारणों से बढ़े दाम
रबर बोर्ड के उपनिदेशक (मार्केटिंग) बिनॉय कुरियन ने बताया कि प्राकृतिक रबर की कीमतों में तेजी के पीछे घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों तरह के कारण हैं। घरेलू स्तर पर अल नीनो के प्रभाव से दक्षिण भारत के रबर उत्पादक क्षेत्रों में आपूर्ति प्रभावित हुई है। चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में भारी बारिश के कारण पेड़ों से रबर निकालने का काम बाधित हुआ। इससे बाजार में रबर की उपलब्धता कम हुई और कीमतों पर दबाव बढ़ा।
पश्चिम एशिया में जारी संघर्ष का असर भी रबर बाजार पर पड़ा है। भू-राजनीतिक तनाव के कारण कच्चे तेल (ब्रेंट क्रूड) की कीमतें बढ़ी हैं। इससे सिंथेटिक रबर महंगा हुआ है, जिसका असर प्राकृतिक रबर की कीमतों पर भी पड़ा है।
दक्षिण-पूर्व एशिया में भी घटा उत्पादन
प्राकृतिक रबर के प्रमुख उत्पादक दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में भी उत्पादन में गिरावट दर्ज की गई है। उत्पादन के प्रमुख समय में अनियमित मौसम और लंबे समय तक सूखे की स्थिति के कारण वैश्विक बाजार में रबर की उपलब्धता उम्मीद से कम रही है। इससे अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतों को मजबूती मिली है।
बिनॉय कुरियन के अनुसार, मौजूदा कीमतें किसानों को दोबारा रबर निकालने के लिए प्रोत्साहित कर सकती हैं। इससे उन्हें बेहतर कमाई का मौका मिलेगा। घरेलू बाजार में मजबूत मांग, सीमित आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेजी के कारण भारतीय रबर की कीमतें फिलहाल वैश्विक बाजार से ऊपर बनी हुई हैं।
दुनिया में मांग ज्यादा, उत्पादन कम रहने का अनुमान
एसोसिएशन ऑफ नेचुरल रबर प्रोड्यूसिंग कंट्रीज (ANRPC) के अनुमान के मुताबिक, वर्ष 2026 में दुनिया में प्राकृतिक रबर का उत्पादन 1.5039 करोड़ टन रहने की संभावना है, जबकि इसकी खपत 1.5356 करोड़ टन तक पहुंच सकती है।
इस तरह वैश्विक स्तर पर उत्पादन के मुकाबले खपत करीब 2.17 लाख टन अधिक रहने का अनुमान है। यानी अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्राकृतिक रबर की आपूर्ति कम पड़ सकती है। इसका असर कीमतों पर भी बना रह सकता है।