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Nana Patekar: पति के घायल होने के बाद सिलाई मशीन से बदली बीड की राजश्री की जिंदगी, निधन पर आई पाटेकर की याद

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Saraswat Updated Thu, 08 Oct 2026 05:27 PM IST
सार

  • नाना पाटेकर की मदद से मिली सिलाई मशीन बनी राजश्री की आजीविका का सहारा
  • पति के घायल होने के बाद राजश्री ने संभाली परिवार की जिम्मेदारी
  • करीब 10 साल पहले नाम फाउंडेशन ने दी थी सिलाई मशीन
  • बीड में सूखे और किसान संकट के बीच नाम फाउंडेशन ने शुरू किया सामाजिक काम

बीड जिले की महिला के लिए एक सिलाई मशीन नाना पाटेकर की याद से भी जुड़ी।
बीड जिले की महिला के लिए एक सिलाई मशीन नाना पाटेकर की याद से भी जुड़ी। - फोटो : AI
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विस्तार
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महाराष्ट्र के बीड जिले की राजश्री असाराम परदेशी के लिए एक सिलाई मशीन रोजगार के साथ अभिनेता नाना पाटेकर की याद से भी जुड़ी है। करीब 10 साल पहले नाम फाउंडेशन से मिली इस मशीन की मदद से राजश्री ने पति के बीमार पड़ने के बाद परिवार चलाने का काम संभाला। नाना पाटेकर के निधन की खबर के बाद सिलाई मशीन नाना पाटेकर की याद का माध्यम बन गई।

नाना पाटेकर का दमदार अभिनय की कहानियां आपने खूब सुनी होंगी। दूसरी तरफ नाना पाटेकर ने सामाजिक सेवा के मोर्चे पर अपनी शांत पहचान बनाई। अभिनय से इतर सामाजिक सेवल की कहानी साल 2015 से शुरू होती है, जब पाटेकर ने मराठी अभिनेता मकरंद अनासपुरे के साथ मिलकर नाम फाउंडेशन की स्थापना की थी।

पति के बिस्तर पर पड़ने के बाद संभाली परिवार की जिम्मेदारी
बीड के शिरूर कासार तहसील के अरवी गांव की रहने वाली राजश्री ने बताया कि करीब 10 साल पहले नाम फाउंडेशन ने उन्हें सिलाई मशीन दी थी। उनके पति निर्माण मजदूर के रूप में काम करते थे, लेकिन काम की जगह पर गिरने के बाद वह गंभीर रूप से घायल हो गए और बिस्तर पर रहने लगे।

इसके बाद परिवार चलाने की पूरी जिम्मेदारी राजश्री के कंधों पर आ गई। उन्होंने साड़ियों की किनारी लगाने और ब्लाउज सिलने का काम शुरू किया। राजश्री ने बताया कि इससे वह रोज करीब 400 से 500 रुपये कमाती हैं और महीने में करीब 10,000 रुपये की आय हो जाती है। उन्होंने कहा कि यह सब नाना पाटेकर की मदद से संभव हुआ। नाना पाटेकर के निधन के बाद पीटीआई से बात करते हुए राजश्री भावुक हो गईं। उन्होंने कहा कि गुरुवार सुबह सिलाई मशीन को छूने पर उनका दिल भर आया और उन्हें उस व्यक्ति की याद आई, जिसने उनके घर में लक्ष्मी लाई थी।

सूखे और किसान आत्महत्याओं के बीच शुरू हुआ काम
बीड में नाना पाटेकर और मकरंद अनासपुरे का जुड़ाव वर्ष 2015 में हुआ। लगातार सूखे के वर्षों के दौरान जिले में किसान आत्महत्याओं में बढ़ोतरी हुई थी और कई गांव इस संकट से प्रभावित थे। इस स्थिति के बीच दोनों कलाकारों ने आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवारों की मदद के लिए काम शुरू किया। उनका काम केवल तत्काल मदद तक सीमित नहीं रहा। प्रभावित परिवारों के लिए स्थायी आजीविका के साधन उपलब्ध कराने की दिशा में भी काम किया गया।

नाम फाउंडेशन की ओर से महिलाओं को सिलाई मशीन, आटा चक्की और पशुधन उपलब्ध कराया गया, ताकि वे छोटे स्तर पर आय का जरिया शुरू कर सकें। बाद में नाम फाउंडेशन ने ग्रामीण विकास, आजीविका और जल संरक्षण जैसे क्षेत्रों में काम का विस्तार किया।

बीड में जल संरक्षण पर भी हुआ काम, 
नाम फाउंडेशन के जिला समन्वयक शिवराम घोडके के अनुसार, संगठन ने बीड में पानी की कमी से निपटने के लिए बड़े स्तर पर जल संरक्षण का काम भी किया। बीड तहसील के पिंपलनेर क्षेत्र में ऋद्धि सिद्धि नदी के 34 किलोमीटर लंबे हिस्से में गाद निकालने और नदी को चौड़ा करने का काम किया गया। इसके बाद राज्य सरकार ने नदी पर चार छोटे बांध बनाए। इससे आसपास के 14 गांवों के लोगों को फायदा हुआ और किसानों को एक से अधिक मौसम में फसल उगाने में मदद मिली।

जिले के अन्य हिस्सों में भी फाउंडेशन ने नालों, छोटी धाराओं और जलाशयों से गाद निकालने के लिए अर्थमूवर मशीनों का इस्तेमाल किया। घोडके के अनुसार, नाम फाउंडेशन की ओर से किए गए नदी गहरीकरण और जल संरक्षण के काम से करीब 10,000 हेक्टेयर जमीन सिंचाई के दायरे में आई और करीब एक लाख किसानों को इसका लाभ मिला।


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