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कमजोर मानसून ने बढ़ाई चिंता : आधे से ज्यादा जलाशय खाली, विशेषज्ञ बोले- बारिश का पानी बचाने की रणनीति जरूरी

गांव जंक्शन डेस्क, दिल्ली Published by: Mohammad Aamil Updated Wed, 15 Jul 2026 11:31 AM IST
सार

  • देश के 166 प्रमुख जलाशयों में केवल 32.38% पानी मौजूद
  • 50% से अधिक जल भंडारण क्षमता अब भी खाली
  • 1950 के मुकाबले प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता घटकर 1,500 घन मीटर
  • 2050 तक पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से दोगुनी होने का अनुमान
  • जलवायु परिवर्तन से बढ़ रहा है जल संकट

जलाशय
जलाशय - फोटो : गांव जंक्शन
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विस्तार
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देश में मानसून सक्रिय होने के बावजूद जल संकट पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। केंद्रीय जल आयोग (CWC) के अनुसार, देश के 166 प्रमुख जलाशयों में उनकी कुल क्षमता का केवल 32.38% पानी ही मौजूद है। यानी 50% से अधिक जल भंडारण क्षमता अब भी खाली है। विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य के जल संकट से बचने के लिए सिर्फ जल भंडारण बढ़ाना ही नहीं, बल्कि पानी की खपत कम करना और उसका पुन: उपयोग भी जरूरी होगा।

बिजनेस लाइन की रिपोर्ट के अनुसार, ऊर्जा एवं संसाधन संस्थान (TERI) के जल विभाग के सलाहकार और पूर्व आईएएस अधिकारी श्यामल सरकार ने कहा कि भारत में जल सुरक्षा की चुनौती अब केवल पानी की उपलब्धता की नहीं, बल्कि उसके बेहतर प्रबंधन की भी है। घरेलू, कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में पानी की मांग लगातार बढ़ रही है, जबकि उपलब्ध संसाधन सीमित होते जा रहे हैं।

प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता तेजी से घटी
श्यामल सरकार के अनुसार, वर्ष 1950 में प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता करीब 5,000 घन मीटर थी, जो अब घटकर लगभग 1,500 घन मीटर रह गई है। अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुसार 1,700 घन मीटर से कम उपलब्धता वाले देशों को 'जल संकटग्रस्त' माना जाता है। भारत यह सीमा पहले ही पार कर चुका है और अब 1,000 घन मीटर की गंभीर जल संकट वाली स्थिति की ओर बढ़ रहा है।

2050 तक दोगुनी हो सकती है पानी की मांग
नीति आयोग के अनुमान के अनुसार, 2050 तक भारत में पानी की मांग उपलब्ध आपूर्ति से लगभग दोगुनी हो सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि इस अंतर को कम करने के लिए जल भंडारण क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ पानी के कुशल उपयोग, पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) और वर्षा जल संचयन पर बड़े स्तर पर काम करना होगा।

शहरों में पानी की सबसे ज्यादा बर्बादी
विशेषज्ञों के मुताबिक, एक व्यक्ति को पीने के लिए प्रतिदिन केवल 2 से 3 लीटर पानी की जरूरत होती है, लेकिन दिल्ली जैसे शहरों में प्रति व्यक्ति करीब 165 लीटर पानी प्रतिदिन उपलब्ध कराया जाता है। इसका बड़ा हिस्सा नहाने, कपड़े धोने और अन्य कार्यों में इस्तेमाल होने के बाद बिना पुनर्चक्रण के बह जाता है।उन्होंने बताया कि इजराइल अपने 60-70% अपशिष्ट जल का दोबारा उपयोग कृषि में करता है, जबकि भारत में इस दिशा में अभी काफी काम किया जाना बाकी है।

जलवायु परिवर्तन बढ़ा रहा है चुनौती
विशेषज्ञों का कहना है कि जलवायु परिवर्तन के कारण मानसून का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। कहीं कम समय में अत्यधिक बारिश हो रही है तो कहीं लंबे समय तक सूखा पड़ रहा है। पर्याप्त जल भंडारण नहीं होने से अतिरिक्त वर्षा का पानी समुद्र में बह जाता है और बाद में जल संकट पैदा हो जाता है।

सरकार चला रही कई योजनाएं
जल संरक्षण बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार मिशन अमृत सरोवर, वर्षा जल संचयन, सामुदायिक जल संरक्षण और कुशल सिंचाई तकनीकों को बढ़ावा दे रही है। मिशन अमृत सरोवर के तहत प्रत्येक जिले में जल निकाय विकसित किए जा रहे हैं ताकि वर्षा जल का अधिक से अधिक संग्रह किया जा सके।

शहरों को बदलनी होगी जल प्रबंधन की रणनीति
सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (CSE) की विशेषज्ञ सुष्मिता सेनगुप्ता का कहना है कि शहरों को फिर से तालाब, झील, वर्षा जल संचयन और स्थानीय जल स्रोतों को मजबूत करना होगा। उनके अनुसार, पाइपलाइन आधारित जल आपूर्ति पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय विकेंद्रीकृत जल प्रबंधन प्रणाली अपनाने की जरूरत है। उन्होंने कहा कि लंबे समय से स्थानीय जल स्रोतों की अनदेखी, भूजल का अत्यधिक दोहन और पाइपलाइन से होने वाली 40-50% पानी की बर्बादी ने जल संकट को और गंभीर बना दिया है।
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