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उपग्रह से फसल निगरानी के लिए मजबूत AI तैयार करने की पहल : IIT ने बनाया डाटासेट, सर्वे-उपज का आकलन होगा सटीक...

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Saraswat Updated Fri, 25 Sep 2026 03:32 PM IST
सार

  • उपग्रह आधारित फसलों की निगरानी के लिए एआई के विकास की दिशा में बड़ा कदम...
  •  IIIT-दिल्ली और एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन ने सैटेलाइट फोटो और कृषि आंकड़ों को आधार बनाकर SICKLE नाम का डाटासेट तैयार किया है
  • यह डाटासेट उपग्रह आधारित फसलों की निगरानी के लिए एआई को तैयार करने का काम कर सकता है
  • इस तरह एआई और उपग्रह मिलकर पारंपरिक फसल सर्वे की जरूरत को कम और फसल उत्पादन के आकलन को अधिक सटीक बना सकते हैं।
  • हालांकि इस मोर्चे पर कई चुनौतियों भी मौजूद हैं
  • जानिए विस्तार से...

उपग्रह से फसल निगरानी के लिए एआई को तैयार करने कि दिशा में IIT दिल्ली का बड़ा कदम।
उपग्रह से फसल निगरानी के लिए एआई को तैयार करने कि दिशा में IIT दिल्ली का बड़ा कदम। - फोटो : AI
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विस्तार
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खेती-बाड़ी के लिए मजबूत एआई तैयार करने की दिशा में IIIT-दिल्ली और एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन के शोधकर्ताओं ने बड़ा कदम उठाया है। शोधकर्ताओं ने एक खास मल्टी-सैटेलाइट डाटासेट तैयार किया है, जिसे सिकल नाम दिया गया है।यह डाटासेट आगामी समय में एआई को प्रशिक्षित करेगा और सैटेलाइट्स की मदद से खेतों में खड़ी फसलों की सटीक पहचान, उनके विकास के चरणों और पैदावार का आकलन करना संभव हो सकेगा।

तीन उपग्रहों और जमीनी आंकड़ों का अनूठा मेल
इस डाटासेट कौ तैयार करने के लिए तीन सैटेलाइट लैंडसैट-8, सेंटिनल-1 और सेंटिनल-2 द्वारा खींची गई तस्वीरों को जमीन से जुटाए गए असल कृषि आंकड़ों संग जोड़ा गया है। इसमें तीन, दस और 30 मीटर रेजोल्यूशन पर करीब दो लाख 9 हजार तस्वीरें शामिल है।

इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा यह है कि केवल तस्वीरों के रंग-रूप पर निर्भर रहने के बजाय एआई मॉडल को यह भी सिखाया जा सकता है कि खेत में वास्तव में क्या बोया गया था और बुवाई, रोपाई व कटाई जैसे मुख्य चरण कब पूरे हुए। इसके अलावा, तीनों उपग्रहों में ऑप्टिकल, थर्मल और रडार जैसी अलग-अलग तकनीकें हैं। जब आसमान में घने बादल होने के कारण सामान्य ऑप्टिकल कैमरे काम नहीं करते, तब रडार तकनीक बादलों के आर-पार देखकर फसलों का डाटा जुटाने में मदद करती है।

तमिलनाडु के कावेरी डेल्टा में हुआ शोध
शोधकर्ताओं ने बताया कि सिकल डाटासेट को मुख्य रूप से तमिलनाडु के प्रमुख धान उत्पादक क्षेत्र कावेरी डेल्टा के 388 कृषि भूखंडों (खेतों) से जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर विकसित किया गया है। यह डाटा जनवरी 2018 से मार्च 2021 के बीच का है और इसमें चार जिलों की 21 विभिन्न फसलों के आंकड़े शामिल हैं।

इस अध्ययन के तहत कुल 2,370 सीजन-वार नमूने एकत्र किए गए। इनमें 145 खेतों से धान के 351 नमूने शामिल हैं, जिनमें धान की किस्म, मौसम, बढ़वार के चरण और उत्पादन की विस्तृत जानकारी दर्ज है। आईआईआईटी-दिल्ली के शोधकर्ताओं ने इस डाटा का इस्तेमाल फसलों के प्रकार की पहचान करने, उनके विकास चक्र का अनुमान लगाने और अंतिम पैदावार का सटीक आकलन करने के लिए किया है।


पारंपरिक फसल सर्वे पर निर्भरता होगी कम
अध्ययन के अनुसार, इस तकनीक से पारंपरिक जमीनी सर्वेक्षण पर निर्भरता कम होगी और बहुत बड़े इलाके में फसलों की सेहत का सटीक पता लगाया जा सकेगा। नीति निर्माताओं और सरकार के लिए यह प्रणाली बड़े पैमाने पर फसल चक्र और कृषि उत्पादकता की निगरानी करने में मददगार होगी। वहीं वैज्ञानिक यह अध्ययन कर सकेंगे कि बदलती जलवायु और परिस्थितियों के प्रति फसलें कैसा व्यवहार कर रही हैं।

इस पहल में कई चुनौतियां भी
हालांकि, शोधकर्ताओं ने कुछ चुनौतियों का भी जिक्र किया है। इनमें जमीनी स्तर पर बड़े पैमाने पर सर्वेक्षण की कमी, किसानों द्वारा दी जाने वाली जानकारी में अनिश्चितता और कम रेजोल्यूशन वाली तस्वीरों में छोटे खेतों की सटीक पहचान करने में आने वाली तकनीकी कठिनाइयां शामिल हैं। इसके बावजूद, वैज्ञानिकों का मानना है कि वास्तविक दुनिया में खेत स्तर की सटीक जानकारी जुटाने के लिए यह तकनीक एक मजबूत आधार प्रदान करती है।


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