खेती की बढ़ती लागत और जलवायु परिवर्तन के इस दौर में तकनीक किसानों को कई मोर्चों पर सहारा देती है। इसी अहमियत को समझते हुए सीजीआईएआर विज्ञान और साझेदारी सप्ताह का आयोजन राजधानी दिल्ली में होने वाला है, जिसमें सरकारी अधिकारी, दुनियाभर के शोधकर्ता और कारोबारी एक मंच पर जुटकर चर्चा करेंगे कि कौनसी नई तकनीकें किसानों तक पहुच चुकी हैं और इन्हें ज्यादा से ज्यादा किसानों तक पहुंचाने के लिए आगे क्या काम करने की जरूरत है।
12 से 17 अप्रैल तक चलने वाले इस अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम की मेजबानी सीजीआईएआर और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद कर रहे हैं। बता दें कि सीजीआईएआर एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था है, जो विकासशील देशों में खेती-बाड़ी को बढ़ावा देकर खाद्य सुरक्षा को मजबूती देने पर जोर देती है।
भारत और सीजीआईएआर का पांच दशक लंबा रिश्ता
भारत कृषि अनुसंधान में अहम भूमिका निभा रहा है, जिसके चलते इस अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रम की मेजबानी के लिए राजधानी दिल्ली एक उपयुक्त जगह बन जाती है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद एक बड़े राष्ट्र के लिए अनुसंधान का नेतृत्व कर रहा है। भारतीय वैज्ञानिकों ने सीजीआईएआर के साथ 50 से अधिक वर्षों तक काम किया है। वर्तमान में भारत में फसल, पानी, पशुधन, मछली, पोषण और नीतियों पर सीजीआईएआर के 10 अनुसंधान केंद्र काम कर रहे हैं।
भारत का कृषि अनुसंधान विदेश तक झंडे गाड़ रहा है
भारत का कृषि ज्ञान का फैलाव विदेश तक है। इक्रिसैट द्वारा सहेजी गई भारत की मूंगफली की किस्म आज मलावी, युगांडा, मोजाम्बिक और जाम्बिया जैसे देशों में उगाई जा रही है। वहीं, हैदराबाद में स्थित सेंटर ऑफ एक्सीलेंस एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों के साथ खेती की सफल तकनीकें साझा कर रहा है।
50 वर्षों की साझेदारी और आगे की राह
आईसीएआर के महानिदेशक डॉ. एम. एल. जाट के अनुसार, भारत और सीजीआईएआर के बीच 50 दशकों से ज्यादा समय से चली आ रही इस साझेदारी ने देश के कृषि विकास में अहम भूमिका निभाई है। उन्होंने बताया कि सिमिट (CIMMYT), इरी (IRRI) और इक्रिसैट (ICRISAT) जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के सहयोग ने हरित क्रांति के बाद भारत को अनाज की कमी वाले देश से एक प्रमुख खाद्य उत्पादक और निर्यातक देश बना दिया है।
सीजीआईएआर की कार्यकारी प्रबंध निदेशक डॉ. इस्माहाने एलुआफी ने कहा कि यह आयोजन इस लंबी साझेदारी की उपलब्धियों का जश्न मनाएगा और अगले 50 वर्षों के कृषि सहयोग का एजेंडा तैयार करेगा। उन्होंने बताया कि भारत के बीज और ज्ञान से पहले ही अफ्रीका और एशिया के किसानों को मदद मिल रही है। इस कार्यक्रम का पहला संस्करण अप्रैल 2025 में केन्या के नैरोबी में आयोजित किया गया था, और भारत का यह संस्करण वैश्विक साझेदारी को और मजबूत करेगा।
कृषि अनुसंधान में साझेदारी पर रहेगा फोकस
सरकार के अनुसार, 2027 के इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य दक्षिण-दक्षिण सहयोग को बढ़ावा देना और खासतौर से ग्लोबल साउथ के साथ भारत की सफल कृषि तकनीकों को साझा करना होगा। डॉ. जाट ने बताया कि कार्यक्रम में जलवायु अनुकूल कृषि, डिजिटल कृषि, एग्रीस्टैक, कृषि मशीनीकरण, मोटे अनाज (मिलेट्स), और प्राकृतिक खेती जैसे अहम विषयों पर बातचीत की जाएगी। इसके अलावा मिट्टी के स्वास्थ्य, जल प्रबंधन, स्टार्टअप्स, और महिलाओं व युवाओं की भागीदारी पर भी चर्चा होगी।
इक्रिसैट के महानिदेशक डॉ. हिमांशु पाठक के मुताबिक, विज्ञान, तकनीक और अंतरराष्ट्रीय साझेदारी ने भारत की खेती को पूरी तरह बदल दिया है। उन्होंने कहा कि इस आयोजन के जरिए भारत अपनी कृषि उपलब्धियों को दुनिया के सामने रखेगा और खेती व खाद्य प्रणालियों की नई चुनौतियों का समाधान निकालने के लिए वैश्विक स्तर पर हुए विकास से सीखेगा।