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GOBARdhan: CBG क्षेत्र में बढ़ सकती है निवेश की रफ्तार, तय खरीद और सहायता देकर नए प्लांट लगाने पर सरकार का जोर

गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली Published by: Devesh Saraswat Updated Mon, 21 Sep 2026 01:47 PM IST
सार

  • केंद्र की नई गोबरधन योजना सीबीजी क्षेत्र से जुड़ी दो चुनौतियों को सुलझाती नजर आ रही है
  • पहली चुनौती- सीबीजी के लिए कोई मजबूत बाजार का अभाव और कारखाना खोलने के लिए निवेश जुटाने से जुड़ी दिक्कतें
  • गोबरधन योजना में पात्र कारखानों से 100 प्रतिशत सीबीज खरीद और क्षमता के हिसाब से आर्थिक सहायता देने का प्रावधान है।
  • इन शुरुआती चुनौतियों का हल मिलने से नए कारखानों की स्थापना में तेजी की उम्मीद है।

गोबरधन योजना सीबीजी क्षेत्र से जुड़ी दो प्रमुख चुनौतियों को सुलझाती नजर आ रही है।
गोबरधन योजना सीबीजी क्षेत्र से जुड़ी दो प्रमुख चुनौतियों को सुलझाती नजर आ रही है। - फोटो : सोशल मीडिया
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विस्तार
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क्या भारत के संपीड़ित बायोगैस (CBG) कारखानों के अच्छे दिन शुरू होने वाले हैं? नई गोबरधन योजना के तहत पात्र कारखानों से सीबीजी की तय खरीद का प्रावधान सीबीजी क्षेत्र के विकास को रफ्तार देते हुए दिखा रहा है। अब तक देश में सीबीजी कारखानों की स्थापना काफी सुस्त रही है, जैसे  पंजीकृत 1,929 कंप्रेस्ड बायोगैस प्लांटों में से अभी केवल 217 कारखाने चालू हैं। आंकड़ों के अनुसार, 13 अगस्त तक 357 दूसरे कारखाने निर्माण के चरण में है। नए कारखानों के जमीन पर उतरने की इस सुस्त रफ्तार के पीछे सीबीजी के लिए गैस का मजबूत बाजार न होना और कारखानों में निवेश के लिए पैसे से जुड़ी दिक्कतें प्रमुख हैं। 

इन चुनौतियों से पार पाने के लिए सरकार ने गोबरधान योजना के तहत सीबीजी की तय खरीद और पूंजी सहायता देने का फैसला लिया है। विपणन और निवेश के मोर्चों पर सहायता से सीबीजी क्षेत्र में निवेश रफ्तार पकड़ सकता है। यह संभावना किसानों के लिए भी अच्छी खबर है, क्योंकि सीबीजी कारखाने खुलने से गोबर और खेती-बाड़ी के कचरे को भी एक बड़ा बाजार मिल सकता है।

100% तक गैस खरीद का प्रावधान
सरकार के अनुसार, पात्र सीबीजी उत्पादक बिक्री के लिए उपलब्ध गैस की 100% तक मात्रा की सुनिश्चित खरीद का विकल्प चुन सकते हैं। यह खरीद तकनीकी और परिचालन क्षमता के आधार पर होगी। पहले सीबीजी की बिक्री काफी हद तक बाजार आधारित खरीद और उचित प्रयास प्रावधानों पर निर्भर थी। मंत्रालय के दस्तावेज के अनुसार, इससे परियोजना विकसित करने वालों के लिए अनिश्चितता पैदा हुई और परियोजनाओं का कारोबारी आधार कमजोर हुआ।

खरीदी गई सीबीजी, सीएनजी और पीएनजी में मिलाई जाएगी
नई व्यवस्था में सीबीजी प्लांटों को सिटी गैस डिस्ट्रीब्यूशन कंपनियों या संबंधित भौगोलिक क्षेत्रों से जोड़ा जाएगा। कई प्लांटों को क्लस्टर के रूप में जोड़कर गैस को मुख्य पाइपलाइन तक पहुंचाने की भी व्यवस्था की जा सकती है। इसके अलावा, सीजीडी कंपनियों के लिए अनिवार्य खरीद के जरिए सीबीजी की मांग को भी समर्थन दिया जाएगा। सीएनजी परिवहन और घरेलू पाइप्ड नेचुरल गैस त्रों में सप्लाई की जाने वाली गैस के आधार पर सीबीजी खरीद की बाध्यता 2026-27 में 3 प्रतिशथ और आगामी 2027-28 में 4 प्रतिशत तय की गई है।

करीब 98 रुपये प्रति किलो तय की गई शुरुआती कीमत
पेट्रोलियम मंत्रालय की गाइडलाइन के अनुसार, CBG की शुरुआती तय खरीद कीमत 2,110 रुपये प्रति MMBTU तय की गई है। 95% मीथेन वाली गैस के आधार पर यह कीमत करीब 98 रुपये प्रति किलो बैठती है। इसमें टैक्स और कंप्रेशन शुल्क शामिल नहीं हैं।सरकार के अनुसार, इस कीमत व्यवस्था का उद्देश्य सीबीजी के लिए स्थिर मूल्य ढांचा तैयार करना और परियोजनाओं की व्यावसायिक व्यवहार्यता तथा लंबे समय के वित्तपोषण को समर्थन देना है। यह प्रशासित कीमत व्यवस्था कम से कम 10 साल तक, यानी 31 मार्च 2036 तक लागू रहेगी। हालांकि, कीमत में हर साल बदलाव किया जा सकता है।

प्लांट लगाने और अपग्रेड करने के लिए 30 करोड़ रुपये तक सहायता
नई व्यवस्था में नए और मौजूदा प्लांटों के लिए पूंजी सहायता भी बढ़ाई गई है। पात्र मदों के लिए एक परियोजना को अधिकतम **30 करोड़ रुपये** तक की सहायता मिल सकती है। नई ग्रीनफील्ड सीबीजी कारखानों को स्थापित क्षमता के आधार पर 1.25 करोड़ रुपये प्रति टन प्रतिदिन तक की सहायता मिल सकती है। वहीं, मौजूदा बायोगैस प्लांटों को CBG उत्पादन के लिए अपग्रेड करने पर 60 लाख रुपये प्रति TPD तक सहायता का प्रावधान है। इस श्रेणी में सहायता की अधिकतम सीमा 5 करोड़ रुपये होगी।

पाइपलाइन की कमी भी बनी चुनौती
सरकार की नई व्यवस्था में सीबीजी पाइपलाइन कनेक्टिविटी पर भी जोर दिया गया है। पेट्रोलियम मंत्रालय के अनुसार, सीबीजी पाइपलाइनों में निवेश उत्पादन क्षमता के तेजी से विस्तार की तुलना में पीछे रहा है। मंत्रालय ने माना है कि पाइपलाइन कनेक्टिविटी की कमी के कारण गैस को प्लांट से आगे पहुंचाने में दिक्कत आती है और इससे आगे के निवेश पर भी असर पड़ता है।


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