भारत सरकार के राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण को देश की प्राकृतिक संपदा का इस्तेमाल करने वाली कंपनियों से बड़ी रकम प्राप्त हुई है। सरकार के अनुसार, 1 अप्रैल 2026 से 30 सितंबर 2026 के बीच ABS ढांचे के तहत प्राधिकरण को कुल 9.68 करोड़ रुपये मिले हैं। जैविक विविधता अधिनियम के नियमों के अनुसार, जो भी कंपनियां या लोग भारत के पेड़-पौधों, बीजों और जानवरों का उपयोग अपने व्यापार के लिए करते हैं, उन्हें इसके बदले सरकार को एक तय रकम देनी होती है।
खेती और बीज क्षेत्र से आया सबसे ज्यादा पैसा
अथॉरिटी के मुताबिक, प्राप्त कुल 9.68 करोड़ रुपये में से 9.56 करोड़ रुपये सीधे तौर पर जैविक संसाधनों तक पहुंच के बदले मिले हैं। इस कमाई में सबसे बड़ा हिस्सा कृषि और बीज क्षेत्र का रहा, जिससे 7.16 करोड़ रुपये प्राप्त हुए। इसके बाद खाने-पीने का सामान (फूड एंड बेवरेज) बनाने वाले क्षेत्र से 1.59 करोड़ रुपये और पशुपालन क्षेत्र से 62.01 लाख रुपये मिले। सरकारी जानकारी के अनुसार, इसके अलावा आयुर्वेद (आयुष), लाल चंदन की लकड़ी और सौंदर्य प्रसाधन (कॉस्मेटिक्स) क्षेत्र की कंपनियों ने भी इस फंड में अपना योगदान दिया है। बौद्धिक संपदा अधिकार (आईपीआर) से जुड़े आवेदनों से भी 11.24 लाख रुपये प्राप्त हुए हैं।
किन संसाधनों का हुआ उपयोग और किसने दिए पैसे?
सरकार के अनुसार, इस दौरान कंपनियों ने चना, मसूर, मूंग, ब्राउन राइस, गोभी और भिंडी जैसी कई फसलों का उपयोग किया। इसके अलावा अश्वगंधा, मुलेठी, कालमेघ और सहजन जैसी औषधीय जड़ी-बूटियों, मिट्टी के उपयोगी जीवाणुओं और मिथुन, जर्सी गाय व मुर्रा भैंस जैसे पशुओं के संसाधनों का भी व्यापारिक इस्तेमाल किया गया।
इन संसाधनों का उपयोग करने के बदले देश-विदेश की कई कंपनियों ने भुगतान किया है। सरकार के अनुसार, इनमें ईस्ट वेस्ट सीड्स इंडिया लिमिटेड ने कई किस्तों में सबसे ज्यादा 2.01 करोड़ रुपये दिए। वहीं, सिनर्जिया लाइफ साइंस लिमिटेड ने एकमुश्त 1.17 करोड़ रुपये का भुगतान किया। इसके अलावा नुन्हेम्स इंडिया, टाटा केमिकल्स, इंडेना इंडिया और ग्रो इंडिगो जैसी कंपनियों ने भी बड़े भुगतान किए हैं। भारत के अलावा श्रीलंका, जर्मनी, फ्रांस, दक्षिण कोरिया और भूटान की संस्थाओं ने भी यह पैसा चुकाया है।
किसानों और पर्यावरण की सुरक्षा पर खर्च होता है यह फंड
यह पैसा केवल सरकारी खजाने में नहीं रखा जाता, बल्कि इसे प्रकृति और लोगों को लौटाया जाता है। सरकार के अनुसार, साल 2008 से लेकर अब तक इस व्यवस्था के जरिए लगभग 278 करोड़ रुपये जुटाए गए हैं। इसमें से 200 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम देशभर में पर्यावरण को बचाने, किसानों, स्थानीय समुदायों और संस्थाओं को फायदे के रूप में बांटी जा चुकी है।
अथॉरिटी के मुताबिक, यह व्यवस्था सिर्फ पैसे जमा करने तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका मकसद कुदरत का सही इस्तेमाल और लोगों को उसका उचित लाभ देना है। राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के बोर्ड के माध्यम से इस पैसे का उपयोग गांवों में जैव विविधता के रजिस्टर बनाने, स्थानीय समितियों को मजबूत करने, शोध करने और सीधे तौर पर स्थानीय लोगों व किसानों की भलाई के कामों में किया जाता है।