जड़ी-बूटियां असली हैं या उनमें मिलते-जुलते दूसरे पौधों की मिलावट है, अब इसकी पहचान करना आसान हो सकता है। वैज्ञानिकों ने पौधों में मौजूद रासायनिक तत्वों के खास पैटर्न के आधार पर उनकी पहचान करने का तरीका खोजा है। इस तकनीक को ‘रासायनिक फिंगरप्रिंट’ कहा जाता है। इससे पुनर्नवा, चिरायता, अशोक और विदारीकंद जैसी औषधीय जड़ी-बूटियों की शुद्धता जांचने में मदद मिल सकती है।
लखनऊ स्थित राष्ट्रीय वनस्पति अनुसंधान संस्थान (एनबीआरआई) के वैज्ञानिकों ने इस दिशा में महत्वपूर्ण शोध किया है। कई औषधीय पौधे देखने में एक-दूसरे जैसे होते हैं। ऐसे में केवल उनके रंग-रूप, पत्तियों या आकार के आधार पर सही पहचान करना मुश्किल हो जाता है। इसके अलावा, अलग-अलग क्षेत्रों में एक ही पौधे के नाम भी अलग हो सकते हैं। रासायनिक फिंगरप्रिंट की मदद से इन समस्याओं को दूर करने में मदद मिल सकती है।
क्या है रासायनिक फिंगरप्रिंट?
हर पौधे में कई तरह के रासायनिक तत्व मौजूद होते हैं। इनकी मात्रा और आपसी अनुपात मिलकर एक खास पैटर्न बनाते हैं। वैज्ञानिक इसी पैटर्न को रासायनिक फिंगरप्रिंट के रूप में पहचानते हैं। इसे किसी पौधे के रासायनिक आधार कार्ड की तरह समझ सकते हैं। किसी जड़ी-बूटी के नमूने में मौजूद रसायनों के पैटर्न की तुलना प्रमाणित नमूने से करके पता लगाया जा सकता है कि दोनों में समानता है या नहीं। इससे जड़ी-बूटियों की पहचान और उनकी गुणवत्ता की जांच में मदद मिल सकती है।
पुनर्नवा के 21 नमूनों की जांच में मिला अंतर
एनबीआरआई के वैज्ञानिकों ने पुनर्नवा के 21 नमूनों का रासायनिक विश्लेषण किया। इनमें बाजार से लिए गए दो नमूनों का रासायनिक पैटर्न सामान्य पुनर्नवा से अलग पाया गया। जांच में इन नमूनों में ट्रिएन्थेमा पोर्टुलाकैस्ट्रम नामक पौधे से जुड़े रासायनिक गुण मिले। यह पौधा पुनर्नवा में संभावित मिलावट के स्रोतों में शामिल है।
शोध में पुनर्नवा की पहचान के लिए कुछ खास रासायनिक संकेतक भी सामने आए। इनमें बीटा-एक्डीसोन और बोएराविनोन-बी प्रमुख हैं। इनकी मौजूदगी और आपसी अनुपात का विश्लेषण करके असली पुनर्नवा को उससे मिलते-जुलते दूसरे पौधों से अलग पहचानने में मदद मिल सकती है।
चिरायता, अशोक और विदारीकंद की पहचान में भी मिलेगी मदद
पुनर्नवा के अलावा चिरायता, अशोक और विदारीकंद जैसी औषधीय जड़ी-बूटियों की पहचान में भी ऐसी तकनीक उपयोगी हो सकती है। इन पौधों की मांग अधिक होने और असली कच्चा माल पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं होने की स्थिति में मिलते-जुलते दूसरे पौधों के इस्तेमाल की आशंका रहती है।
पौधों की प्रजाति बदलने से उनसे तैयार होने वाली हर्बल दवाओं में सक्रिय रासायनिक तत्वों की मात्रा और गुणवत्ता भी प्रभावित हो सकती है। ऐसे में रासायनिक फिंगरप्रिंट से जड़ी-बूटियों की सही पहचान करने पर दवाओं की गुणवत्ता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
शोध को मिला आयुर्वेदिक विज्ञान परिषद का सहयोग
इस शोध दल में डॉ. शरद श्रीवास्तव के साथ मृदुल कांत चौधरी, अंकिता मिश्रा और आदर्श तिवारी शामिल रहे। शोध को केंद्रीय आयुर्वेदिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (सीसीआरएएस), नई दिल्ली से आर्थिक सहयोग मिला। इसके निष्कर्ष शोध पत्रिका नेचुरल प्रोडक्ट रिसर्च में प्रकाशित हुए हैं।
एनबीआरआई के निदेशक डॉ. जबीर अहमद ने उम्मीद जताई कि भविष्य में रासायनिक फिंगरप्रिंट आधारित जांच को हर्बल दवाओं की गुणवत्ता जांचने की प्रक्रिया में शामिल किया जा सकेगा। इससे दवाएं बनाने में इस्तेमाल होने वाली जड़ी-बूटियों की पहचान और शुद्धता की जांच अधिक भरोसेमंद बनाने में मदद मिल सकती है।
इस तकनीक का व्यापक इस्तेमाल होने पर औषधीय पौधों की पहचान, कच्चे माल की गुणवत्ता और हर्बल दवाओं की विश्वसनीयता बेहतर करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, इसके व्यावहारिक इस्तेमाल के लिए अलग-अलग पौधों के प्रमाणित नमूनों और जांच के मानकों को स्थापित करना जरूरी होगा।
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