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Air Pollution In Rural India Now Air In Villages Also Becoming Toxic Reducing Life Expectancy By An Average Of
ग्रामीण भारत में वायु प्रदूषण : अब गांवों की हवा भी हो रही है जहरीली, औसतन 5 साल घट रही जिंदगी
गांव जंक्शन डेस्क, नई दिल्ली
Published by: Mohammad Aamil
Updated Mon, 27 Oct 2025 05:30 PM IST
सार
रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण भारत में वायु प्रदूषण का असर महिलाओं और बच्चों पर सबसे अधिक है, खासकर वे जो ठोस ईंधन (लकड़ी, गोबर के कंडे, कोयला) से खाना बनाती हैं।
ग्रामीण भारत में वायु प्रदूषण
- फोटो : सोशल मीडिया
स्वच्छ हवा पाने के लिए लोग गांवों की ओर देखते हैं। भारत के गांव, जिन्हें स्वच्छ हवा और हरियाली की पहचान माना जाता है। लेकिन, एक नई रिपोर्ट ने इन गांवों को लेकर गहरी चिंता में डाल दिया है। स्वच्छ हवा और हरियाली के प्रतीक ये गांव अब धीरे-धीरे वायु प्रदूषण के गहरे संकट में डूब रहे हैं। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट (CSE) की नई रिपोर्ट “सांसों का आपातकाल” के अनुसार, ग्रामीण भारत की हवा अब उतनी ही दूषित हो चुकी है जितनी शहरों की।
परेशानी में डालने वाला खुलासा
क्लाइमेट ट्रेंड्स और IIT-दिल्ली के संयुक्त अध्ययन में पाया गया कि ग्रामीण भारत में PM 2.5 (अल्ट्राफाइन पार्टिकुलेट मैटर) का स्तर वर्ष 2022 में औसतन 46.4 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर था, जबकि शहरी क्षेत्रों में यह 46.8 माइक्रोग्राम रहा, यानी दोनों के बीच का अंतर लगभग नगण्य। राष्ट्रीय मानक 40 माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से यह आंकड़ा लगातार ऊपर जा रहा है।
इस जहरीली हवा का सबसे बड़ा असर ग्रामीण लोगों की जीवन प्रत्याशा पर पड़ा है। रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण लोगों की औसतन 5 साल 2 महीने की जिंदगी कम हो रही है, जबकि शहरों में यह 4 साल 5 महीने है। सबसे भयावह स्थिति उत्तर प्रदेश में है, जहां ग्रामीण इलाकों में औसतन 8 साल की जीवन प्रत्याशा घट रही है। बिहार और हरियाणा में यह गिरावट करीब 7 साल तक पहुंच गई है।
महिलाएं और बच्चों पर ज्यादा असर
भारत की लगभग 62% ग्रामीण आबादी को किसी भी प्रकार के वायु गुणवत्ता अलर्ट या चेतावनी प्रणाली तक पहुंच नहीं है। रिपोर्ट बताती है कि ग्रामीण भारत में वायु प्रदूषण का असर महिलाओं और बच्चों पर सबसे अधिक है, खासकर वे जो ठोस ईंधन (लकड़ी, गोबर के कंडे, कोयला) से खाना बनाती हैं। CSE की रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण इलाकों में प्रदूषण के तीन बड़े स्रोत हैं- ठोस ईंधन का उपयोग (लकड़ी, गोबर आदि), कृषि अवशेषों का जलाना (पराली), ईंट-भट्ठों और सड़कों की धूल।
यूनिवर्सिटी ऑफ ईस्ट एंग्लिया के एक अध्ययन में बताया गया कि ठोस ईंधन से निकलने वाला धुआं महिलाओं के फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है और दो वर्ष से छोटे बच्चों के मस्तिष्क विकास को प्रभावित करता है। उत्तर प्रदेश के शिवगढ़ गांव में हुए एक शोध में पाया गया कि ऐसे घरों में बच्चों की विज़ुअल मेमोरी और प्रोसेसिंग स्पीड कम होती है।
'गांवों की चौपालों तक पहुंच रहा धुआं'
CSE की वरिष्ठ निदेशक अनुमिता राय चौधरी कहती हैं, “यह अब सिर्फ शहरों का संकट नहीं रहा। गांवों की चौपालों तक धुआं पहुंच चुका है। महिलाएं धुआं भरी रसोई में जूझ रही हैं, बच्चे जन्म से पहले ही प्रदूषण की मार झेल रहे हैं, और सरकार के पास गांवों की हवा को मापने का कोई मजबूत तंत्र नहीं है।”
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